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गुफ्तगू में इस बार वरिष्‍ठ पत्रकार वीएस दत्‍ता की ‘शख्सियत’

इलाहाबाद से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के शख्सियत कालम के सितंबर-2011 अंक में वीएस दत्ता की शख्सियत प्रकाशित की गई है। पत्रिका ने इस कालम में वरिष्ठ पत्रकारों की जीवनी और उनके अनुभवों को प्रकाशित करने का सिलसिला शुरू किया है। इससे पहले के अंकों में नरेश मिश्र, फजले हसनैन और सुभाष राय के बारे में जानकारी दी गई थी। इन वरिष्ठ पत्रकारों से विजय शंकर पांडेय ने बात की है।

इलाहाबाद से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के शख्सियत कालम के सितंबर-2011 अंक में वीएस दत्ता की शख्सियत प्रकाशित की गई है। पत्रिका ने इस कालम में वरिष्ठ पत्रकारों की जीवनी और उनके अनुभवों को प्रकाशित करने का सिलसिला शुरू किया है। इससे पहले के अंकों में नरेश मिश्र, फजले हसनैन और सुभाष राय के बारे में जानकारी दी गई थी। इन वरिष्ठ पत्रकारों से विजय शंकर पांडेय ने बात की है।

श्री दत्ता इलाहाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक नार्दन इंडिया पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं, और हिन्दी दैनिक युनाइटेड भारत में नियमित कालम लिखते हैं। उन्होंने अपना पत्रकारिता का सफर वर्ष 1962 में इलाहाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक लीडर से शुरू किया था। उन्होंने बताया कि लीडर के तत्कालीन सीवाई चिन्तामणि नियम कानून के प्रति अत्यंत कठोर लेकिन दिल के बेहद विनम्र व सरल स्वभाव के मूर्धन्य पत्रकार थे, जिनके कठोर अनुशासन में रहकर उन्हें पत्रकारिता के गुण सिखने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि इसी अनुशासन और कर्तव्य के प्रति समर्पण की सीख ने उन्हें न तो अपने कर्तव्‍यों से मुंह मोड़ने दिया और न ही अपनी कलम से कभी समझौता किया।

‘जहां आम आदमी की सोच खत्म हो जाती है, पत्रकार वहीं सोचना शुरू करता है।’ पत्रकारिता की यह कसौटी श्री दत्ता पर अक्षरशः लागू होती है और उनकी यही दृष्टि उनके लिखे हुए कालम, संपादकीय व अन्य आर्टिकल में दिखाई देती है। चाहे वह सन 1964 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन का वक्त रहा हो या 1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी हिंसा का मामला। श्रीमती गांधी की हत्या के बाद उपजी हिंसा पर सवाल उठाते श्री दत्ता के अग्रलेख ‘कम्युनिटी को सजा नहीं’ का हवाला बीबीसी लंदन ने अपने समाचारों में कई-कई बार दिया था। अपने अग्रलेख में श्री दत्ता ने सिखों के प्रति की सामूहिक हिंसा पर बेबाक टिप्पणी करते हुए लिखा था कि किसी एक के अपराध के लिए उसकी पूरी कौम को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता और न ही सजा दी जा सकती है। वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के समय श्री दत्ता का अग्रलेख ‘सेकुलरिज्म इन टियर्स’ इतिहास का ऐसा दस्तावेज है जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगा।

पंजाब के गुरुदासपुर, जो अब पाकिस्तान में है, के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में जन्मे वयोवृद्ध पत्रकार श्री दत्ता का मानना है कि क्राइसेस से दिमाग शार्प होता है। उनकी यही सोच उनके हर कालम और संपादकीय में साफ दिखाई देती है। यही वजह है कि अपने पत्रकारिता जीवन की एक लंबी पारी खेलने के बावजूद श्री दत्ता आज भी युवाओं से कहीं ज्यादा चुस्त-दुरुस्त व कर्मशील हैं। अपनी दैनिक दिनचर्या की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि प्रातः चार बजे उठकर वह अपने पत्रकारिता के कार्य में संलग्न हो जाते हैं और अखबारों (युनाइटेड भारत और एनआईपी) के लिए आवश्यक कालम लिखने का उनका यही समय होता है। 5:30 बजे टहलने व नित्य कर्म के बाद फिर से अपने इसी कार्य में लग जाते हैं। 12 से चार बजे तक युनाइटेड भारत के कार्यालय में बैठते हैं और सांय पांच से आठ बजे तक एनआईपी में बैठकर सहायकों को निर्देश देते हैं और अन्य कार्य निपटाते हैं।

श्री दत्ता के प्रारंभिक दौर की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता के संबंध में पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने कहा कि साठ के दशक में पत्रकारिता का उद्देश्य सेवाभाव था। वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकार अपने कनिष्ठों को पत्रकारिता के सारे गुर सिखाकर गौरवांवित महसूस करते थे। समाचार का कार्यालय ही पत्रकार का स्कूल होता था, जहां अनुभव और अनुशासन की घुट्टी उन्हें पिलाई जाती थी। श्री दत्ता ने कहा कि आज संचार माध्यमों का तेजी से विकास हुआ है और नई तकनीकों ने काम को आसान बना दिया है। इसमें कंप्यूटर और लैपटॉप की भूमिका महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि इन सब सुविधाओं और व्यवस्थाओं के बीच आज की पत्रकारिता में त्याग, समर्पण और सेवाभाव का अभाव चिंता का विषय है। लखनऊ और दिल्ली जैसे महानगरों की पत्रकारिता करने से संबंधित एक सवाल के जवाब में श्री दत्ता ने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश कमलकांत वर्मा ने एक बार बातचीत के दौरान उनसे इलाहाबाद छोड़कर कहीं अन्यत्र न जाने का वचन लिया था और न्यायमूर्ति श्री वर्मा को दिए वचन का निर्वहन करते हुए इलाहाबाद में ही आजीवन पत्रकारिता करने को दृढ़ संकल्पित हैं। प्रेस रिलीज

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0 Comments

  1. Dr. Prabhat Chandra Mishra

    September 5, 2011 at 6:50 am

    RESPECTED DATTA SAHAB PAR HUM SABKO NAJ HAI. APKE ARTICLE KO PADD KAR MERE JAISE KAI YOUNGESTR NE PATRAKARITA KO DHARDAR BANAYA HAI. APKE SHATAYU HONE KI KAMNA KE SATTH.

    Dr.Prabhat Chandra Mishra
    PRO
    UPRTOU
    ALLAHABAD
    9415608644

  2. editor- gutfgu

    September 5, 2011 at 2:19 pm

    इस कालम को ज़ारी रखने के लिए आप सभी के सहयोग की ज़रूरत है. कृपया अपने शहर के वरिष्ठ पत्रकारों के बारे में जानकारी दें.
    संपादक-गुफ़्तगू
    mob. 9889316790
    [email protected]

  3. imtiaz ahmad ghazi

    September 5, 2011 at 4:37 pm

    दत्ता साहब इलाहाबाद की पत्रकारिता के स्तंभ हैं, बहुत सारे लोगों के लिए प्रेरणाश्रोत हैं, उन्होंने पूरा जीवन इमानदारी से पत्रकारिता के लिए जिया है, दलाली नहीं की है. ऐसे लोगों के बारे में आज युवा पीढ़ी को जानकारी होनी ही चाहिए.

  4. huma akseer

    September 5, 2011 at 4:44 pm

    dutta sahab ke baare mein jaankar bahut achcha laga. guftgu parivaar aur bhadas ko shukriya.

  5. raju, नई दिल्ली

    September 5, 2011 at 5:03 pm

    दत्ता साहब के बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा. इस उम्र में भी इतना सक्रीय रहना, वो भी इमानदारी के साथ, बड़ी बात है. गुफ़्तगू पत्रिका पढ़ना चाहता हूँ. कहाँ मिलेगी. सदस्य बनने के लिए क्या करें.

  6. Dr. B.P. Upadhyay

    September 6, 2011 at 10:46 am

    Adarniya datta Shahab ke bare me Guftgu ne ek sarahniya pahal ki hai. Is tarah ke *jevant* varishth patrakaro ke bare me patra-ptarikavo ko samman dene ki parampara shuru honi hi chahiya. Guftgu ko bahut bahut badhai.
    Dr. B.P. Upadhyay
    editor Sahityanjali Prabha, Allahabad
    Mob.: 9935205341

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