खबर भोपाल से है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय के पत्रकारिता विभाग के छात्रों को विभाग के ही नवनियुक्त शिक्षक सौरभ मालवीय, रचनात्मक लेखन करने से रोक रहे है। यह एक विश्वविद्यालय को लिए त्रासद स्थिति है और एक शिक्षक की जिम्मेदारी पर सवाल खड़ा करता है। क्या एक शिक्षक का यही दायित्व है कि वह अपने छात्रों के ही प्रतिभा विकास में बाधक बनकर उसे नष्ट करने में लग जाय? लेकिन सौरभ मालवीय ऐसा क्यूं कर रहे हैं, इसके पीछे भी विश्वविद्यालय की अंदरूनी राजनीति की गहरी साजिश है।
दरअसल, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय अपने छात्रों को पेशेवर ट्रेनिंग देने में नपुंसक किस्म का है। यहां जुगाड़ से पहुंचे नकारे, निकम्मे शिक्षकों की भरमार है। अपने छात्रों को प्लेसमेंट दिलाने में फिसड्डी साबित हुए इस विश्विद्यालय में प्रमुख चार विभाग हैं। एडवर्टाइज और पब्लिक रिलेशन विभाग, ब्रोडकास्ट जर्नलिज्म विभाग, मास कम्युनिकेशन विभाग और पत्रकारिता विभाग। हर साल पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों का प्लेसमेंट अच्छी जगह हो जाता है। इसके लिए, उस विभाग के विभागाध्यक्ष पुष्पेंद्र पाल सिंह दिन-रात मेहनत करते हैं। अन्य विभाग के विद्यार्थी दर-दर की ठोकरें खाते फिरते हैं। इस प्लेसमेंट के कारण से, पत्रकारिता विभाग के छात्रों के साथ अन्य विभाग की दुश्मनी सी चलती है। पत्रकारिता विभाग के दुश्मनों में सिर्फ अन्य विभाग के विद्यार्थी ही नहीं बल्कि शिक्षक भी शामिल हैं। यहां तक कि पत्रकारिता विभाग के कुछ शिक्षक भी चाहते हैं कि यह विभाग बर्बाद हो जाय।
जब तक कुलपति अच्युतानंदन मिश्र रहे तब तक वे छात्रों के हित में काम करते रहे। पत्रकारिता विभाग के दुश्मन सफल नहीं हो पाए। लेकिन, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रभाव से नवनियुक्त कुलपति के आते ही दुश्मन सक्रिय हो गए और पत्रकारिता विभाग के छात्रों को बर्बाद करने की साजिश रचने लगे। कहा जाता है कि सौरभ मालवीय कुलपति के खास आदमी है, जिसको इसलिए कुछ दिनों पहले पत्रकारिता विभाग का शिक्षक बना के भेजा गया है ताकि वह छात्र और छात्राओं का भविष्य चौपट करने का अमूल्य योगदान देकर कुलपति की मदद से विभाग के विभागाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ सके जिसपर आजकल पुष्पेंद्र पाल सिंह बैठे हुए हैं। आपको याद होगा कि पिछले साल कुलपति ने पुष्पेंद्र पाल सिंह को बरखास्त कर दिया था, जो छात्र आंदोलन के बाद फिर से बहाल हुए थे।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि एक राष्ट्रीय स्तर के विश्विद्यालय में छात्रों के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों? अगर कुलपति कुठियाला और सौरभ मालवीय को पुष्पेंद्र पाल सिंह के साथ दुश्मनी है तो इसका बदला छात्रों का भविष्य चौपट करके क्यों निकाला जा रहा है?
एक छात्र द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.












हनुमंत प्रभाकर
August 16, 2011 at 7:24 pm
महाराज आशुतोष जी ….हम नहीं जानते की आप कब इस पवित्र विश्वविद्यालय में पढ़ कर निकले है…पर ये तो सत्य है कि आपका ज्ञान अल्प है,इसमें निसंदेह कोई दो राय नहीं है .अव्वल आपको इस बात से अवगत करा दें कि आपके परमपूजनीय विवेकानंद तुल्य सौरभ मालवीय को अंग्रेजी का बहुत ही घटिया ज्ञान है.फिर पता नहीं उन्होंने कैसे दिल्ली में अपने ज्ञान की तारीफ़ करा ली.दूसरी बात यह है कि उनकी भर्ती प्रकाशन विभाग में हुई थी न कि शैक्षणिक कार्यों हेतु.कुठियाला जी ने नियमो के परे अपने मार्गदर्शन में पीएचडी कर रहे मालवीय कि नियुक्ति क्यूँ की?अखबार में इस नियुक्ति के लिए विज्ञापन क्यूँ नहीं आया ? कुठियाला जी के साथ पूर्व विश्वविद्यालय में क्या हुआ था क्या आपको इसका पता है?
आइये सौरभ मालवीय की बात करें ….क्या आपको पता है दिल्ली भाजपा कार्यालय में इनके साथ क्या हुआ था ?इन्हें नकारात्मक सम्मान से बेजा नवाज़ा गया था. तब इन्हें माननीय झा जी वापिस यहाँ भोपाल ले आये जहा से इन्होने उड़ना शुरू किया था, मतलब भोपाल ….श्री कुठियाला जी वीसी बनाये गए और इनका सम्मान बचाने की कोशिश की गयी.
शर्म करो आशुतोष झा तुमने विवेकानंद को बे-इज्जत किया.तुम अभी बच्चे हो पत्रकारिता में.चाटुकारिता मत करो.काबिलियत के दम पर आओ मैदान में…माई बाप ढूंढ़ कर नहीं.तुम खुलकर तो बोल नहीं पाते .तुम पत्रकारिता को कलंकित न करो और इस पेशे को छोड़ दो …
namit
August 13, 2011 at 12:53 pm
vibhag ko kharab karne ki himakat karne walo ko sawdhan karta ho. PP singh jaisa teacher milna mushkil hi nahi balki namumkin hai. ary inse kuchh sikh kar student ka future banae aur Singh sir ko poltics me na gasit kar student,s ka future banane de. bus sabhi se ye hi hamari gujarish hai.
monu sing
August 13, 2011 at 4:16 pm
yah news satyta se koso pare hai. news dene wala student pushpendra pal sing ka chamcha hai. jo ha mai ha milata hai. pps gadhe student ko bhi job apne source se dila dete hai. pps patrakarita nahi chatukarita seekhate hai. cabine mai baitker student ko napusang banate hai.
आज़ाद भगत
August 13, 2011 at 9:21 pm
कुलपति कुठियाला नैतिकताहीन आदमी है .इतने आरोप लगने के बाद भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफा नहीं दे रहा है. कारण प्रभात झा का हाथ होंना है. प्रभात झा स्वयं के कद को विस्तार देने के लिए कमजोर विपक्ष व सशक्त भूमिका में राज्य सरकार के प्रदेश अध्यक्ष है. स्वयं परप्रांतीय है व पावन पतित पत्रकारिता को सीढ़ी बना राजनीति में प्रवेश कर गए .स्वयं तो सिद्ध हो गए किन्तु पत्रकारिता विश्वविद्यालय पर टेढ़ी नज़र मार दी.फलस्वरूप उनके चाटुकार व पदचिन्हों पर चलने वाला दो कौड़ी का सौरभ मालवीय झाम्भेस्वर विश्वविद्यालय में महिला शिक्षक क पैर पड़ माफ़ी मांगने वाले कुठियाला को ले माखनलाल विश्वविद्यालय में काबिज़ हो गया . विश्वविद्यालय की महापरिषद का अध्यक्ष सीएम है जो झा से खुद त्रस्त है. पत्रकार निष्पक्ष होना चाहिए किन्तु ये कुठियाला और सौरभ मालवीय मिलकर प्रभु चावला , बरखा दत्त , वीर सांघवी तैयार कर रहे है.ये सौरभ मालवीय गुरु व वरिष्ठजनों का अनादर करना सिखाता है .कोई बड़ी बात नहीं की किसी दिन श्याम वर्ण वाले कुठियाला और मालवीय के चेहरे पर छात्र कालिख वास्तव में मल दे.
VAAMPANTHI
August 13, 2011 at 9:28 pm
kuthiala hatao patrakarita bachao……..saurabh hatao chhatra bachao…..
Ritesh
August 14, 2011 at 6:35 pm
kuthiala ne poori university ko barbaad kar dia hai. Aisi ghatiya rajneeti karne se pehle use kam se kam un bachho ke baare me to sochna chahiye, jo dher sari umeedein lekar is university me aate hain. jo log achha kam karne ki koshish karte hain, unhe jabran pareshan kia jaa raha hai….Lekin Samay ka Chakra phir ghoomega aur abhi hawa me ud rahe kuthiala zameen per honge.
आशुतोष झा
August 15, 2011 at 1:09 pm
निष्ठा पर सवाल उठाना विरोधियों का आरंभ से ही घृणित कार्य रहा है। भड़ास में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के बारे में पुष्पेंद्र की कुर्सी पर सौरभ की नजर को पढ़ा। जिसने भी इसे लिखा है उसकी मानसिकता पर मुझे तरस आ रही है। मैं भी इसी विश्वविद्यालय का छात्र रहा हूं। मैं भलीभांति सौरभ मालवीय व वहां के कुलपति को जिसपर आरोप लगाये गये हैं परिचित हूं। निश्चित तौर से यह आरोप की श्रेणी में नहीं आता है बल्कि इसे हम ओछी हरकत ही कहेंगे, जो वहां के ही चंद कुकर्मी शिक्षकों द्वारालिखवाया गया है।
जहां तक कुठियाला जी का सवाल है उनकी पत्रकारिता के क्षेत्र में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा है पहचान है देश-विदेश में एक कुशल शिक्षक के तौर पर वे जाने जाते हैं। इसलिए उन पर भद्दी टिप्पणी करना स्वयं को इस ओछी हरकत में शामिल करना है। सौरभ मालवीय वहां के एक जिम्मेदार शिक्षक हैं। प्रतिभा के धनी हैं, देश-दुनिया की पत्रकारिता के ज्ञान को बखूबी समझते हैं। दिल्ली में एक जिम्मेवार पद पर इसी क्षेत्र में अपनी महती भूमिका का निर्वहन भी उन्होंने किया है। मुझे स्मरण है जब विश्व के प्रमुख पत्रकारिता संस्थान कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के शिक्षक, जिसका नाम मुझे स्मरण नहीं आ रहा है दिल्ली के मावलंकर हॉ्ल में दोनों के बीच हुये बहस को सुना था, सौरभ जी की उक्त शिक्षक ने प्रशंसा की थी, कहा था तुम्हारे अंदर जो असीम संवदेनाएं हैं असीम ज्ञान को समेटने की जो ललकता है और देश के लिए कुछ करने की जो जिज्ञासा है वहीं तुमको यश-कीर्ति और आने वाले समय में यशस्वी बनायेगा। मुझे लग रहा है कि सकारात्मक कीर्ति के स्थान पर सुनियोजित दुष्प्रचार किये जाने का जो सिलसिला जारी है वह उन लोगों के लिए ठीक नहीं है जो इस कार्य में जुटे हैं।
स्वामी विवेकानंद के इस वाक्य कि यदि तुम्हारी निंदा कुप्रशंसा हो रही हो तो समझना चाहिए कि लोग तुम्हारे ज्ञान से घबड़ा गये हैं। मुझे भड़ास में माखनलाल के इस प्रसंग को पढ़ का ऐसा ही लगा कि जिस छात्र में विदेशी प्राध्यापक ने विवेकानंद की छवि देखी हो वह उस कार्य में शामिल नहीं बल्कि उसके नेतृत्व, छात्रों के बीच उसकी स्थायित्वता से वे सभी विचलित हैं।
विष्णु नारायण
August 18, 2011 at 11:30 am
हेमंत जी, आपने सौरभ मालवीय और कुलपति कुठियाला के बारे में तो बहुत कुछ कहा लेकिन पुष्पेंद्र पाल सिंह की करतूतों के बारे में कुछ कहते तो सच्चाई और स्पष्ट रुप से सामने आती..बिना पीएचडी किए ही पत्रकारिता विभाग की कुर्सी पर बरसों से काबिज पुष्पेंद्र पाल सिंह उस कुर्सी को अपनी बपौती समझते हैं और विभाग को वह अपनी रियासत की तरह चलाते हैं.वह भूल चुके हैं कि माखनलाल विश्वविद्यालय एक सरकारी संस्थान है, जिसके कुर्सी पर किसी एक आदमी का हक नहीं है..जो भी योग्य होगा उसे कुर्सी मिलेगी..यह सही है कि सौरभ मालवीय नए हैं लेकिन उनकी पीएचडी पूरी होनेवाली है.ऐसे में वरिष्ठता के आधार पर पत्रकारिता विभाग की कुर्सी पर सौरभ मालवीय का ही हक बनता है..विश्वविद्यालय के अन्य शिक्षक जैसे आशीष जोशी, मोनिका वर्मा, संजय द्विवेदी भी सौरभ मालवीय को योग्य मानते हैं..पुष्पेंद्र पाल सिंह अगर उस पद से हटते हैं तो विभाग का भला ही होगा क्योंकि वे अपने विद्यार्थियों को फूट डालो औऱ राज करो की नीति अपनाकर नियंत्रित करते हैं औऱ तानाशाही तरीके से बच्चों को दो साल तक अपनी इच्छा के अनुसार चलाते हैं..बच्चों की ट्रेनिंग पर वो कोई ध्यान नहीं देते इसलिए दो साल बीतने के बाद भी कई बच्चे टायपिंग तक नहीं सीख पाते हैं.. जो बच्चे उनकी चापलुसी में लगे रहते हैं उनको वो बड़े संस्थानों में नौकरी लगवाते हैं चाहे बच्चे को कुछ ना आता हो…अगर आप पूछेंगे तो मैं आपके सामने कई उदाहरण पेश कर दूंगा..साथ, विद्यार्थियों में किस लड़के के साथ किस लड़की का चक्कर चल रहा है, इसमें भी उनकी काफी रुचि रहती है..कुछ बच्चों पर उनकी खास कृपा रहती है जो विभाग की छोटी से छोटी सूचना उन तक पहुंचाते हैं…सीनियर बच्चों पर यह दबाब रहता है कि जूनियर बच्चों के सामने पुष्पेंद्र पाल सिंह को भगवान के रुप में पेश करे जो रोजी-रोटी देता है.लेकिन पूष्पेंद्र पाल सिंह भूल गए हैं कि वो भगवान नहीं आम इंसान हैं..पूर्व कुलपति अच्युतानंदन मिश्र को वो जिस तरह उंगलियों पर नचाते थे, कुलपति कुठियाला उनके इशारे पर नहीं नाचने वाले..कुलपति कुठियाला पुष्पेंद्र के नाक में नकेल डालने में अबतक लगभग कामयाब हैं, क्योंकि सुनने में आ रहा है कि कुलपति को खुश करने के लिए वह भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की सद्स्यता ले चुके हैं और अपने कुछ नजदीकी बच्चो को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सदस्य बनवा रहे हैं..साथ ही सौरभ मालवीय को खुश करने के लिए उन्होंने विभाग की कई जिम्मेदारियां उनको दे रखी है..जब हम्माम में सभी नंगे हैं तो एक नंगे को कुर्सी पर से उतारने औऱ दूसरे नंगे को उसपर बिठाने पर इतना शोर-शराबा क्यों..
anas
August 18, 2011 at 3:18 pm
.. भाई जिस महाशय ne ये पत्र भेजा है पहली बात तो वो कोई विचित्र मानसिकता वाला है या फिर विश्विद्यालय की छवि ख़राब करना चाहता है,सौरभ मालवीय हमे पत्रकारिता की शिक्षा देने में कोई कमी नही करते,वो प्रतिदिन हमे पत्रकार बनाने का प्रयत्न करते हैं,
हमारे संस्थान में राजनीति करने वालों की कोई जगह नही है,हम छात्र हैं,kripya हमे यही रहने den,
जिसने bhi ये टुच्चई की है वह न तो पत्रकारिता विभाग का हितैषी है न ही शिक्षक और छात्र का..
अनिमेष
August 19, 2011 at 10:02 am
अनस की बात सौ प्रतिशत झूठ है..माखनलाल चतुर्वेदी विश्विद्यालय में शिक्षकों के बीच खूब राजनीति होती है और वे इस राजनीति में छात्रों का भी उपयोग करते हैं..अनस जी भी पुष्पेंद्र पाल सिंह के प्रिय छात्र हैं और उनके कहने पर ही उन्होंने ये झूठा कमेंट यहां पर लिखा होगा..सौरभ मालवीय क्या हैं, ये सारी दुनिया जीनती है..पत्रकारिता की शिक्षा माखनलाल में बच्चों को कोई नहीं दे पा रहा..उपर लिखे गए पत्र में बहुत हद तक सच्चाई है..
विभाग का छात्र
August 19, 2011 at 8:40 pm
यह अनस भी सौरभ का चमचा छात्र प्रतीत होता है या यह कमेन्ट ही फर्जी है .फर्जी कहने का कारण यह है की अनस स्वयं घनघोर विरोधी है सौरभ मालवीय का .इसने कुछ दिन पहले विश्वविद्यालय में कुलपति के कक्ष में पाए जाने वाले राहुल जैन ,विशेष सोनी व मिलन भार्गव के पोस्टर व एबीवीपी के पोस्टर फाड़े थे,जिस पर इसे सौरभ मालवीय की कड़ी फटकार पड़ी थी.विश्वविद्यालय में यह फटे पोस्टर आज भी देखे जा सकते है ,जो कि छात्र राजनीती व इसके परिणाम के मूक गवाह है..तब यह तिलमिलाता हुआ माँ-बहिन की गालियाँ बकता हुआ घूम रहा था.इस बात के गवाह अन्य छात्र भी है .विशेष बात यह है कि अनस को उसकी कक्षा में ही किसी अन्य छात्र द्वारा पसंद नहीं किया जाता है…विदित हो अनस अकेला पड़ने के बाद व विपरीत तैयार हुए माहोल में अपने गृहनगर अल्लाहबाद भाग गया है .
neelam
August 22, 2011 at 12:22 pm
विष्णु नारायण आप शायद पीपी सिंह के व्यक्तित्व से भलीभांति परिचित नहीं है .होते तो इतनी बकवास व निरर्थक बातें कदापि न करते .सर्वप्रथम पीपी सिंह विधिवत रूप से विभागाध्यक्ष बने .उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर इस पद को सुशोभित करने के लिए लाया गया. वे अन्यों की तरह चाटते हुए नहीं पहुचे हैं.आप जिन अच्युतानंद की बात कर रहे है उनकी तो आपको जानकारी भी नहीं है .आपका यह कहना कि पीपी सिंह उन्हें उँगलियों पर नचाते थे आपकी औकात बताता है..आपके ज्ञान की वृद्धि के लिए यहाँ यह बताना उचित रहेगा कि अच्युतानंद वह व्यक्तित्व है जिनके बारे में कहा जाता है कि जब भी उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार बनती है तो उनसे मशविरा किया जाता है.वे अटल बिहारी के निकटतम है .और मीडिया कि बहुत ही बड़ी हस्ती है .आप उनके पैरों की धुल भी नहीं .आप कहते है की पीपी सिंह उन्हें उँगलियों पर नचाते थे सरासर रटाया हुआ संवाद है.
आपका कहना है कि संजय द्विवेदी ,मोनिका वर्मा और आशीष जोशी उन्हें काबिल मानते है …आपको स्वत: ही मूर्ख सिद्ध करता है .पत्रकारिता जगत में हर छोटे से छोटा आदमी जनता है कि ये तीनो कुलपति कुठियाला के भजन गाते है.जिस आशीष जोशी कि बात आप कर रहे है उसका लेखा जोखा उनके सहयोगी रहे बखूबी बांचते है(आज तक,आईबीएन 7 वाले ). यहाँ छात्र भी उनके पढ़ाने के कौशल से भली भाँती परिचित हो चुके है .उनकी नियुक्ति पर भी प्रश्नचिन्ह है .अखबारों में छपी खबरें इस बात का प्रमाण है.यह तिकड़ी उन्हें काबिल मानेगी ही न अब .संजय द्विवेदी सम्मानीय है व कुठियाला का शिकार होने से बच रहे है इसीलिए ऐसा कर रहे हो .सम्भावनाये कम है .और हां वे पीपी सिंह के घनिष्ठ व हितेषी हैं.मोनिका वर्मा के बारे कहना सर्वथा अनुचित होगा .वे एक अच्छी शिक्षिका है और आंधी में झुक गयी है .पत्रकारिता विभाग के समस्त छात्र उनका सम्मान करते है और वे भी पीपी सिंह को इस स्थिति में देख दुखी है .
दरअसल आप कुंठित व्यक्ति है …कुंठा व्यक्त कर रहे है .शायद आप वीराने में पले बढे हैं …जिस बात को आप कह रहे है पीपी सिंह द्वारा फूट डालना दरअसल वो प्रोत्साहन करना है .जिसे आप कह रहे है कि किसका चक्कर किस से चल रहा है ,वो है जानकारी रखना .माँ बाप अपने बच्चो को उनके हवाले करके जाते है .जिनका सर बहुत ही अच्छे से ख्याल रखते है. आपकी मानसिकता पर तरस आता है .मनोचिकित्सक को दिखाए नहीं तो एकांकी जीवन में ही रहेंगे …अथवा आपको परिवार से लतिया कर निकाल दिया जाएगा.
रही बात नौकरी दिलवाने तो सर्वप्रथम मीडिया को जानिये ….मीडिया में नौकरियां काबिल को ही मिलती है ….समझे…. नियोक्ता पागल नहीं कि ऐरे गेरे को रख ले…दो साल में बच्चे हर तरह से मीडिया के लायक बन जाते है..
चापलूसी करके एक बच्चे की नौकरी लगवाई जा सकती है सबकी नहीं ..यदि सबकी लगवाई जा सकती है तो हर साल नहीं…और जो नाकाबिल होता है और अन्ततोगत्वा निकाल ही दिया जाता है.पीपी सिंह के छात्र नौकरी से निकाले नहीं जाते …वे नौकरी बदलते है ….
समझे मूर्खाधिपति विष्णु नारायण .बंद कर दे चाटुकारिता ,तेरा भी भला होगा .
Rahul
September 7, 2011 at 6:58 pm
bakwas hai ye sakuch