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आजमगढ़ के मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश रच रहा है अमर उजाला!

मुंबई में 13 जुलाई को हुए बम धमाकों के बाद उत्तर प्रदेश के अखबारों में आजमगढ़ फोबिया फिर सुरुर पर है और पत्रकारों में कथित खुफिया सूत्रों, कथित स्रोतों की आड़ में खूब कुलांचे मार-मार के फर्जी खबरें छापने की होड़ मच गई है। मिसाल के तौर पर अमर उजाला लखनऊ के 16 जुलाई के अंक को ही लेते हैं जिसकी मुख्य पृष्ठ की पहली लीड स्टोरी ”संजरपुर के सैकड़ों मोबाइल फोन पर खुफिया निगाहें” छपी है। यह खबर न सिर्फ आजमगढ़ को बदनाम करने की शातिर कोशिश है बल्कि कई पहलुओं से तो हास्यास्पद भी बन गई है।

मुंबई में 13 जुलाई को हुए बम धमाकों के बाद उत्तर प्रदेश के अखबारों में आजमगढ़ फोबिया फिर सुरुर पर है और पत्रकारों में कथित खुफिया सूत्रों, कथित स्रोतों की आड़ में खूब कुलांचे मार-मार के फर्जी खबरें छापने की होड़ मच गई है। मिसाल के तौर पर अमर उजाला लखनऊ के 16 जुलाई के अंक को ही लेते हैं जिसकी मुख्य पृष्ठ की पहली लीड स्टोरी ”संजरपुर के सैकड़ों मोबाइल फोन पर खुफिया निगाहें” छपी है। यह खबर न सिर्फ आजमगढ़ को बदनाम करने की शातिर कोशिश है बल्कि कई पहलुओं से तो हास्यास्पद भी बन गई है।

मसलन यह खबर अपने आजमगढ़ को बदनाम करने राजनीतिक और सांप्रदायिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए यहां तक कहती है कि ”लखनऊ जेल में बंद आईएम के आंतकी सलमान व तारिक कासमी से भी पूछताछ की गई है।”  जबकि सच्चाई तो यह है कि सलमान जिसे कुछ महीनों पहले ही दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली विस्फोटों के आरोप से बरी कर दिया है और वह अब दूसरे आरोप में जयपुर की जेल में बंद है। और जहां तक तारिक कासमी से पूछताछ की बात है तो उसकी सच्चाई यह है कि बकौल तारिक के ही उससे किसी ने इस मामले में पूछताछ नहीं की है। यह बात खुद तारिक कासमी से मिलकर आए उनके वकील और चर्चित मानवाधिकार नेता मो. शोएब ने इस झूठी खबर को पढ़ने के बाद पीयूसीएल की तरफ से जारी प्रेस नोट में कहा।

समझा जा सकता है कि आजमगढ़, जहां पर एक विजबिल मुस्लिम आबादी है, को आतंकवाद का गढ़ साबित करने के लिए रिपोर्टर ने कैसे झूठे और हास्यास्पद तर्क तक गढ़ने से गुरेज नहीं किया है। अपनी इस मनगढ़ंत कहानी को आगे बढ़ाते हुए और अपनी सांप्रदायिक कल्पनाशीलता को विस्तार देते हुए रिपोर्टर आगे कहता है कि उनसे ”यह जानने की कोशिश की गई है कि उनके कौन से साथी पूर्वांचल में सक्रिय हैं और मुंबई में विस्फोट के बारे में क्या पूर्व में उनके आकाओं के साथ कोई चर्चा हुई थी।”  खबर की भाषा और उसकी दिशा से जाहिर है कि पत्रकार मुंबई विस्फोट की आड़ में आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी साबित करने की कोशिश कर रहा है। इस कोशिश की राजनीतिक दिशा क्या हो सकती है यह समझना मुश्किल नहीं है। क्योंकि इसी तारिक कासमी का आजमगढ़ से 12 दिसंबर 2007 को अपहरण किया गया,  जिस पर जांच के लिए पुलिस टीम भी गठित हुई,  को बाद में 22 दिसंबर को बारबंकी से गिरफ्तार करने का दावा किया गया था,  जिस पर मायावती सरकार ने इस बात की सत्यता के लिए आरडी निमेष जांच आयोग का गठन भी किया है।

इसी तरह मीडिया जो पहले उसके अपहरण पर आजमगढ़ में हो रहे धरने प्रदर्शनों की खबर छाप रही थी,  पर जैसे ही एसटीएफ ने बाराबंकी से उसे आतंकी बताकर गिरफ्तार करने की झूठी कहानी गढ़ी तो मीडिया को सांप सूघ गया और वो पुलिस की हां में हां मिलाने लगी। लेकिन इस राजनीतिक दिशा की तथ्यहीन खबरें सिर्फ लखनऊ ब्यूरो से ही नहीं हैं बल्कि पृष्ठ बारह पर छपे सुमंत मिश्र की ”मुबई सीरियल ब्लास्ट से जुड़े अधिकारी जता रहे हैं ऐसी आशंका”  शीर्षक वाली खबर में भी देखी जा सकती है। जहां वे भी दोहराते हैं कि ”लखनऊ एटीएस की टीम जेल में सलमान से पूछताछ कर इस तरह के उम्र वाले लड़कों के बारे में जानकारी हासिल करने में जुटी है।”  जाहिर है कि ऐसे तथ्यहीन और हास्यास्पद खबर लिखने के पीछे एक सोची समझी रणनीति काम रही है जिसमें सिर्फ लखनऊ ब्यूरो ही नहीं पूरे अखबार समूह में एक आम सहमति बनी है कि हमें ऐसी फर्जी खबरें ही करनी हैं।

जबकि सलमान की कहानी यह है कि उसे कुछ महीनों पहले ही दिल्ली की अदालत ने उसे दिल्ली विस्फोटों के आरोप से न सिर्फ बरी किया बल्कि उसकी गिरफ्तारी के संदर्भ में पुलिस कार्यप्रणाली पर तल्ख सवाल भी उठाए। दरअसल कोर्ट ने यह पाया कि सलमान,  जिसे एटीएस ने उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर से गिरफ्तार करने का दावा किया था, के साथ पुलिस ने जिस नेपाली पासपोर्ट के बरामद होने का दावा किया था उसे वह कभी पेश नहीं कर पाई। दूसरे, पुलिस ने एक फर्जी फोटो स्टेट जिसमें सलमान की उम्र 27 साल दिखाई गई थी जबकि उसकी वास्तविक उम्र पन्द्रह साल थी को कोर्ट में पेश किया और तीसरे पुलिस ने सलमान के पास से जो सउदी अरब का हेल्थ कार्ड बरामद होने का दावा किया था वो भी फर्जी निकला। कोर्ट ने पुलिस और एटीएस पर सलमान जैसे निर्दोष को फंसाने के लिए पुलिसिया करतूतों की काफी आलोचना की और सख्त हिदायत दी कि पुलिस अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाए।

यहां दिलचस्प बात है कि सलमान की गिरफ्तारी के वक्त भी मीडिया द्वारा इन्हीं झूठे सुबूतों का पुलिंदा बनाकर उसकी एक खतरनाक छवि बनाने का प्रयास किया गया था। दरअसल सलमान के सहारे पुलिस और खुफिया एक मीडिया ट्रायल कर रहे हैं कि सलमान भले ही सुबूतों के आभाव में बरी हो गया है, लेकिन वह आतंकवादी है। यह राज्य की नीति है कि वह अपने द्वारा अपने हितों के लिए पकड़े गए लोग जो न्यायालय से बरी भी हो गए हैं,  उनको समाज में अस्वीकार बना दें। इसी खबर में कहा गया है कि सलमान जो की छोटी उम्र का है,  इसलिए उससे छोटी उम्र के लड़कों के बारे में जानकारी इकट्ठी की जा रही है के सहारे छोटी उम्र के आजमगढ़ के लड़कों पर जहां एक ओर मनोवैज्ञानिक रुप से दबाव बनाया जा रहा है। वहीं समाज के नजर में उन्हें एक संदिग्ध मुस्लिम पीढ़ी के बतौर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।

यह कोशिश बाटला हाउस के वक्त भी की गई थी, जब 16 साल के साजिद को बाटला हाउस (बाटला हाउस कांड को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी वेब साइट पर फर्जी मुठभेड़ो की लिस्ट में रखा है।) फर्जी मुठभेड़ में मारकर कांग्रेस ने आजमगढ़ के बच्चों पर यह आरोप मढ़ा कि वह आतंकवादी होते हैं। इस रणनीति से फायदा यह है कि हिंदुत्वादी दिशा अख्तियार कर चुकी राजनीतिक माहौल में टेरर पालिटिक्स को लंबे समय तक चलाया जा सके। ”फिर आजमगढ़ के चार युवकों के नाम”  शीर्षक से वाराणसी डेट लाइन से छपी खबर में इस पूरे फर्जीवाड़े का सबसे हास्यास्पद पंक्ति तो ”इंडियन मुजाहिद्दीन के साथ आजमगढ़ के लोग काफी तेजी से जुड़ रहे हैं। आजमगढ़ के ही किसी व्यक्ति को ही इंडियन मुजाहिद्दीन में महत्वपूर्ण पद दिए जाने की बात चल रही है।”  समझा जा सकता है कि पत्रकार की समझ यह है कि इंडियन मुजाहिद्दीन कांग्रेस-भाजपा की तरह से मास बेस पार्टी है जिसमें लोग अपने समर्थकों के साथ, बैनर झंडा और वाहन जुलूसों के साथ नारे लगाते हुए शामिल होने जा रहे हों और अपने किसी छुटभैया नेता को पद दिलाना चाह रहे हैं।

दरअसल पत्रकारों की ऐसी मानसिकता लगातार पुलिसिया केस डायरी की नकल उतारने को ही पत्रकारिता समझ बैठने के चलते पैदा हो जाती है, जो अस्वाभाविक नहीं है। जिसे हमने काफी करीब से देखा कि कई बार बाहरी पत्रकार आते हैं तो इंडियन मुजाहिद्दीन का दफ्तर खोजते हैं। क्यों कि उनके भाई-बंधु पत्रकारों ने फर्जी खबरों के माध्यम से इस बात को प्रसारित किया है कि आजमगढ़ में इंडियन मुजाहिद्दीन का दफ्तर है,  जिसे देखने का कौतूहल उनमें आजमगढ़ पहुंचते ही हो जाता है। और जो नहीं आ पाते हैं अपने कल्पनाशील चछुओं से महानगरों में ही बैठे-बैठे ही देखने लगते हैं।

लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार संघ और जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा जारी.

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0 Comments

  1. धीरेन्द्र

    July 18, 2011 at 7:09 pm

    और हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश कौन रच रहा है. वैसे भी जिन जगहों से दाऊद भाई का सम्बन्ध है, उन जगहों के बारे में बिल्कुल नहीं लिखना चाहिये. ऐसे संत पुरुष की जगह है.

  2. anurag.

    July 18, 2011 at 2:48 pm

    is khabar kaa lekhar jaroor koi musalmaan hai. rajniti ki tarah ab media par chheetakashi mat kariye.. netaon ne janta ko apni jooti bana lee hai…yadi khabar ko pacha paane ki himmat nahi to is tarah ki pratikriya jahir na kare……yadi hai sabut to sabit karen ki khabar farzi hai……….janbhawna ujala nahi bhadas par chapi is khabar kaa patrakar bhadka raha hai. waise bhee azamgarh aatankiyon ki sharansthali hai…………kya isme koi shak hai……………………………

  3. hari

    July 20, 2011 at 3:48 am

    अब मौलिकता तो पत्रकारिता में कही कहीं ही बची है,जिस पपेर में सिर्फ jaati देख के भारती की जाती है,वहां से वैचारिकता और मौलिकता की उम्मीद लगाना बेवकूफी मात्र है..नीव ही कमजोर है,तो भवन कैसा होगा?

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