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अन्‍ना को बिन मांगे मेरी सलाह

विष्‍णु गुप्‍तकर्पूरी ठाकुर-जयप्रकाश नारायण प्रसंग से अन्ना और उनकी टीम को सीख लेनी चाहिए। जयप्रकाश आंदोलन का राजनीतिकरण करने से ही इंदिरा गांधी की हेकड़ी टूटी थी। बोफोर्स की लड़ाई में भाजपा-कम्युनिस्ट पार्टियों की सक्रियता से ही राजीव गांधी को हार के रूप में सजा मिली थी और वीपी सिंह परिवर्तन के मसीहा बने थे। अन्ना को राजनीति से परहेज क्यों?

विष्‍णु गुप्‍तकर्पूरी ठाकुर-जयप्रकाश नारायण प्रसंग से अन्ना और उनकी टीम को सीख लेनी चाहिए। जयप्रकाश आंदोलन का राजनीतिकरण करने से ही इंदिरा गांधी की हेकड़ी टूटी थी। बोफोर्स की लड़ाई में भाजपा-कम्युनिस्ट पार्टियों की सक्रियता से ही राजीव गांधी को हार के रूप में सजा मिली थी और वीपी सिंह परिवर्तन के मसीहा बने थे। अन्ना को राजनीति से परहेज क्यों?

जन लोकपाल की लड़ाई का राजनीतिकरण करो तभी जनाक्रोश की अग्नि कारपोरेटीकरण की राजनीतिक परिदृश्य को जलायेगी, लोकतंत्र को भ्रष्टाचार मुक्त बनायेगी और लोकतंत्र को जनांका़क्षी बनायेगी। महात्मा गांधी /राम मनोहर लोहिया/ जय प्रकाश नारायण और वीपी सिंह से अन्ना को बड़ा मानना भूल होगी। अन्ना को जयप्रकाश नारायण कहने वाली शक्तियां थोड़ी जल्दीबाजी में हैं और रातों-रात ही नहीं बल्कि मिनटों में वह व्यवस्था परिवर्तन का स्वप्‍न देख रही हैं। ऐसी बातें/ ऐसे स्वप्‍न की बुनियाद निराशा व हताशा ही होती हैं। भ्रष्टाचार/कदाचार/भाई-भतीजावाद और लोकतंत्र में आम आदमी की तंग होती पहुंच से भारतीय आम आबादी हताशा/निराशा में ही नहीं हैं, अपितु उनके अंदर में धधकता/उमड़ता आक्रोश की अग्नि भी है। यह क्रोध की अग्नि केवल दिल्ली की सड़कों पर दिख रही है, ऐसी बात भी नहीं है। क्रोध की अग्नि का आकार देशव्यापी है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना को परिवर्तन का प्रतीक बनने के लिए या जयप्रकाश नारायण बनने के लिए उनके रास्ते लम्बे हैं/जटिल हैं/अवरोधों से सन्ना हुआ है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ पनपा जनाक्रोश/अग्नि की अंतिम परिणति तक ले जाने की चुनौतियां व जिम्मदारी अन्ना के उपर है। चाकचौबंद लोकपाल से भी आगे की राह देखनी होगी। जैसे लोकतंत्र में आम आदमी की सहभागिता का प्रश्न अति महत्वपूर्ण है। विधायिका में आज आम आदमी की आवाज लगातार कमजोर हो रही है। लोकतंत्र का कारपोरेटीकरण-नौकरशाही करण तेजी से हुआ है। इसी कारपोरेटीकरण व नौकरशाहीकरण की उपज हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। मनमोहन सिंह की पहली व निर्णायक प्राथमिकता वैश्वीकरण/कारपोरेटकीकरण और नौकरशाहीकरण के दानवों को तुष्ट करती है। ऐसा नहीं तो फिर हमारी पूरी राजनीति रिलायंस/मित्तलों व आउटलेटों की भाषा क्यों बोलती है। अंतिम व परिणतिपूर्ण समाधान की प्रक्रिया राजनीति ही हो सकती है। गैर-राजनीतिककरण की प्रक्रिया सतही और प्रतीकात्मक ही मानी जा सकती है। भारतीय सत्ता मुद्दे की राजनीतिक करण से ही डरती थी। बाबा रामदेव के आंदोलन पर बर्बर लाठियां इसीलिए चली कि मनमोहन-सोनिया सत्ता को कालेधन के मुद्दे का राजनीतिककरण होने का डर था। अन्ना ऐसा डर दिखाने से वंचित रहे हैं।

अन्ना और उनकी टीम के लिए राजनीति के सच्चे प्रतीक ‘कपूरी ठाकुर’ व ‘जयप्रकाश नारायण’ के बीच का एक रोचक प्रसंग टॉनिक्स-आक्‍सीजन के रूप में काम करेगा। प्रसंग आपातकाल से जुड़ा हुआ है। छात्रों के हठ पर मजबूरी में जयप्रकाश नारायण बिहार के एतिहासिक गांधी मैदान में छात्रों की विशाल सभा को संबोधित करने के लिए तैयार हुए थे। सभा के पूर्व कपूरी ठाकुर ने छात्रों की सभा में शामिल होने की सूचना भेजी थी। इस पर जयप्रकाश नारायण खफा हो गये और उन्होंने निर्णय सुना दिया कि छात्रों के आंदोलन का राजनीतिकरण नहीं किया जा सकता है इसलिए कपूरी ठाकुर छात्रों के आंदोलन में शामिल नहीं किया जा सकता है। शांतिप्रिय व्यक्तित्व की मसीहा कर्पूरी ठाकुर ने जयप्रकाश नारायण के सामने आगबबूला होते हुए लगभग दहाड़ते हुए कहा था कि आंदोलन और अभियान किसी की बपौती नहीं होती है जयप्रकाश नारायण जी। जयप्रकाश नारायण चारोखाने चित हो गये। कर्पूरी ठाकुर की बात सच्ची हुई। बिहार के छात्रों का आंदोलन का राजनीतिकरण हुआ और वह छात्र आंदोलन आगे चलकर जयप्रकाश नारायण आंदोलन के रूप में विख्यात हुआ।

जयप्रकाश नारायण नींबू-पानी की संस्कृति के व्यक्ति थे। आंदोलन-अभियान के लिए संगठन की जरूरत होती है। जयप्रकाश आंदोलन के साथ संघ भी जुड़ा और आधी कम्युनिस्ट धारा भी जुड़ी। समाजवादी धारा पूरी तरह साथ ही थी। तभी जाकर अराजकता और अभिमान की प्रतीक बनी इंदिरा गांधी की हेकड़ी चकनाचूर हुई थी। राममनोहर लोहिया को कांग्रेस के खिलाफ जनसंघ के साथ संबंध पर प्रतीकार नहीं था। वीपी सिंह ने बोफोर्स दलालीकांड को लेकर जिस राजीव गांधी की सत्ता उड़ाई थी उस बोफोर्स दलाली कांड के आंदोलन-अभियान में भाजपा भी थी व कम्युनिस्ट पार्टियां भी साथ-साथ थी। तभी जाकर बोफोर्स दलाली कांड में राजीव गांधी को राजनीतिक पराजय के रूप में सजा मिली और वीपी सिंह का राज स्थापित हुआ था। महात्मा गांधी खुद कांग्रेस पार्टी के सदस्य नहीं थे। पर उन्होंने कभी नहीं कहा था कि आजादी की लड़ाई गैर राजनीतिक है और कांग्रेस सहित अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों को आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लेनी चाहिए। यह अलग बात है कि उन्हों ने आजादी प्राप्ति के मिशन पूरा हो जाने के बाद कांग्रेस पार्टी को विघटित होते देखने की इच्छा थी।

इतिहास चौखट पर खड़ा है। इतिहास की कसौटी बहुत कुछ सीख देती है और गलतियों/ विसंगतियों/ अभिमानों से मुक्ति का रास्ता भी देती है। शर्त यह होती है कि आप इतिहास की कसौटियों का सही रूप में देखें और विश्लेषण तो करें। जयप्रकाश नारायण/ राममनोहर लोहिया/ कर्पूरी ठाकुर और वीपी सिंह के लोकतांत्रिक राजनीतिक इतिहास/ अभियान/ आंदोलन की सफलता-परिणति से अन्ना और उनकी टीम को सीख लेनी चाहिए। लोकपाल की लड़ाई गैर राजनीति कदापि नहीं है। गैर राजनीतिक लड़ाई जब है ही नहीं तब राजनीति से खुजली होने की बात कैसी है? अन्ना परिवर्तन की सेनानी जरूर बने हैं और देश की आम-आदमी की कसौटी पर भी वे खड़े है। उनकी ईमानदारी और प्राथमिकता सर्वश्रेष्ठ है। फिर भी उनमें राजनीतिक परिपक्वता की कमी है। उनके साथ खड़ी उनकी टीम भी गैर राजनीतिक है और अनुभवहीन भी है। राजनीति में जनता की नब्ज का प्रबंधन ही सर्वश्रेष्ठ सफलता है। राजनीति ही जीवन को संचालित करने वाली सभी प्रक्रियाओं को नियंत्रित और संचालित करती है। अन्ना और उनकी टीम हमेशा कहती है कि वे अपने आंदोलन का राजनीतिकरण नहीं करने देंगे। अन्ना की इसी बात को राजनीति गांठ मान लें तो फिर कौन सी सफलता हासिल करेगी अन्ना की टीम। राजनीति-लोकतंत्र का परीक्षण चुनाव है। चुनाव में यही संवर्ग परीक्षण की कसौटी होगा। वहां परीक्षण की कसौटी पर अन्ना और उनकी टीम कहां होगी? इसलिए यही राजनीतिक संवर्ग जनता की मजबूरी और विकल्पहीन हथियार के लाभार्थी होंगे।

सोलह अगस्त को अन्ना की गिरफ्तारी हुई। सत्रह अगस्त को देश के अन्य भागों की बात छोड़ दीजिये, सिर्फ दिल्ली में तीन लाख से अधिक बूढे/ जवान / बच्चे-बच्चियां और महिलाएं सड़कों पर उतरी थीं। इंडिया गेट पर एक लाख की भीड़ थी। इंडिया गेट से लेकर कस्तूरबा गांधी मार्ग और जंतर-मंतर को जोड़ने वाली सड़क पूरी तरह से आंदोलनकारियों से भरी थी। एक इंच की भी जगह शेष नहीं थी। दूसरे भागों में कितने लोग सत्रह अगस्त को सड़कों पर थे उसका कोई गणित नहीं है। इंडिया गेट से कस्तूरबा गांधी सड़क और जंतर-मंतर जोड़ने वाली सड़क पर उतरी भीड़ को ही नियंत्रित-प्रबंधित कर दी जाती तो मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी की सत्ता की सारी हेकड़ी टूट जाती। संसद से लेकर मनमोहन सिंह का आवास तक आंदोलनकारियों के कब्जे में होता। लाखों की भीड़ पर पुलिस-सेना दमन का रास्ता चुनने पर हजारों बार सोचती। भ्रष्ट मनमोहन सिंह सत्ता और सोनिया गांधी सहित पूरी भ्रष्ट कांग्रेसी जमात को सजा भी मिल जाती। पर अन्ना की टीम को सत्रह अगस्त की ताकत का अनुमान भी न था और न ही जुटी भीड़ के प्रबंधन कर भ्रष्ट सत्ता को उखाड़ फेंकने की हिम्मत व शक्ति थी।

जयप्रकाश नारायण आंदोलन की सफलता की निर्णायक इकाई राजनीति ही थी। संघ ने जहां पर्दे के पीछे से संगठनात्मक जिम्मेदारी निभायी थी,  वहीं समाजवादी इकाई ने आपातकाल की जागरूकता से जनता को आक्रामकता दिखायी थी। अन्ना को गैर राजनीतिक होने की हठधर्मिता जनाक्रोश पर पानी डाल दे देगी। लोकपाल की सफलता व्यवस्था परिवर्तन का सिर्फ एक पड़ाव भर हो सकता है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी सत्ता पूरी तरह से भ्रष्टचार में डूबी हुई है। कुछ मंत्रियों/ अधिकारियों को जेल भेज देने भर की उपलब्धियों से न तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है और न ही राजनीति जनांकाक्षी हो सकती है। भ्रष्टाचार के संरक्षक के तौर पर मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी खड़े हैं। अन्ना और उनकी टीम की यह आवाज होनी चाहिए कि मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी को जेल पहुचाओ व सुरेश कलमाडी-ए राजा को संरक्षण देने के खिलाफ दंड दो। अन्ना और उनकी टीम का भ्रष्ट मनमोहन सत्ता के खिलाफ सीधे हमले नहीं होने के कारण लोकपाल पर मनमोहन सिंह और कांग्रेसियों की हेकड़ी तनी हुई है।

मनमोहन सिंह जैसा गैर राजनीतिज्ञ और सिफारिशी व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल कर लेता है, यही हमारी राजनीतिक-लोकतांत्रिक अवसान की निशानी है। अगर मनमोहन सिंह राजनीतिज्ञ होते तो कारपोरेटिकरण की भाषा बोलने पर शर्म जरूर करते। महंगाई का सवाल और शिक्षा का सवाल भी अति महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। जन लोकपाल को लेकर भड़के जनाक्रोश का अगर राजनीति करण नहीं हुआ तो इसकी कीमत भी चुकानी होगी और फिर राजनीति-लोकतंत्र में आम आदमी की लड़ाई दुरूह पर दुरूह होती चली जायेगी। कारपोरेटीकरण/ नौकरशाहीकरण पर रोक नहीं लगेगी। राजनीतिक पार्टियां आम आदमी की जगह उद्योगपतियों और रिटायर्ड नौकरशाही को संसद-विधान सभाओं में भेजने की प्राथमिकताएं तय करती हैं। राज्यपालों का पद एक तरह से गैर राजनीतिज्ञों के लिए सुरक्षित मानने की राजनीतिक संस्कृतियां उत्पन्न हो रही हैं। कारपोरेटीकरण और नौकरशाही की पूरी प्रक्रिया आमजन विरोधी होती है। जन लोकपाल की लड़ाई को सलाम पर पूरी व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई को अंतिम निर्णायक जगह पहुंचाने के लिए आंदोलन और अभियान का राजनीतिक करण जरूरी है।

लेखक विष्‍णु गुप्‍त हिंदी के वरिष्‍ठ एंव जनपक्षधर पत्रकार हैं. इन्‍होंने समाजवादी और झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई है. पत्रकारिता के ढाई दशक के अपने करियर में झारखंड में दैनिक जागरण, रांची, स्‍टेट टाइम्‍स, जम्‍मू और न्‍यूज एजेंसी एनटीआई के संपादक रह चुके हैं. फिलहाल राजनीतिक टिप्‍पणीकार के रूप में अपना योगदान जारी रखे हुए हैं. इनसे संपर्क 09968997060 के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. Hargian

    August 23, 2011 at 8:34 am

    Shri mannji

    Appka vichar theck hai par comment ka kabal bhi nahi hai, kys hindustan ke log pagal hai jo anna ke awaj ke liya challe hai, app jese log chand Rs, ke liya appne comment change kar lita hai, aor anna appne word par stand hai

    Main be annna huun

  2. सत्यप्रकाश "आजाद"

    August 24, 2011 at 4:02 am

    मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना…अब तो सारा देश है अन्ना….जय हिंद

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