Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

अमेरिका में रोबो जर्नलिस्टों ने काम शुरू किया, पुलित्जर भी पाएंगे ये!

: परंपरागत पत्रकारिता बनाम मशीनी पत्रकारिता की बहस : रोबो जर्नलिस्टों से पार पाने के लिए रचनात्मक होना ही विकल्प : अमेरिकी समाचार पत्र न्यूयॉर्क टाइम्स ने हाल में रोबो जर्नलिस्ट से संबंधित एक रिपोर्ट प्रकाशित कर एक बार फिर परंपरागत पत्रकारिता बनाम मशीनी पत्रकारिता की बहस को गरमा दिया है। यह रिपोर्ट मुख्यत: नरेटिव साइंस नाम की कंपनी के बनाए सॉफ्टवेयर पर केंद्रित है।

: परंपरागत पत्रकारिता बनाम मशीनी पत्रकारिता की बहस : रोबो जर्नलिस्टों से पार पाने के लिए रचनात्मक होना ही विकल्प : अमेरिकी समाचार पत्र न्यूयॉर्क टाइम्स ने हाल में रोबो जर्नलिस्ट से संबंधित एक रिपोर्ट प्रकाशित कर एक बार फिर परंपरागत पत्रकारिता बनाम मशीनी पत्रकारिता की बहस को गरमा दिया है। यह रिपोर्ट मुख्यत: नरेटिव साइंस नाम की कंपनी के बनाए सॉफ्टवेयर पर केंद्रित है।

लगभग एक दशक के शोध के बाद बनाए इस सॉफ्टवेयर के जरिए सूचनाओं को आसानी से समाचार की शक्ल में ढाला जा सकता है। इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल अभी खेल व वाणिज्य से जुड़ी सूचनाओं को समाचार की शक्ल देने में किया जा रहा है। महत्वपूर्ण बात यह कि बिग टेन नेटवर्क जैसी कंपनियों ने इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से जुड़ा इस तरह का प्रयोग कोई नया नहीं है, लेकिन इस सॉफ्टवेयर में तार्किकता को खास जगह देने का दावा किया गया है। यही बात इस सॉफ्टवेयर को रोबो जर्नलिस्ट को बढ़ावा देने वाले दूसरे सॉफ्टवेयर से खास बना रही है। अन्यथा 2010 की शुरुआत से अमेरिका में खेलों के आंकड़े देने वाली एक प्रमुख वेबसाइट स्टेटशीट यह प्रयोग कर रही है।

इसी तरह मैक्डील स्कूल ऑफ जर्नलिज्म व नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की इंटेलीजेंट इनफॉरमेशन लेबोरेटरी मिलकर स्टेटमंकी नाम का एक प्रोग्राम बना रही हैं, जो आंकड़ों की गणना कर स्वत: पूरी खबर लिख देगा। नरेटिव साइंस के सह संस्थापक ने यह कहने में भी हिचक नहीं दिखाई कि अगले पांच साल में इस कंप्यूटर प्रोग्राम को पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार पुलित्जर भी मिल जाएगा। लेकिन, सवाल कंप्यूटर प्रोग्राम को पुलित्जर पुरस्कार मिलने के दावे का नहीं है। सवाल मशीनी पत्रकारिता बनाम पारंपरिक पत्रकारिता का है। इस बहस के बीच एक बड़ा सवाल पत्रकारों के रचनात्मक कौशल का भी है।

फिलहाल, रोबो जर्नलिस्ट की बाजीगरी खेल व वाणिज्य संबंधी सूचनाओं को खबर बनाने में दिख रही है, क्योंकि इन क्षेत्रों में आंकड़ों के इर्द-गिर्द खबर का एक फॉर्मूला विकसित हो चुका है। अमेरिका से लेकर भारत तक में कुछ खबरों को लिखने का एक निर्धारित ढंग है, लिहाजा इस फॉर्मेट को कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए पाया जा सकता है। इतना ही नहीं, जिन खबरों में सिर्फ सूचनाओं का संग्रहण मात्र है, उन्हें भी कंप्यूटर प्रोग्राम आसानी से लिख सकता है। मसलन-बॉलीवुड कलाकार अमिताभ बच्चन अपने ट्विटर खाते पर कुछ कहते हैं तो संपादक अथवा संबंधित अधिकारी के एक निर्देश पर प्रोग्राम झट से खबर लिख देगा।

इस खबर में न केवल ताजे ट्वीट का जिक्र होगा, बल्कि कुछ पुराने चर्चित ट्वीट और शाहरुख के ट्वीट पर किसी चर्चित हस्ती की प्रतिक्रिया शामिल होंगी। मशीनी पत्रकार इंसान से कई गुना तेज काम कर सकता है। दरअसल, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पूरी दुनिया में कई तरह की खबरों को लिखने का एक फॉर्मेट बन गया है। भारतीय मीडिया की बात करें तो प्रेस विज्ञप्तियां ज्यादातर जगहों पर एक ढर्रे में लिखी जाती हैं। यही हाल खेल और बिजनेस की कई खबरों का भी होता है। इस ढर्रे की पत्रकारिता को कंप्यूटर चौपट कर सकता है। नरेटिव साइंस के सॉफ्टवेयर से अभी 500 शब्द की एक स्टोरी को लिखने में आ रही लागत 8 से 10 डॉलर के बीच है, जो सॉफ्टवेयर की लोकप्रियता बढ़ते ही जमीन पर आ जाएगी।

न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट में रोबो जर्नलिस्ट का गुणगान है। इसी रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि भविष्य में कहीं न्यूजरूम में इंसानों की जगह कंप्यूटर ही न हों! ये अतिरंजित है। सिर्फ इसलिए नहीं, क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज को हैंडल करना मशीन के बूते से बाहर है या कंप्यूटर अचानक इंटरव्यू नहीं कर सकता, बल्कि इसलिए भी क्योंकि पत्रकारिता में एक सोच की आवश्यकता होती है। पत्रकारिता से सामाजिक सरोकार जुड़ते हैं। मशीन सिर्फ निर्देशों का पालन कर सकती है, बौद्धिक विमर्श नहीं। वो खेल में भी मुकाबले की रिपोर्ट तो लिख सकती है, लेकिन खेल के पीछे की राजनीति का खुलासा बिना पत्रकार के कलम चलाए मुमकिन नहीं। लेकिन, इसमें भी शक नहीं कि दोहराव वाली पत्रकारिता करने के लिए मशीन से बेहतर विकल्प नहीं।

फिर तेजी से बुद्धिमान होते सॉफ्टवेयर पत्रकारों को चुनौती देंगे ही। नरेटिव साइंस व अन्य सॉफ्टवेयर की सफलता के बीच यह तय है कि इनका क्रियान्वयन जल्द दुनिया के तमाम मीडिया संस्थानों में दिखाई देगा। भौगोलिक सरहदों और भाषाओं से परे। ऐसे में, बड़ा सवाल क्रिएटिविटी का है। मशीन क्रिएटिव नहीं हो सकतीं और आने वाले दिनों में रोबो जर्नलिस्ट से पार पाने के लिए रचनात्मक होना ही पत्रकारों के पास प्रमुख विकल्प होगा।

लेखक पीयूष पाण्डेय साइबर पत्रकार हैं. उनका यह लिखा ‘दैनिक भास्कर’ से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...