अमर उजाला के ग्रुप एडिटर शशिशेखर, सहारा टाइम्स के संपादक उदय सिन्हा, आई-नेक्स्ट के ग्रुप एडिटर और सीईओ आलोक सांवल, पायनियर, लखनऊ के प्रिंसिपल करेस्पांडेंट अनिल यादव, दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार विष्णु त्रिपाठी, जनसंदेश न्यूज चैनल के मुख्य सलाहकार हेमंत तिवारी, दैनिक जागरण, आगरा के स्थानीय संपादक और महाप्रबंधक सरोज अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में विनोद शुक्ला जी की शख्सियत को लेकर संक्षेप में कुछ बातें कहीं हैं, जो इस प्रकार है-
मैंने उनके साथ काम किया है। वे अकेले ऐसे आदमी थे जो संपूर्ण अखबार इंडस्ट्री को रिप्रजेंट करते थे। अब ये परंपरा बिलुप्त हो रही है, इसीलिए लोग आदमकद नहीं बन पा रहे हैं।
-शशिशेखर, ग्रुप एडिटर, अमर उजाला
वे मेरे लिए पूज्यनीय थे। जब मैं पहली दफा लखनऊ में आया तो उन्होंने बड़े भाई की तरह स्नेह दिया और उंगली पकड़कर लखनऊ में चलना सिखाया। मैं उन्हें पत्रकारिता के पुरोधा के रूप में जानता हूं और मानता हूं। उनमें संपादकीय क्षमता अद्वितीय थी, साथ ही प्रबंधकीय क्षमता भी बेमिसाल थी। वे एक सुलझे हुए इंसान थे और गाढ़े समय पर काम आते थे। मेरे कई मित्रों के उपर जब विपत्ति टूटी तो वे विनोद भइया के पास गए और उन्होंने उनको सहारा दिया। उनमें उत्तर प्रदेश के विषय में जो राजनीतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक समझ थी, वो बहुत कम व्यक्तियों में थी। मेरे लिए उत्तर प्रदेश नया था। मैं आसाम से यूपी आया था और पायनियर, लखनऊ का संपादक के रूप में दायित्व निभा रहा था। तब यूपी को मैंने विनोद शुक्ला जी के नेतृत्व में समझा। मुझे बहुत दुख है कि वो नहीं रहे। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं उन्हें जानता हूं और मैंने उनसे निर्देश प्राप्त किए। यद्यपि उनके साथ मुझे काम करने का मौका नहीं मिला, पर पायनियर का काम देखते हुए मैं लगातार उनके टच में था। मेरे सामने जब भी कोई गूढ़ समस्या आती थी तो मैं उनसे निर्देशन लेता था।
-उदय सिन्हा, संपादक, सहारा टाइम्स
मेरे पत्रकारीय करियर में भइया का बहुत बड़ा योगदान है। हर मौके पर उन्होंने आगे बढ़ाया। भइया के निधन से मुझे गहरा झटका लगा है। मुझे याद आ रहा है सन 1991 जब दैनिक जागरण, लखनऊ से भइया के विश्वासपात्र कहे जाने वाले 9 लोगों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया था। इन लोगों ने यह सोचकर इस्तीफा दिया था कि अखबार बैठ जाएगा। भइया थोड़े मायूस जरूर हुए। उन्हें झटका इस बात का लगा कि जिन लोगों को उन्होंने बच्चे का तरह माना और आगे बढ़ाया, उन लोगों इतना बड़ा दगा किया। ये बातें उन्होंने मुझसे कहीं थीं। वे तब मेरे घर आए थे। उन्होंने मुझे अखबार बतौर चीफ रिपोर्टर संभालने के लिए कहा। मुझे नए लड़कों की टीम मिली और हम लोगों ने इस संकट के मौके पर दिन-रात काम किया। महीने भर के भीतर अखबार का सरकुलेशन बजाय घटने के, चार हजार कापियां बढ़ गईं। विनोद भइया ने जब दैनिक जागरण, लखनऊ को जिम्मा लिया तब अखबार की हालत बहुत खराब थी। जबरदस्त यूनियनबाजी थी और दैनिक जागरण, लखनऊ में काम करने वाले संपादक और मालिक नरेंद्र मोहन मुर्दाबाद के नारे लगाते थे। इस विकट स्थिति में अखबार को सफलता की ऊंचाई पर विनोद भइया ने पहुंचाया। उन दिनों अखबार वितरण केंद्रों पर मारामारी की स्थिति रहती थी। तब विनोद भइया संपादकीय स्टाफ के साथ रात-रात भर अखबार वितरण केंद्रों पर घूमा करते थे। प्रिंट मीडिया में उन जैसा एग्रेसिव लीडर विथ पाजिटिव थिंकिंग मैंने आज तक किसी और को नहीं देखा। उनमें पत्रकारिता से जुड़े रहने की आखिर तक जिजीविषा थी। रिटायरमेंट की उम्र निकलने के बाद भी वे अखबार से जुड़े रहे। उन्होंने मेरे जैसे सैकड़ों पत्रकारों को आगे बढ़ाया जो आज विभिन्न जगहों पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे हैं।
– हेमंत तिवारी, मुख्य सलाहकार, जनसंदेश न्यूज चैनल
विनोद भइया पत्रकारिता जगत के भीष्म पितामह थे। मैं आज जो कुछ भी हूं, उनकी बदौलत हूं। उन्होंने सिखाया कि अखबार में काम करना है तो सभी विभागों को जानना चाहिए। उनकी सीख, उनकी स्टाइल, उनकी दूरदर्शिता से हम लोगों ने काफी कुछ सीखा है। उनके न रहना एक बड़ा झटका है जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
-सरोज अवस्थी, स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, आगरा
विनोद शुक्ला जी मेरे लिए हिंदी मीडिया जगत में लिविंग रोल माडल थे। जब भी मैं उनके सामने होता, उन्हें सिर्फ सुनता था। उनके हर शब्द में छिपे संदेश को समझने की कोशिश करता। उनकी बातों में व्यावहारिक और व्यावसायिक जगत की बारीकियां होतीं। वे हम जैसे हजारों लोगों के शिक्षक थे। उनके शिष्यों की संख्या इतनी बड़ी है कि वे लोग प्रिंट मीडिया के एक बड़े हिस्से को संचालित कर रहे हैं। विनोद शुक्ला जी बिना किसी गाडफादर के आगे बढ़े। वे अकेले आए और अपना साम्राज्य स्थापित किया। वे जंगल की शेर की भांति मीडिया जगत के नेता के रूप में स्थापित हुए।
-आलोक सांवल, संपादक और सीईओ, आई-नेक्स्ट
वो पत्रकारिता के तथागत हैं, बोधिसत्व हैं। वो गत नहीं हुए हैं। वो बोधिसत्व की तरह अपने मूल्य, आदर्श और विचारों के जरिए चिरंतन हम सबके बीच में विराजमान हैं। शारीरिक और भौतिक तौर पर वे भले ही न रहे, पर वो गत तो हो ही नहीं सकते। भइया ने अपनी जिंदगी के लिए एक संविधान बनाया और खुद उसको लागू किया। वे अपनी शर्तों पर जिए, पूरी जिंदादिली के साथ जिए। एक बहादुर की तरह जिए। किसी के आगे झुके नहीं। चाहे इमरजेंसी का काल रहा हो चाहे यूपी में हल्लाबोल का काल रहा। हमेशा चट्टान की तरह अड़े-खड़े रहे। वे शेर की तरह जिए। उन्होंने भले ही कभी कलम नहीं पकड़ी लेकिन अनगिनत लोग ऐसे हैं जिनको उन्होंने कलम पकड़नी सिखाई। जिन्होंने कलम पकड़ी हुई थी, उनकी कलम में धार दी। जो लोग सिर्फ रुपये-पैसे के लिए या व्यवसाय के लिए नहीं बल्कि कुछ सोच-समझकर पत्रकारिता में आए थे, जिनके दिल में आग धधक रही थी, वो आग लगातार धधकती रहे और बरकरार रहे, इसके लिए भइया ने लोगों को इमोशनल अटैचमेंट दिया और कुछ कर गुजरने के लिए उकसाया। उनके ही निर्देशन और नेतृत्व में सीखकर बहुत बड़ी संख्या में लोग बहुत बड़े बन गए और पत्रकारिता के जगत में हस्ताक्षर बन गए। इन बड़े लोगों ने जो कुछ किया, उसकी दृष्टि, विजन विनोद शुक्ला जी का ही दिया हुआ था। व्यक्ति को पहचानना और उसको पहचानकर उसके अंदर के जो गुण हैं, उन गुणों को सटीक तौर पर रेखांकित करते हुए, उसको किस मोर्चे पर लगाया जा सकता है, इसको अच्छी तरह समझना, भइया के कई गुणों में से एक था। वे उच्च कोटि के न्यूज मैनेजर थे। बहुत से लोग किसी कला में प्रवीण होते हैं पर जब तक उनको कला के प्रदर्शन के लिए सही अवसर, सही मंच नहीं मिलता है, वो वे जहां के तहां रह जाते हैं। उन्होंने जिस योग्य व्यक्ति के अंदर किसी विशिष्ट कला को देखा तो उसको उसी तरह के मोर्चे पर लगाया और एसाइनमेंट दिया। बाद में वो व्यक्ति अपने फील्ड का हस्ताक्षर बन गया। भइया का न रहना मेरे लिए निजी क्षति है।
-विष्णु त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार, दैनिक जागरण
विनोद शुक्ला जी से जब तक मैं मिला नहीं था, उनके बारे में अलग धारणा थी। मिलने के बाद मेरी धारणा बदल गई। उनके बारे में गलतहमियां ऐसे लोगों ने फैलाई थीं जो इंफीरयारिटी कांप्लेक्स के शिकार थे और उनकी सफलता से चिढ़ते थे। विनोद जी सिर्फ समझदार पत्रकार ही नहीं बल्कि यूपी की गहरी समझ रखने वाले गिने-चुने लोगों में से थे। उनके इतने रिच रिलेशन थे कि अगर उनकी जगह कोई सामान्य पत्रकार होता तो आसमान में उड़ने लगता लेकिन वो खुद को हमेशा डाउन टू अर्थ रखे रहे। एक व्यक्ति के रूप में और पत्रकार के रूप में वे बड़े कद के थे।
-अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली
विनोद शुक्ला जी ने खुद को जिंदगी भर इंप्रूव किया, अपग्रेड किया। वे लगातार पढ़ते रहे। उन्होंने सायास मेहनत करके अंग्रेजी बोलना सीखा, मैनेजमेंट की किताबें पढ़कर माडर्न ट्रेंड को समझा-बूझा। उनके साथ मेरे संबंध कई बार बने और बिगड़े लेकिन अंतिम दिनों में हम दोनों एक दोस्त की तरह मिलते थे और ढेर सारी बातें खुलकर करते थे। ‘डायबिटिक फुट’ नामक बीमारी की वजह से उनके बाएं पैर का एक अंगूठा काटना पड़ा था और उसमें काफी दर्द रहता था। वे दर्द के इन्हीं क्षणों में कहते कि मैंने इस पैर से बहुत लोगों को मारा है, इसीलिए मुझे इतनी तकलीफ उठानी पड़ रही है, कभी-कभी जी करता है कि आत्महत्या कर लूं। मैं उन्हें समझाता कि आपने जिन-जिन को मारा है उनसे माफी मांग लीजिए, दर्द खत्म हो जाएगा। इस पर वो हंसने लगते। विनोद जी हार्ड किस्म के टास्कमास्टर थे। किसी आदमी में कोई काम करने की क्षमता नहीं भी होती थी तो उससे भी वे काम करा ले जाते थे। लोगों से बेहतर काम करा लेना उन्हें आता था। भले ही इसके लिए वे भय, दंड और प्रोत्साहन- सभी हथियारों का इस्तेमाल करते। जागरण मैनेजमेंट ने उनके इसी स्वभाव का उपयोग किया।
जागरण मैनेजमेंट को उन्होंने दिया बहुत कुछ लेकिन पाया बहुत कम। वे अपनी जेब में एक कागज रखते थे। इस कागज पर उन्हें दी जाने वाली सेलरी दर्ज होती थी। आखिरी दिनों में उन्हें 36 हजार के आसपास सेलरी मिलती थी। वे कहते थे कि मेरा न तो कोई कागज है, न खाता है और न एकाउंट है। आजकल के लौंडों को देखो, साठ से अस्सी हजार तक पा रहे हैं। मुझे इतना ही मिल रहा है लेकिन मेरा काम चल रहा है।
अगर देखा जाए तो विनोद शुक्ला जी का कांट्रीब्यूशन एक लाख रुपये पाने वालों की तुलना में बहुत ज्यादा था। उन्होंने जागरण हाउस को एक्सपेंड करने में जो कांट्रीब्यूशन दिया, वह बहुत बड़ा है। विनोद जी कई बार बेकाबू हो जाते थे। इस व्यवहार के चलते जागरण में कई अच्छे लोग आए लेकिन बेहतर मौका मिलते ही वे चले गए। अगर वे अपने इस व्यवहार पर नियंत्रण रखे होते तो जागरण कंटेंट वाइज बहुत समृद्ध हुआ होता।
एक घटना का जिक्र करूंगा। दैनिक जागरण ग्रुप का चिंतन शिविर चल रहा था। उसमें जागरण में विदेशी पूंजी लगाने वाले इंडिपेंडेंट ग्रुप, आयरलैंड के मालिकों ने सलाह दिया कि जागरण को अपने एडिटोरियल स्टाफ पर कुल रेवेन्यू का 35 फीसदी खर्चा करना चाहिए। इससे अखबार का भला होगा और अखबार में कंटेंट स्तरीय होगा। तब पंडित विनोद शुक्ला ने कहा था कि मैं तो बहुत पहले से कहता रहा हूं कि ‘पंडित’ को ज्यादा पैसे दो, ‘रामकली’ को कम। पर यहां तो ‘रामकली’ को 500 रुपये मिलते हैं और ‘पंडित’ को पांच रुपये। ‘रामकली’ से उनका आशय मैनेजमेंट में आईं नई-नई छोकरियों से था जो अंग्रेजी बोलती थीं और ज्यादा सेलरी पाती थीं। ‘पंडित’ प्रतीक था संवाददाता, सब एडिटर, डेस्क वाले बंदों का।
मैनेजमेंट की बैठकों से विनोद जी लौट के आते तो उनसे जब पूछा जाता कि मीटिंग में क्या हुआ तो हमेशा एक वाक्य कहा करते- ‘लिटिल लिटिल थाट, बिग बिग इंगलिश’, यही हुआ मीटिंग में। आशय यह कि छोटा-छोटा विचार और भौकाली अंग्रेजी, मैनेजमेंट के बैठकों में यही होता है।
एक बार मैंने उनसे कहा कि यहां आफिस में ढेर सारे लोग सिर्फ आपके चरण को छूकर खुद की नौकरी सुरक्षित मान लेते हैं और काम करने से बचने की कोशिश करते हैं। उन्होंने पूछा कि इसका क्या इलाज है। मैंने कहा कि आप यहां लिखकर लगवा दीजिए कि ”यहां चरण छूना मना है, आचरण छुवें, चरण नहीं”। उन्होंने ऐसा ही कराया। दैनिक जागरण, लखनऊ में लगा यह पोस्टर जागरण ग्रुप में चर्चा का विषय बना। कई दिनों तक लोगों ने वाकई पैर नहीं छुवे।
उनमें गजब की जिजीविषा थी। रात में उठते और निकल पड़ते शहर में। मैं उनके साथ कई बार जिमखाना क्लब में बैठा हूं। उनके बाएं पैर का अंगूठा कट गया था और दर्द भी होता था लेकिन ड्राइवर से कहते कि तुम बैठो, गाड़ी मैं चलाउंगा और उसी पैर से फर्राटेदार गाड़ी ड्राइव करते हुए कहते- देखा, सब फिट है, सब कुछ कर सकता हूं। ऐसा आदमी जो बीच बीच में डायलीसिस पर जाता हो, बिना दवा खाए दो घंटे सहज रह पाना मुश्किल हो, उसका ऐसा जज्बा देखने लायक था।
जिस दौर में विनोद शुक्ला ने दैनिक जागरण, लखनऊ को संभाला, उस दौर में कामचोर पत्रकारों के कारण अखबार का बुरा हाल था। विनोद जी ने अखबार को जमाया और जमकर आगे बढ़ाया।
-अनिल यादव, प्रिंसिपल करेस्पांडेंट, पायनियर, लखनऊ
विनोद शुक्ला के निधन पर देश के कई पत्रकारों और संगठनों ने शोक व्यक्त किया है। उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष प्रमोद गोस्वामी और सचिव हेमंत तिवारी ने एक बयान में विनोद शुक्ला जी के निधन को मीडिया इंडस्ट्री के लिए गहरा आघात बताया है। अपने आप में मीडिया संस्थान सरीखे विनोद शुक्ला के न रहने से उनसे किसी भी रूप में जुड़े रहे हजारों पत्रकारों को निजी रूप से क्षति पहुंची है। समिति ने इस शख्सियत को श्रद्धांजलि दी है।











