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मेरे जगजीत सिंह

1983-84, 12-13 साल का किशोर मैं, गाँव जहाँ ले-देकर बाहरी दुनिया से जुड़ने का माध्यम रेडियो था। पत्र-पत्रिकायें, कॉमिक्स, उपन्यास वगैरह मिल जाते थे कस्बाई शहर आरा आने पर। उन दिनों रेडियो नेपाल से हिन्दी फिल्मी गीतों के अलावा गजलों के प्रोग्राम भी आते थे। उस दौरान दो गजलों ने हमारी चेतना को घेरा था। एक तो वही मशहूर गजल- वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी और दूसरा ‘दुनिया जिसे कहंते हैं जादू का खिलौना है।’

1983-84, 12-13 साल का किशोर मैं, गाँव जहाँ ले-देकर बाहरी दुनिया से जुड़ने का माध्यम रेडियो था। पत्र-पत्रिकायें, कॉमिक्स, उपन्यास वगैरह मिल जाते थे कस्बाई शहर आरा आने पर। उन दिनों रेडियो नेपाल से हिन्दी फिल्मी गीतों के अलावा गजलों के प्रोग्राम भी आते थे। उस दौरान दो गजलों ने हमारी चेतना को घेरा था। एक तो वही मशहूर गजल- वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी और दूसरा ‘दुनिया जिसे कहंते हैं जादू का खिलौना है।’

बाद में जब मूल गजल को पढ़ा तो देखा कि वहाँ जादू की जगह मिट्टी है, खैर, मिट्टी भी तो अपने आप में जादू ही है। निदा फाजली का नाम जरूर हमने सुन रखा था, ‘अर्थ’ और ‘साथ-साथ’ जैसी फिल्में आ चुकी थीं और उनके गाने भी रेडियो से खूब सुनाई देते थे। इन फिल्म में कई गजलों का इस्तेमाल हुआ था, उनमें ‘तुमको देखा तो ये ख्याल आया’, ‘झुकी झुकी सी नजर बेकरार है कि नहीं’, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ और ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो’ किशोर उम्र होने के बावजूद हम पर बड़ा असर डालती थीं। हालाँकि इस आवाज को इसके पहले ही हमारी पीढ़ी फिल्म ‘प्रेमगीत’ में सुन चुकी थी। होठों से छू लो मेरा गीत अमर कर दो- हमारे किशोर उम्र में इश्क की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का बड़ा शालीन जरिया था, जो बाद में भी इस लिहाज उतना ही मकबूल रहा।

यह गीत है तो प्रेम गीत पर इसमें भी कहीं कोई गहरी कसक है, कहीं कोई विवशता है, जो गायक की आवाज के जरिये कुछ ज्यादा ही मुखर होती है। उसी में एक पंक्ति आती है- जग ने छिना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा, तुम हार के दिल अपना मेरा प्यार अमर कर दो। तो यह जो लगातार अपने प्रिय खोने का अहसासों के बीच किसी से अपना बनने का जो यह निवेदन था, वह कहीं दिल के भीतर गहराई में उतर जाता था। तब मैं काफी इंट्रवर्ट था। पिता बेशक नौकरी में थे, पर संयुक्त परिवार में अभाव डेरा डाले रहता था, और अभाव जो है वह गम को छुपाने का अभ्यास बना ही देता है- क्या गम है जिसे छुपा रहे हो। वो वही दौर था, जब मैंने जगजीत सिंह को जाना, धीरे-धीरे उस आवाज से घिरता गया और लम्बे समय तक वे मेरे प्रिय गजल गायक बने रहे। मुझसे पाँच साल छोटे मेरे सबसे छोटे मामा युगांशु भी जगजीत सिंह की आवाज के तभी दीवाने हुए।

मेंहदी हसन तक थोड़ा देर में पहुँचा, पर जगजीत सिंह के साथ-साथ ही गुलाम अली भी मेरी पसंद के दायरे में शामिल हुए। ‘चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है’, ‘अपनी धुन में रहता हूं’, ‘दिल में एक लहर-सी उठी है अभी’ जैसे कई गजल थी, जिन्हें हम सुनना पसंद करते थे। मुझे याद है, प्रातः तीन बजे रेडियो से पहली बार इब्ने इंशा की लिखी हुई गजल- ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं, गुलाम अली की आवाज में सुनी और कुछ दिनों तक उसका जादू मुझ पर छाया रहा। उन्हीं दिनों रेडियो पाकिस्तान से रूना लैला की आवाज में ‘पिया आ जा, सावन आया’, फरीदा खानम की आवाज में ‘आशियाने की बात करते हो, दिल जलाने की बात करते हो’ तथा दिलराज कौर की आवाज में ‘इतने मुद्दत बाद मिले हो, किन सोचों में गुम रहते हो’ सुना, जिसे आज तक नहीं भूल पाया। पहली बार इन गजलों को सुनते वक्त जो एहसास था, वह किसी कीमती चीज, किसी दुर्लभ वस्तु की तरह चेतना के किसी तलघर में मौजूद है, जहाँ से वह किसी रेडियो एक्टिव तत्व की तरह वह आज तक रिसता रहता है। हालाँकि तब भी डेढ़-दो दशक से अधिक तक जगजीत सिंह की ही आवाज ज्यादातर करीब रही।

बेशक जगजीत सिंह मेंहदी हसन नहीं थे। शब्दों में निहित भावों की तीव्रता को, उसमें मौजूद अर्थ की गहराई को जिस बारीक तरीके से मेंहदी हसन की आवाज प्रक्षेपित करती है, वैसी व्यापक रेंज जगजीत सिंह की नहीं थी। मगर अपने समय के विषाद, अवसाद और अधूरेपन को अपनी जिस ठहरी हुई आवाज में जगजीत सिंह ने पेश किया, वही उनकी ताकत थी। गुलाम अली जहाँ दर्द को तरल बना देते है, वहीं जगजीत सिंह की आवाज में दर्द मानो क्रिस्टलाइज्ड हो जाता है। यहाँ आँसू बहकर खत्म नहीं होते, बल्कि क्रिस्टल की तरह चेहरे पर जम जाते हैं। एक मशहूर पोस्टर की तरह, जिसमें एक औरत की आँखों से टपकता आँसू हमें दिखाई देता है। आवाज का यह फर्क महसूस करना हो, तो गालिब की उस बेहद मशहूर गजल- ‘आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक’ को दोनों की आवाज में सुनना चाहिए।

बेशक गुलाम अली की आवाज और गायिकी के अंदाज का कोई जवाब नहीं। उनकी साधना और हुनर का जादू भी गालिब की इस गजल को गाते हुए महसूस होता है, सुनते हुए अच्छा भी लगता है, महसूस होता है जैसे मक्खन में कोई तीखी छुरी उतर रही है। अंततः हम एक सुकून की तरफ जाते हैं, बकौल गालिब- दर्द का हद से गुजर जाना है दवा हो जाना। लेकिन जगजीत सिंह की आवाज में यह गजल सुनते हुए दर्द दवा नहीं होता, बल्कि वह और भी संघटित होता प्रतीत होता है, जैसे दर्द का कोई पहाड़ सीने पर आकर काबिज हो गया हो। कई बार हम उस पहाड़ को अपने से परे धकेल देना चाहते है, पर वह बार-बार हम पर सवार हो जाता है। उसमें जो भारी ठहराव-सा है, दरअसल कई स्तरों पर वह हमारे वक्त का भी ठहराव है।

मानवीय संबंधों में जिस त्रासदी को हमारा समाज झेल रहा है, जगजीत सिंह की आवाज उस त्रासदी को मूर्त करने वाली आवाज है। उनकी गायी हुई गजल की कुछ पंक्तियां याद आती हैं- मैं तो अब उकता गया हूं, क्या यही है कायनात’, ‘सारी दुनिया में मसीहा है, अपने ही घर में वो अकेला है’।

यह टिप्पणी 25 सितंबर को दिल्ली से आरा आते हुए मगध एक्सप्रेस में लिखी थी, जबर्दस्त बारिश के कारण मुगलसराय में रेलवे ट्रैक जाम था, ट्रेन बहुत लेट थी। मोबाइल पर फेसबुक लॉग ऑन किया, तो किसी जल्दबाज ने जगजीत सिंह की मृत्यु की सूचना लगा रखी थी। उसके बाद मैंने यह टिप्पणी लिखी। हालांकि उसके बाद भी जिन्दगी के लिए उनकी जद्दोजहद जारी रही, 10 अक्टूबर को आखिर वह नहीं रहे। इस टिप्पणी को अपने प्रिय गजल गायक को मेरी श्रद्धांजलि समझी जाए।

सुधीर सुमन वरिष्‍ठ पत्रकार और लेखक हैं.

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0 Comments

  1. jay singh

    October 13, 2011 at 7:27 am

    sir,
    aap ki is gazal ki bareek samajh ko sat sat naman.

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