आम नागरिकों के दमन और उत्पीड़न के लिए कुख्यात पीएसी ने उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले के मीडियाकर्मियों को बर्बर तरीके से मारा-पीटा है। यह घटना इस लोकतांत्रिक देश में मीडियाकर्मियों की सुरक्षा के दावों की पोल खोलती है और सुरक्षाबलों की अलोकतांत्रिक मानसिकता का पर्दाफाश भी करती है। मीडियाकर्मियों पर पीएसी वालों के कहर के खिलाफ पूरा रुद्रपुर आंदोलित है। नेता, व्यापारी, छात्र सभी मीडियाकर्मियों के पक्ष में सड़क पर उतरे हैं। पत्रकारों पर ढाए गए जुल्म के पीछे कहानी कुछ यूं है-
जानकारी के अनुसार टीवी जर्नलिस्ट शंकर गुप्ता बुधवार की रात अपने किसी परिचित से मिलने 46वीं वाहनी पीएसी गए थे। वह 31वीं वाहिनी गेट से बाहर निकलने लगे तो उन्हें
पीएसी कर्मी हेमंत रावत और महेंद्र नेगी ने रोक लिया। जब उन्होंने अपना परिचय पत्रकार के तौर पर दिया तो दोनों अभद्रता पर उतर आए और मारपीट शुरू कर दी। हेमंत रावत और उसके साथियों ने शंकर को लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। इसकी शिकायत लेकर कुछ पत्रकार पीएसी के सेनानायक पीएस सैलाल से मिले तो उन्होंने कह दिया कि जवानों को गोली चलाने के आदेश हैं, उन्होंने कोई गलती नहीं की, बल्कि अपनी ड्यूटी की है। सेनानायक के रवैए से नाराज पत्रकार हाइवे पर आकर धरने पर बैठ गए। सूचना पर वहां पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने पत्रकारों को 46वीं वाहिनी के सेनानायक जीएस मर्तोलिया से जांच कराने का आश्वासन दिया। इस पर पत्रकार पूरन सिंह रावत और भरत शाह के नेतृत्व में पुलिस अधिकारियों के साथ श्री मर्तोलिया से बात करने गए। वहां संतोषजनक बातचीत के बाद जाम खोलने को कह दिया गया।
पत्रकार धरने से उठे ही थे कि पीएसी के बावर्दी जवानों ने पीएसी कैंपस से बाहर आकर पत्रकारों पर लाठियों से हमला कर दिया। इसमें एसपी अरोरा और राजेश तोमर समेत कई पत्रकार घायल हो गए। बाहर खड़े पुलिस के अफसरों तक को जवानों ने नहीं बख्शा। हमले के विरोध में पत्रकारों के साथ तीनों विधायक जिला अस्पताल गेट पर धरने पर बैठ गए। बाद में डीएम एसएस रावत के मामले की मजिस्ट्रेटी जांच कराने और पीएसीकर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के आश्वास्न पर जाम खुला।
इस पूरी घटना से संबंधित खबरें व तस्वीरें रुद्रपुर के स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई हैं…

















