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अन्‍ना तुम संघर्ष मत करो, तुम्‍हारे पास विशेषाधिकार नहीं है

लखनऊ। अन्ना तुम संघर्ष मत करो। क्योंकि हम तुम्हारे साथ नहीं हैं। हम कांग्रेस के साथ हैं। कांग्रेस ऊंची पार्टी है। इसमें ऊंचे लोग हैं। ऊंची सोच है। विद्वान सांसद हैं। सांसदों के पास विशेषाधिकार है। सांसद मनीष तिवारी आपको (अन्ना) नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचारी कह सकते हैं। वो किसी को भी कुछ कह सकते हैं। कितनी भी बेइज्जती कर सकते हैं। संसद का विशेषाधिकार है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ रायशुमारी को लालू यादव और अमर सिंह को तरजीह दे सकती है।

लखनऊ। अन्ना तुम संघर्ष मत करो। क्योंकि हम तुम्हारे साथ नहीं हैं। हम कांग्रेस के साथ हैं। कांग्रेस ऊंची पार्टी है। इसमें ऊंचे लोग हैं। ऊंची सोच है। विद्वान सांसद हैं। सांसदों के पास विशेषाधिकार है। सांसद मनीष तिवारी आपको (अन्ना) नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचारी कह सकते हैं। वो किसी को भी कुछ कह सकते हैं। कितनी भी बेइज्जती कर सकते हैं। संसद का विशेषाधिकार है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ रायशुमारी को लालू यादव और अमर सिंह को तरजीह दे सकती है।

अन्ना क्या आपके पास भी कोई विशेषाधिकार है? जब नहीं है तो किस मुंह से सिविल सोसाइटी के लोग सांसदों पर टिप्पणी कर रहे हैं। अन्ना आप आम जनता हैं तो जनता की ही तरह रहना चाहिए। बस पांच साल बाद या जब भी चुनाव हो मतदान करने जाना चाहिए। अन्ना आप के साथ रहने पर एक समस्या उत्पन्न हो रही है। आदमी सच बोलने लगता है। अब अभिनेता ओम पुरी को ही लीजिए। किसी को गंवार कहते, यहां तक तो गनीमत थी। अब यह क्या कहने की जरूरत थी कि चुनाव के दौरान प्रत्याशियों से जो भी मिले ले लो। एक हाथ में पैसे और दूसरे हाथ में बोतल ले लो लेकिन वोट उसी को दो जो सही हो। सरेआम मंच से हजारों लोगों के सामने चुनाव जिताऊ रणनीति का खुलासा करना कहां तक जायज है? सच बोलना ओम पुरी को महंगा पडऩा ही था सो पड़ा। सांसदों के विशेषाधिकार हनन के दायरे में आ गए। हम एक बात दावे से कह सकते हैं कि अगर पुरी ने वर्षों से चली आ रही वोट के बदले कुछ ‘दान-दक्षिणा’ की परम्परा का खुलासा नहीं किया होता तो वे कतई विशेषाधिकार हनन के दायरे में नहीं आते।

अब मैं अपनी आखों देखा एक वाकया बताता हूं। हालांकि मैं लिखत-पढ़त में इसका कोई दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत नहीं कर सकता। कुछ सालों पहले मुझे उत्तर प्रदेश से सटे एक राज्य के विधानसभा चुनाव में कवरेज का मौका मिला था। इस राज्य में एक पार्टी के मुख्यमंत्री लगातार दो चुनाव जीत कर सरकार बना चुके थे। राज्य में सडक़, बिजली और पानी का नितांत अभाव था। सडक़ में गड्ढा है या गड्ढे में सडक़, यह पता नहीं चलता था। फिर भी मुख्यमंत्री जी की बल्ले-बल्ले। दो बार मात खाने के बाद विपक्षी पार्टी ने सत्तारूढ़ दल के फंडे का पता किया। और तीसरे टर्म के चुनाव में इस फंडे का इस्तेमाल कर दिया। सत्तारूढ़ पार्टी के लोग आगे-आगे और पीछे-पीछे विपक्षी पार्टी लोग। विपक्षी दल ने मात्रा थोड़ी बढ़ा दी थी। हो वही रहा था जो ओम पुरी ने कहा था। परिणाम आया तो विपक्षी पार्टी की जीत का परचम लहरा गया।

अन्ना हम आपके साथ इसलिए नहीं रह सकते क्योंकि कांग्रेस का विरोध कर हमें न तो आयकर की नोटिस लेनी है न सीबीआई का छापा डलवाना है और न ही संसद की अवमाना का दोषी होना है। अगर आप एक शर्त पूरी कर दें तो हम आपके साथ रह सकते हैं। आप अपने टीम में मनीष तिवारी जैसे मनीषी को तरजीह दें। दिग्विजय सिंह जैसे जहीन नेता प्राथमिकता दें जो ओसामा का भी सम्मान करते हैं।

पत्रकार अनिल भारद्वाज का यह लेख लखनऊ-इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट में हो चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया जा रहा है.

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0 Comments

  1. sandeep

    September 14, 2011 at 3:22 pm

    bahut sahi likha hai. aapne..

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