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दुख-दर्द

धन्‍य हो छत्‍तीसगढ़ के कलमकारों, चुल्‍लू भर पानी ले लो…!

छत्तीसगढ राज्य में पुलिस अफसरों ने साजिश रचकर एक पत्रकार को जेल भिजवा दिया और वाह रे कलमकारों की बिरादरी जो हस्तिनापुर के खूंटे से बंधकर टुकुर-टुकुर देख रही है. विज्ञापन, स्वेच्छा अनुदान, जैसे सरकारी टुकडे़ तोड़कर कम से कम अपना जमीर तो मत बेचो भाई. शेर, शेर का मांस नहीं खाता. आदमी नरभक्षी नहीं होता. सांप, सांप को नहीं डंसता फिर पत्रकार क्यों अपनों का खून पीने को उतर आया है? और तो और अहसान फरामोश तो मत हो जाओ साथियों.

छत्तीसगढ राज्य में पुलिस अफसरों ने साजिश रचकर एक पत्रकार को जेल भिजवा दिया और वाह रे कलमकारों की बिरादरी जो हस्तिनापुर के खूंटे से बंधकर टुकुर-टुकुर देख रही है. विज्ञापन, स्वेच्छा अनुदान, जैसे सरकारी टुकडे़ तोड़कर कम से कम अपना जमीर तो मत बेचो भाई. शेर, शेर का मांस नहीं खाता. आदमी नरभक्षी नहीं होता. सांप, सांप को नहीं डंसता फिर पत्रकार क्यों अपनों का खून पीने को उतर आया है? और तो और अहसान फरामोश तो मत हो जाओ साथियों.

श्रमजीवी पत्रकारों के नेता नारायण शर्मा को पन्द्रह दिनों से जेल में रहना पड़ा और प्रेस जगत साथ नहीं दे रहा है, पता है क्यों? क्योंकि श्रम न्यायालय में वे वेज बोर्ड कमेटी के मेम्बर थे और पत्रकारों को बडे़ ग्रुप में अच्छी तनख्वाह दिलाने के लिये प्रेस मैंनेजमेन्ट और मालिकों पर दबाव बनाते थे. आज वही मैनेजमेन्ट उन्हें गरिमा की सीख देते हुए उन्हीं पत्रकारों से लिखवा कर मसाला छाप रहा है कि नारायण ने गलत किया. बेचारा-लाचार पत्रकार तो मैनेजमेन्ट के वफादार कुत्ते की तरह होता है,  जिसके सूंघने की शक्ति बड़ी तेज होती है. उसने सूंघ लिया की पत्रकार नारायण का साथ देना खतरे से खाली नही है.

कहते हैं ना सब कुछ मिटाया जा सकता है लेकिन एक बार इंसान कुछ कह दे तो वह नहीं मिटता. वाणी रूपी ध्वनि समूचे वायुमंडल और ब्रम्हांड में प्रतिध्वनित होती है. ऐसे ही चार-छह साल पहले बिलासपुर के पत्रकारों ने भी एक बार चुनावी गोटियां बिछाने के लिये एक पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग उठाई थी,  जो शायद अब जाकर छतीसगढ़ सरकार पूरी कर रही है. इस पत्रकार की रिपोर्ट पर आज वो पत्रकार अन्दर. कल उस पत्रकार की रिपोर्ट पर ये अन्दर. नहीं तो गोली मार कर पत्रकारों का खून बहाने वाले पाठक के हत्यारे तो खुली हवा में सांस ले ही रहे हैं. हे! कलमकारों लड़ते रहो बिल्लियों की तरह और नेता, अफसर आपकी लड़ाई में बन्दर की तरह रोटियां खायेंगे.

कौवा कान ले गया की तर्ज पर कलमकारिता प्रदेश में शुरू हो गई है ना, शायद उसी का नतीजा है जो आज प्रेस जगत का माहौल खराब हो रहा है. अरे कोई मामला जब आपकी बिरादरी से जुड़ा सामने आये तो कम से कम उसे तो जांच-परख लो. जनसम्पर्क विभाग जाकर वो सीडी तो देख आते जिस में कौन पत्रकार गोवा गए थे, साफ दिख रहा है. अखबार के मालिक कौडियों के मोल जमीन सरकार से ले लें तो गुनाह नहीं. चुनावी पैकेज के लिये सरेआम ब्लैकमेलिंग करें तब भी पत्रकारिता की वाह-वाह कीजिये. और एक पत्रकार ने विज्ञापन ले लिया और थोड़ी देर के लिये मान लो सरकारी पैसे से गोवा घूम आए (हालांकि पत्रकार शर्मा के मामले में ऐसा हुआ नहीं) तो ब्रम्ह हत्या का पाप हो गया. सरकार से धोखाधड़ी हो गई जनाब.

अरे, जब सीएम ने अपने विभाग की रकम दी, तभी तो पत्रकार घूमे. आगे कोर्ट में पुलिस को इस मामले में सीएम की भूमिका के बारे में भी बताना होगा. शासकीय धन का दुरूपयोग हुआ है और पुलिस की नजर में धन लेने वाला पत्रकार दोषी है तो देने वाले सीएम पर सवाल नहीं उठेंगे. अब जो भी हो, पुलिस ने तो अपना काम कर लिया और हम एक दूसरे की टांग खींचने में मस्त हैं. हमारा विश्वास है कि अच्छे और दमदार पत्रकार छत्तीसगढ की भूमि में खत्म नहीं हुए हैं, जिन्हें सलीका है कैसे बिगडे़ घोडों (अफसरों) से निपटना है और यही आज की जरूरत है.

नवोदित वेब पत्रकारिता पर इस प्रदेश की पुलिस ने आईटी एक्ट के तहत तीन मामले दर्ज कर लिए. बिना डीआईजी स्तर के अधिकारी की जांच के जुर्म कायम हो गया. नेट पर लिखने के लिये कम्प्यूटर की जब्ती बना ली गई.  थोडे़ दिन बाद पेपर में लिखने के लिये कलम की जब्ती बना लेना. अभी सब को मजा आ रहा है क्योंकि छोटे पत्रकारों की वेब न्यूज पोर्टल पर पुलिस का डंडा चला है. बाद में जब पुलिस के हौसले बढ़ेंगे और बडे़ अखबारों की न्यूज पोर्टलों पर कार्रवाई होगी तब पता चलेगा कि यूं ही आईपीएस लाबी सरकार पर हावी नहीं है.

अपील :  पत्रकारों से यदि आम जनता तंग है तो उसे अब प्रेस कौंसिल आफ इंडिया या फिर अदालत जाने की जरूरत नहीं, बस पुलिस को सुपारी दे दो. छत्तीसगढ की पुलिस ने अब पत्रकारों को निपटाना सीख लिया है. बस इतना मत भूलना कि जिस सरकार में संत बिरादरी यानी कि कलयुगी नारद (पत्रकार) सुरक्षित नहीं हैं वहां की जनता भी असुरक्षित होगी और जनता में असुरक्षा की भावना आई तो सरकार को बदलने से कोई रोक नहीं सकता. यह बात नारद जयंती मनाने वाले और भाजपा के मातृ संगठन आरएसएस से बेहतर और कौन समझ सकता है.

लेखक मनोज शर्मा हिंदी दैनिक समाचार पत्र के संपादक और छत्‍तीसगढ़ हाई कोर्ट के अधिवक्‍ता हैं. ये बिलासपुर प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं.

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0 Comments

  1. raghwendra sahu

    August 3, 2011 at 2:10 pm

    manoj bhaiya khub likhe ho padhkar accha lagaa….vastav me aaj dekha jaye to chhatisgarh me raman singh sabhi media house aur patrakron ko jeb me rakh liya hai….lekin kuch jagruk logon ko aawaj jarur uthani chahiye…….

  2. tabir hussain

    August 3, 2011 at 4:38 pm

    aapki baat me 100 fisadi sachai nazar aa rahi hai.darasal press maliko dwara patrakaro ka jamkar aarthik sosan kiya ja raha hai.lihaja patrakaro ki rajya satkar ke prati jhukav lajimi hai.lekin fir bhi hame apna zamir bachae rakhna hoga.hamari aapsi foot hi hame gart me le ja rahi hai.tabir hussain pradhan sampada saptahik prayagbhoomi nawapara rajim dst raipur cg

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