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कैश फॉर वोट कांड : … तब राजदीप सरदेसाई की जगह जेल होती!

आईबीएन सेवन के सर्वेसर्वा राजदीप सरदेसाई अगर ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों में होते तो निश्चित मानिये कि उनकी जगह जेल होती और उनके न्यूज चैनल आईबीएन7  पर ताला जड़ गया होता। सामाजिक जलालत अलग से झेलनी पड़ती। कानूनों की घेरेबंदी में इनकी ईमानदारी के परखच्‍चे उड़ गये होते। इनकी पेज थ्री संस्कृति जमींदोज हो जाती।

आईबीएन सेवन के सर्वेसर्वा राजदीप सरदेसाई अगर ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों में होते तो निश्चित मानिये कि उनकी जगह जेल होती और उनके न्यूज चैनल आईबीएन7  पर ताला जड़ गया होता। सामाजिक जलालत अलग से झेलनी पड़ती। कानूनों की घेरेबंदी में इनकी ईमानदारी के परखच्‍चे उड़ गये होते। इनकी पेज थ्री संस्कृति जमींदोज हो जाती।

सड़कों पर चलने के दौरान इनके उपर अंडे-टमाटरों की बरसात होती। इनकी ज्ञात और अज्ञात संपति भी अपराध की श्रेणी में खड़ी होती। अनैतिक/पतनशील और भ्रष्ट सत्ता वाली व्यवस्था के अंतर्गत ही राजदीप सरदेसाई जैसी संस्कृति जन्म ले सकती है और फल-फूल सकती है। इतना ही नहीं बल्कि चोरी और सीना जोरी वाली कहावत को सच में बदल सकती है। इसलिए कि कैश फॉर वोट कांड में राजदीप सरदेसाई एक अपराधी के तौर पर खड़े हैं। एक साथ इन्होंने कई अपराधिक षडयंत्रों को रचा और संबंधित कानूनों के परखच्‍चे उड़ाये। प्रसारण नियमावली का उल्लंघन किया। दर्शकों और पाठकों के कानूनी/नैतिक और परम्परागत अधिकार से वंचित किया। राजदीप सरदेसाई को न्यूज दबाने के षडयंत्र के लिए प्रसारण लाइसेंस दिये गये थे क्या?

पत्रकारिता के मूल्यों और जिम्मेदारियों की ऐसी हताश प्रक्रिया के उदाहरण रचकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक ढाचे पर कलंक का बीज बोया गया है। मीडिया की थोड़ी सी भी समझ रखने वाली देश की आबादी स्पष्ट तौर पर राजदीप सरदेसाई के उस कुकृत्य को अपराध की श्रेणी में ही नहीं मानता है बल्कि चैनल चलाने के निहित जरूरी अहर्ताओं का उल्लंघन भी मानता है। मीडिया स्टडी ग्रुप के शोध में दिल्ली और छोटे-छोटे शहरों के पत्रकारों की राय एकमत रूप से आईबीएन सेवन और इनके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई को अप्रत्यक्ष नहीं बल्कि प्रत्यक्षतौर पर दोषी माना है और प्रसारण लाइसेंस का उल्लंघन भी।

अगर आईबीएन7  ने समाचार दबाने का षडयंत्र नहीं किया होता और ईमानदारी दिखायी होती तो निश्चिततौर पर मनमोहन सिंह /उनके मैनजरों तथा अमर सिंह एंड पार्टी का काला चेहरा उसी समय उजागर हो गया होता,  जिस समय परमाणु मुद्दे पर सरकार बचाने के लिए सांसदों के जमीर को खरीदा गया था और लोकतंत्र को पैसों की शक्ति से कुचला गया था। किस उद्देश्य से समाचार प्रसारण रोकने का षडयंत्र हुआ था। कहीं कांग्रेस/ मनमोहन सत्ता और आईबीएन7  के बीच पैसे की शक्ति तो काम नहीं कर रही थी। कहीं सांसदों को पैसे के बल पर खरीदने जैसी प्रक्रिया कांग्रेस और उसके मैनजरों ने आईबीएन7 के साथ तो नहीं चलायी थी? यही खोज का विषय है। पुलिस इस पर निष्कर्ष स्थापित कर सकती है। पत्रकारिता में चोर-चोर मसौरे भाई की संस्कृति हावी हो गयी है। इसीलिए जब टू जी स्पेक्‍ट्रम में बरखा दत्त पत्रकारिता को बेचती हैं,  तब राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार समर्थन में खड़ा होकर बरखा दत्त को जलालत झेलने और कानून का ग्राह बनने से बचाने के लिए कलम-आवाज उठाते हैं। जब राजदीप सरदेसाई कैश फॉर वोट कांड को दबाता है,  तब पत्रकारिता के अन्य मठाधीश अपनी आवाज बक्से में बंद कर देते हैं। यह चोर-चोर मसौरे भाई की ही लूट, चोरी और भ्रष्टाचार की कहानी है।

रूपर्ट मर्डोक का उदाहरण : जो लोग आईबीएन7  और राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी को सत्यवादी हरिश्चंद्र से भी बड़ा सत्यवादी मानते हैं और इनके कुकत्यों को पत्रकारिता के ज्ञात और परम्परागत यथार्थों के विपरीत नहीं मानते उन्हें मीडिया सुलतान रूपर्ट मर्डोक के प्रकरण को आत्मसात करना चाहिए। ब्रिटेन ही नहीं बल्कि दुनिया का मशहूर अखबार ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड’  और मीडिया सुलतान रूपर्ट मर्डोक के हश्र का उदाहरण हमारे सामने है। न्यूज ऑफ द वर्ल्ड का प्रकाशन सदा के लिए बंद कर दिया गया। न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ने समाचार की खोज में निजी तौर पर टेलीफोन टेप का अपराध किया था। यह अपराध उसने न्यूज को दबाने या फिर ब्लैकमैलिंग के उद्देश्य से नहीं किये गये थे। खोजी पत्रकारिता और पाठकों के बीच विशेष समाचार सामग्री देने की होड़ में न्यूज आफ द वर्ल्ड ने ब्रिटेन की राजशाही सहित अन्य प्रमुख हस्तियों के टेलीफोन टेप कर सनसनी समाचार पाठकों के बीच परोसे थे।

जैसे ही यह प्रकरण सामने आया वैसे ही ब्रिटेन की कैमरून सरकार सकते में आ गयी और कैमरून के मीडिया सलाहकार सहित न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के टॉप अधिकारी जेल के अंदर पहुंच गये। मर्डोक के खिलाफ संज्ञान लिया गया और उन्हें ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने कई दिनों तक हाजिरी लगानी पड़ी। इस दौरान मर्डोक पर हमले भी हुए। न्यूज आफ द वर्ल्ड से जुड़े टॉप मीडियाकर्मियों को जनाक्रोश की जलालत झेलनी पड़ रही है और वे सड़कों पर बाधा रहित घूम भी नहीं सकते। उन्हें अंडों और टमाटरों की अपने उपर बरसात होने का डर है। जबकि न्यूज आफ द वर्ल्ड का अपराध आईबीएन7  की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरता है। न्यूज आफ द वर्ल्ड का हश्र इसलिए हुआ कि ब्रिटेन की सामाजिक और सत्ता व्यवस्था में अभी भी नैतिकता है।

आईबीएन7 का स्टिंग आपरेशन : अमेरिका के साथ परमाणु 123 करार पर वामपंथी जमात के समर्थन खींच लेने के कारण मनमोहन सिंह सरकार अल्पमत आ गयी थी। सांसदों की खरीद के बिना मनमोहन सिंह की सत्ता बचती और न ही अमेरिका के साथ 123 परमाणु करार संसद में पास होता। सांसदों की खरीद के लिए कांग्रेस के मैनेजर तो थैली खोलकर बैठे ही थे, इसके अलावा अमर सिंह और मुलायम सिंह एंड पार्टी भी सांसदों के खरीद में लगे हुए थे। अमेरिका की परमाणु कंपनियां और देश के कांग्रेसी सत्ता समर्थक उद्योगपति धन की वर्षा कर रहे थे। भाजपा सहित अन्य अन्य विपक्षी दलों के सांसदों पर पैसे की शक्ति का लालच दिया गया था। भाजपा के सांसदों ने इसकी शिकायत आलाकमान से की थी। भाजपा आलाकमान ने आईबीएन7  और राजदीप सरदेसाई से सांसदों की खरीदने की कांग्रेसी और अमर-मुलायम एंड पार्टी की करतूत का स्टिंग आपरेशन करने के लिए संम्‍पर्क किया था। भाजपा से आईबीएन7 और राजदीप सरदेसाई ने वायदा किया था कि आपरेशन चाकचौंबद होगा और कांग्रेस की पैसे की शक्ति से उनकी ईमानदारी नहीं डिगेगी। सच को उजागर कर मनमोहन सत्ता का खेल बेपर्दा होगा।

नोट लहराने की बेबसी : आईबीएन7  ने ईमानदारी नहीं दिखायी। स्टिंग आपरेशन तो किया पर उसने स्टिंग आपरेशन को दिखाने से साफ इनकार कर दिया। अमान्य और प्रत्यारोपित तर्क प्रस्तुत किये गये। भाजपा राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी पर विश्वास कर ठगी गयी। सांसदों को खरीदने की कांग्रेसी/अमर-मुलायम एंड पार्टी की करतूत पर पर्दा उठने की उम्मीद बेकार साबित हो गयी थी। हारकर भाजपा सांसदों ने अमर सिंह-मुलायम सिंह एंड पार्टी द्वारा दिये गये एक करोड़ रुपये को संसद में लहराना पड़ा। संसद में रिश्वत के रूप में दिये गये एक करोड़ रुपये लहराने की यह पहली घटना थी। कायदे से इस करतूत का पर्दाफाश आईबीएन7  को करना चाहिए था। अगर आईबीएन7  ने नोट की शक्ति से सांसदों की जमीर खरीदने का खेल प्रसारित कर दिया होता तो संसद में मनमोहन सरकार बेपर्दा हो जाती।

22 जुलाई से 11 अगस्त के बीच कौन सा खेल हुआ :  22 अगस्त 2008 को कैश फॉर वोट कांड की करतूत सामने आयी थी। लोकतंत्र की इस हत्या पर लोकतांत्रिक समाज-व्यवस्था हतप्रभ थी। देश का लोकतांत्रिक संवर्ग और आम आबादी इस कांड की असली सच्चाई जानने की उम्मीद आईबीएन7  से कर रहा था। आईबीएन7  कभी स्टिंग आपरेशन को अधूरा होने तो कभी तस्वीर साफ नहीं होने और कैश फॉर वोट कांड में संलग्न लोगों की शख्सियत अज्ञात होने जैसे रक्षा कवज बनाता रहा। इस दौरान उसकी कांग्रेस-मनमोहन सिंह सत्ता या फिर अमर सिंह-मुलायम सिंह एंड पार्टी से आईबीएन सेवन-राजदीप सरदेसाई एंड पार्टी के बीच कौन सा खेल हुआ। कहीं पैसे की शक्ति से आईबीएन7  भी तो प्रभावित नहीं हुआ? इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है।

सच तो यह है कि आईबीएन7  और कांग्रेस मनमोहन सिंह सरकार के बीच सैकड़ों करोड़ की डील हो सकती है। ऐसे ही कोई नामी-गिरामी न्यूज चैनल अपनी विश्वसनीयता नहीं खो सकता है। ऐसे समय में जब कांग्रेस-मनमोहन सरकार और अमर-मुलायम अपनी साख बचाने और कैश फॉर वोट कांड पर पर्दा डालने के लिए कोई/कैसी भी हदें पार कर सकते थे। पत्रकारिता संवर्ग की इस आशंका को झुठलाया नहीं जा सकता है कि राजदीप सरदेसाई स्टिंग आपरेशन को दबाने और सत्यता छुपाने की कीमत भी करोड़ों में वसूली होगी। मीडिया स्टटी ग्रुप के सर्वेक्षण में पत्रकारिता संवर्ग ने ऐसी ही राय प्रकट की थी।

चोरी-चोरी दिखाया क्यो? : इलेक्ट्रानिक्स मीडिया का इतिहास खंगाल लीजिये और राजदीप सरदेसाई की चोरी और पत्रकारिता बेचने की कहानी की नीयत भी पकड़ लीजिये। जब कोई सनसनी या विशेष समाचार का खुलासा होता तो चैनल कई दिनों से इसकी सूचना बार-बार देते हैं और सनसनी खेज समाचारों की फुटेज भी दिखाते हैं। विज्ञापन बटोरने का खेल भी खेलते हैं इसकी मिसाल शायद आपको याद हो,  जब लालू प्रसाद यादव रेलमंत्री थे तब लालू यादव के क्षेत्र से एक खबर इसी चैनल पर फ्लैश की जा रही थी कि लालू ने कितने ही लोगों की जमीन हथिया ली है,  लेकिन उस जमीन के बारे में कोई खुलासा नहीं हुआ, दो दिन तक लालू द्वारा जमीन हथियाने की पट्टी समाचार चलाने के बाद उस खबर की सच्चाई सदा के लिए जमींदोज कर दिया गया था।

उसी तरह कैश फॉर नोट कांड का प्रसारण राजदीप एंड कंपनी ने बेहद गोपनीय ढंग से और बिना पूर्व सूचना के 11 अगस्त 2008 को कर दिया। सनसनी खेज और विशेष समाचारों के प्रसारण बार-बार दिखाये जाते हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया लेने के लिए चैनलों के रिर्पोटर खाक छानते हैं। 19 दिनों तक इस स्टिंग आपरेशन को दबा कर रखा जाता है क्यों? अगर देश भर में मीडिया कर्मियों और बुद्धिजीवियों में हो हल्ला नहीं मचता तो 19 दिन बाद भी कैश फॉर वोट कांड को नहीं दिखाता। चर्चा में कई सवाल हैं। इन सवालों में अमर सिंह और अहमद पटेल के घर में किये गये स्टिंग आपरेशन को गोलमाल करना भी है।

बेशर्मी की हद भी देखिये : विकीलीक्स ने खुलासा किया था कि कैश फॉर वोट कांड में मनमोहन सिंह और कांग्रेस ने सांसदों की जनमत खरीदा था। विकीलीक्स के खुलासे में ऐसी कोई नयी बात नही थी जो राजनीतिक-पत्रकारिता संवर्ग से ओझल थी। जैसे ही विकीलीक्स का खुलासा सामने आया वैसे ही आईबीएन7 की सनसनी शुरू हो गयी। आईबीएन7  पर विकीलीक्स के खुलासे का जिक्र तो हुआ पर गर्व के साथ समाचार दिखाया गया कि सबसे पहले आईबीएन7  ही इस कांड को दिखाया था और इसकी पोल खोली थी। गर्व और वीरता का ऐसा भाव दिखाया गया जैसा कि सही में आईबीएन7  कैश फॉर वोट कांड में सत्यता सामने लाया है। 19 दिनों तक क्यों छुपा कर रखा स्टिंग आपरेशन को। अमर सिंह और अहमद पटेल के घरों में किये गये स्टिंग आपरेशन का गोलमाल क्यों हुआ? यह सब कौन बतायेगा?

न्याय प्रक्रिया की जिम्मेदारी : मनमोहन सरकार प्रारंभ से ही इस कांड को दफन करने में लगी है। इसलिए पुलिस अमर सिंह एंड कंपनी और अहमद पटेल सहित राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी को बचा रही है। पुलिस के माध्यम से सच का सामने आना मुश्किल है। इसलिए पुलिस जांच की निगरानी ही सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया होगी। अगर न्यायालय अपनी निगरानी में पुलिस को चाक- चौबंद/दबाव रहित और निष्पक्ष जांच करने के लिए बाध्य करेगा तभी सभी सच्चाई की हम उम्मीद कर सकते हैं। पुलिस-न्यायालय द्वारा आईबीएन सेवन/राजदीप सरदेसाई की गर्दन क्यों नही नापी जानी चाहिए? ब्रिटेन के मशहूर अखबार ‘न्यूज ऑफ वर्ल्ड’  के हश्र और मीडिया सुल्‍तान रूपर्ट मर्डोक की कानूनी घेरेबंदी व उनके खिलाफ ब्रितानी समाज में उपजा जनाक्रोश की कसौटी जैसा ही व्यवहार और कानूनी कार्रवाई आईबीएन7 /राजदीप सरदेसाई एंड कंपनी के खिलाफ होना जरूरी है। आज राजदीप सरदेसाई जैसा पत्रकार रातों रात चैनल मालिक कैसे हो जाता है। चैनल चलाने के लिए आया धन कहीं आईएसआई एजेंड गुलाम नबी फई जैसा तो नहीं है? इसकी जांच कौन करेगा? मीडिया जगत को भी अपनी छवि बचाने के लिए राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों पर गहनता के साथ विचार करना होगा। अगर नहीं तो फिर पत्रकारिता जगत अपने आप को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा कैसे कर सकता है?

लेखक विष्‍णु गुप्‍त हिंदी के वरिष्‍ठ एंव जनपक्षधर पत्रकार हैं. इन्‍होंने समाजवादी और झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई है. पत्रकारिता के ढाई दशक के अपने करियर में झारखंड में दैनिक जागरण, रांची, स्‍टेट टाइम्‍स, जम्‍मू और न्‍यूज एजेंसी एनटीआई के संपादक रह चुके हैं. फिलहाल राजनीतिक टिप्‍पणीकार के रूप में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं. इनसे संपर्क 09968997060 के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. Anil da

    July 26, 2011 at 8:35 am

    विष्णु गुप्त जी अब आपकी बात हम दर्शको को समझ में आ रही है. भारतीय रुपये के प्रतीक चिन्ह चयन में बहुत बड़ा भ्रस्ताचार हुआ था, IBN पर सबसे पहले अरविन्द केजरीवाल ने जवाब दिया था IBN Live Chat – Five RTI Activists Exposed Corruption In “Indian Rupee Symbol” Design Competition.. What’s your take on this?
    ..Arvind Kejriwal – Good that they did it किन्तु इस डींग हकुआ चिनाल ने मामले को डकार लिया. कुछ जागरूक लोग इसका विरोध कर रहे है जिसका विवरण इस लिंक पर देखा जा सकता है..

    http://www.saveindianrupeesymbol.org/

    2-इसके आलावा यह मामला श्रीमती अम्बिका सोनी के प्रेस कांफ्रेंस में दिनाक १५ जुलाय २०१० को जी न्यूज़ चैनल ने उठाया किन्तु सारे मीडिया साम्राज्य के मौजूद सूर्माओ ने रहस्यमई चुपी साध ली, जी न्यूज़ का वीडियो का लिंक लास्ट मिनिट (8.20 to last) का उत्तर नकारात्मक था मीडिया चुप क्यो हुई ? IBN ने क्यों अनदेखी की-

    http://www.youtube.com/watch?v=h8Bnq2pDQG4

    3- Rupee symbol mix Roman R and Devanagari “RA” it is clear violation of article 351 constitution of india..
    The article 351 constitution of india.
    ” Directive for development of the Hindi language It shall be the duty of the Union to promote the spread of the Hindi language, to develop it so that it may serve as a medium of expression for all the elements of the composite culture of India and to secure its enrichment by assimilating without interfering with its genius, the forms, style and expressions used in Hindustani and in the other languages of India specified in the Eighth Schedule, and by drawing, wherever necessary or desirable, for its vocabulary, primarily on Sanskrit and secondarily on other languages PART XVIII EMERGENCY PROVISIONS”

    4- Other News..
    http://trak.in/tags/business/2010/07/15/new-indian-rupee-symbol/

    http://www.visfot.com/index.php/news_never_die/3702.html

    परत-दर-परत उघड़ रही हैं रुपये के भ्रष्टाचार की परतें
    http://www.visfot.com/index.php/newsnetwork/3721.html

    ‘Flaws in selection of rupee symbol’ – India
    http://www.dnaindia.com/india/report_flaws-in-selection-of-rupee-
    symbol_1411192

    IMP..
    Media for the first time in the history of India has gone into a mysterious silence over the fraud played by the organisers of symbol for rupee competition .In the past the same media specially electronic media has entered the bedrooms of the people to expose them and bring infront of the world and played the news 24×7 and this time when the things are crystal clear before them they have gone into the shell.
    ——————-

  2. mahesh

    July 26, 2011 at 11:07 am

    hamam me savi nange h yadi vishnu gupt ji v rajdeep sardesai ki jagah pe hote to yahi karte

  3. Pramod kumar.muz.bihar

    July 26, 2011 at 2:34 pm

    visnubhai rupard mardok ke bharat aane ki charcha joron par thi.agar murdok aajate to nirlaj rajnitigyon sehamara picha chut jata.jase murdok ne akhbar jagat tauba ki wasa yahan bhi hoga.wah din dur nahi hai.

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