वरिष्ठ पत्रकार और कवि राजकुमार केसवानी ने भास्कर ग्रुप को अलविदा बोल दिया है। वे भास्कर की मैग्जीनों के संपादक के रूप में कार्य कर रहे थे। देश-विदेश के कई बड़े मीडिया समूहों के लिए काम कर चुके राजकुमार के इस्तीफा देने के पीछे वजह बताया जा रहा है कि वे प्रबंधन के कुछ फैसलों से नाखुश थे। साथ ही कामकाज में बढ़ती दखलंदाजी से भी क्षुब्ध थे। भोपाल के रहने वाले राजकुमार पत्रकारिता के कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं। भास्कर ग्रुप से पहले वे एनडीटीवी के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ प्रदेशों के इंचार्ज थे। वर्ष 2003 में उन्होंने भास्कर समूह का दामन थामा और दैनिक भास्कर के इंदौर एडिशन के एडिटर बने। राजकुमार केसवानी अपनी साफगोई के लिये जाने जाते हैं। राजकुमार पत्रकार के साथ-साथ एक संवेदनशील कवि भी हैं।
उनके पहले कविता संग्रह का नाम है ‘बाकी बचें जो’। इसके बाद कविता संग्रह ‘सातवां दरवाजा’ को वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किया। राजकुमार ने मशहूर सूफी कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी की फारसी कविताओं का पिछले साल हिंदी अनुवाद किया। यह संकलन ‘जहान-ए-रूमी’ नाम से वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।
राजकुमार से [email protected] या 09827055559 के जरिए संपर्क किया जा सकता है। पहले कविता संग्रह ‘बाकी बचें जो’ से राजकुमार केसवानी की तीन कविताएं पेश हैं-
पर क्या करूं ?
बचपन में
मेरे पास
सिर्फ़ बचपन था
और वह
सबको अच्छा लगता था
बुढ़ापे में अब
मेरे पास
रह गया है
सिर्फ़ बचपना
और वह
किसी को अच्छा नहीं लगता
आख़िर कैसे?
मेरा पता
लगभग हर साल बदल जाता है।
कभी ४६२००१
कभी ४५२००२
कभी ४०००१३
कभी ये
कभी वो
नहीं बदलता
तो बस ये बदलना
अच्छे भाई, समझा चुके हैं कई बार
मियां, ख़ुद को बदल लो
वरना ये पता बदलता ही रहेगा
घर
घर कभी खाली नहीं रहता
उसमें अक्सर होते हैं
घरवाले
और जब कभी
वे जाते हैं बाहर
वह भरा रहता है
उनके वापस आने की उम्मीदों से।











