
गुरुशरण सिंह
मजदूरों के लिए उन्होंने नाटक लिखे। उनके बीच नाटक किये। वे पंजाब के क्रान्तिकारी आंदोलनों से जुड़े गये। उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सरकारी आतंकवाद के साथ साथ उन्होंने सिख आतंकवाद के खिलाफ भी संघर्ष किया। आतंकवादियों की धमकियों के आगे वे कभी झुके नहीं। पंजाब के आतंकवाद के खिलाफ उन्होंने ‘बाबा बोलता है’ नाटक लिखा। अमृतसर नाट्य कला केन्द का गठन किया। उन्होंने पंजाबी साहित्य की मासिक पत्रिका ‘समता’ का प्रकाशन भी किया। उनके निधन पर जन संस्कृति मंच ने गहरा शोक प्रकट किया है और कहा है कि उनके निधन से हमने क्रान्तिकारी संस्कृतिकर्मी खो दिया है।
जसम के संयोजक कौशल किशोर ने अपनी शोक संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि वे सच्चे मायने में भगत सिंह के विचारों और उनकी परम्परा के नाटककार थे। भगत सिंह के जीवन और उनके विचारों पर लिखा उनका नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ ने भगत सिंह के विचारों को फैलाने का काम किया। कौशल किशोर ने उनके साथ की अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा कि जब अस्सी के दशक में हमलोग जन संस्कृति मंच का गठन कर रहे थे, वे न सिर्फ इस मंच के साथ जुड़ गये बल्कि वे हमारे मंच के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुने गये।
इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी संगठनों के साथ भी उनका गहरा लगाव था। जसम के अध्यक्ष के रूप में अस्सी के दशक मे अपनी टीमों के साथ उन्होंने उत्तर प्रदेश व बिहार का दौरा किया। इसी क्रम में वे कई बार लखनऊ भी आये। उन्होंने लखनऊ की सड़कों व नुक्कड़ों पर ‘गड्ढा’, ‘जंगीराम की हवेली’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और फैज व जगमोहन जोशी के गीतों के द्वारा जो सांस्कृतिक लहर पैदा की, वह आज भी लागों को याद है। वे वास्तव में ऐसे संस्कृतिकर्मी थे जिनका सपना जनता के हिन्दुस्तान का निर्माण करना था। उनके निधन से हमने जन सांस्कृतिक आंदोलन का सच्चा योद्धा खो दिया है।












कुमारसौवीर, लखनऊ
September 29, 2011 at 3:52 pm
खबर ने आंलें छलछला दीं।
मुझे याद है सन 78 से 86 तक का वह दौर जब रंगकर्म हमारी रगों में दौड़ा करता था।
शान-ए-सहारा के आंदोलन के साथ ही लखनऊ में मजदूर एक खास अंदाज में लामबंद हो रहे थे। जनता भी उद्वेलित थी।
इसके कारण भी जीवंत थे। एक ओर मालिकों का क्रूर और भयानक स्तर तक शोषक चेहरा था, दूसरी तरफ यूनियन कार्बाइड की भोपाल इकाई में हुआ मिथाइल आइसो साइनाइड हादसा जिसमें मजदूरों समेत हजारों लोग भोर होते होते मौत के घाट उतर चुके थे। उधर अमृतसर में भिंडरावाला से हुई भिडंत में मात-जीत पायी राजनीति थी।
लखनऊ किसी से पीछे नहीं था। हम नुक्कड़ नाटकों का सहारा ले रहे थे।
कि अचानक एक दिन खबर मिली कि गुरूशरण सिंह लखनऊ आ रहे हैं। पूरी सादगी, व्यवहार में बेहिसाब भव्यता, नाटकों का प्रस्तुतिकरण अपनी पुख्ता कसावट में, हर चीज में चुस्ती।
हम उनकी टीम को हर उस सम्भव जगह तक पहुंचा रहे थे, जहां उनका प्रदर्शन किया जा सकता। नाटक में नगाडा का प्रयोग भी हमें रोमांचित कर रहा था।
खासकर वह गाना—- ऐ लाल फरेरे तेरी कसम, इस खून का बदला हम लेंगे।
या फिर—- हमारे दोनों पहलू हैं, कभी शोला कभी शबनम।
रोम-रोम फडक उठता था हमारा। किसी युवा की तरह जोश में थे तब शायद साठ साल के कसरती बदन वाले सरदार जी।
इन गीतों को उसी जोश में हमने न जाने कितने मौकों पर गाया।
आज उनकी खबर पाते ही यह गाना फिर होठों पर थिरकने लगा, पहले की ही तरह। लेकिन इस बार उसकी संगत हमारे दिल की धडकनें नहीं, बल्कि हमारी लगातार भिंची जा रही आंखें दे रही हैं, हिचकियां दे रही हैं।
सरदार जी, हम गा रहे हैं आपके दिये जोश को संजोये रखने, खुद को जीवंत रखने के लिए। लेकिन रो भी रहे हैं कि अब वैसा हौसला हमे कौन देगा।
छोड दिया न हमें इस बार हमेशा-हमेशा के लिए।
लेकिन आप ऐसे तो नहीं थे। फिर अचानक यह—-