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जिस मूरख को यह पता न हो कि….

आलोक तोमर

आलोक तोमर के लिखे टीवी की टकली भाषा और उम्मीदों के केश पर जो दो प्रतिक्रियाएं भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हुई हैं, उस पर भड़ास4मीडिया की तरफ से आलोक तोमर से जवाब मांगा गया तो उन्होंने जो कुछ लिखकर भेजा, वह फिर बेहद पठनीय आलेख बन पड़ा है। दरअसल यह जवाब ही नहीं, हिंदी के प्रति परम प्रेम, आग्रह और अनुराग की पाती भी है। आलोक तोमर से आप सहमत-असहमत हो सकते हैं लेकिन उनके लिखने के अंदाज पर वाह-वाह कहे बिना नहीं रह सकते। उम्मीद करते हैं कि आलोक जी टीवी की नौकरी की व्यस्तताओं के बावजूद अपने अंदाज में मौलिक तरीके से लिखने-पढ़ने का काम जारी रखेंगे। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

आलोक तोमर

आलोक तोमर के लिखे टीवी की टकली भाषा और उम्मीदों के केश पर जो दो प्रतिक्रियाएं भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हुई हैं, उस पर भड़ास4मीडिया की तरफ से आलोक तोमर से जवाब मांगा गया तो उन्होंने जो कुछ लिखकर भेजा, वह फिर बेहद पठनीय आलेख बन पड़ा है। दरअसल यह जवाब ही नहीं, हिंदी के प्रति परम प्रेम, आग्रह और अनुराग की पाती भी है। आलोक तोमर से आप सहमत-असहमत हो सकते हैं लेकिन उनके लिखने के अंदाज पर वाह-वाह कहे बिना नहीं रह सकते। उम्मीद करते हैं कि आलोक जी टीवी की नौकरी की व्यस्तताओं के बावजूद अपने अंदाज में मौलिक तरीके से लिखने-पढ़ने का काम जारी रखेंगे। -एडिटर, भड़ास4मीडिया


 तो अब हिंदी में सुन लो

-आलोक तोमर-

हिंदी और खास तौर पर पत्रकारिता की हिंदी पर मेरे लेख पर इधर उधर से बहुत सारी टिप्पणियां आई। अब यह तो उम्मीद नहीं की जा सकती कि सबके विचार मेरे विचारों से मिलते हों लेकिन बहुत सारे मित्रों ने लेख की आत्मा के मर्म को समझा और उसमें अपने ज्ञान और दृष्टिकोण को जोड़ कर लेख के सरोकार में मदद की। उन सबको धन्यवाद।

आईबीएन-7 में काम करने वाले युवा मित्र मयंक प्रताप सिंह की टिप्पणी हिंदी की चिंता करने वाले एक सतर्क मन की टिप्पणी थी। उन्होंने हिंदी की खास तौर पर मीडिया में जो दुर्दशा हो रही है, उसके लिए महानगरीय सभ्यता और टीआरपी रेटिंग को जिम्मेदार ठहराया। मयंक की तरह ही और भी बहुत सारे मित्र टीआरपी रेटिंग से नाराज थे। उनका कहना था कि जब तक आज की युवा पीढ़ी जो कनॉट प्लेस को सीपी बोलती है, की भाषा में खबरें नहीं बोली जाएंगी, टीआरपी नहीं बढ़ेगी। इन मित्रों को एक छोटी सी जानकारी देनी है। यह टीआरपी नामक जो मिथक है वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व तो नहीं ही करता, चैनलों की टीआरपी खरी और खांटी खबरों से नहीं बल्कि सास बहू और साजिश तथा तंत्र मंत्र वाले कार्यक्रमों से बढ़ती है। चुनाव के दिनों में ठीक उसी उत्सुकता से दर्शक चुनाव के नतीजे देखते हैं जैसे क्रिकेट के मैच देख रहे हों। सो, वह टीआरपी भी प्रासंगिक है। मगर क्षणभंगुर हैं।

ऐसा नहीं है कि हिंदी समाज में खरी और टनाटन बोलने वाली भाषा के ग्राहक नहीं रह गए हैं। दूरदर्शन की भाषा को बहुत कोसा जाता है लेकिन मेरा अनुभव बताता है कि साल में कभी कभार जिस चैनल की कोई टीआरपी गिनी ही नहीं जाती, उस लोकसभा चैनल पर अगर मैंने आधे घंटे का कोई कार्यक्रम कर दिया हो तो फटाफट पूरे देश से सैकड़ों फोन आ जाते हैं। ऐसा उन चैनलों पर घंटों रहने के बावजूद नहीं होता जो टीआरपी के सम्राट कहे जाते हैं। इसलिए यह बात तो मन से निकाल दीजिए कि खरी और प्रांजल हिंदी अपने हिंदी वालों को मंजूर नहीं। मैंने उस लेख में भी लिखा था और फिर दोहरा रहा हूं कि मेरे सीएनईबी चैनल में खूब तत्सम और खूब तद्भव मुहावरेदार भाषा लिखी जाती है और अगर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और भारतीय जनसंचार संस्थान के मित्रों की प्रतिक्रिया को मानक माने तो उन्हें यह भाषा मंजूर हैं बल्कि वे उसका स्वागत करते हैं। पिछले दिनों हमारे चैनल के हस्ताक्षर कार्यक्रम ‘महाखबर’ में हमने दुष्यंत कुमार से लेकर अदम गोंडवी और निदा फाजली के अलावा कई साहित्यिक माने जाने वाले कवियों की रचनाओं का धुंआधार इस्तेमाल किया था और उतना ही धुंआधार उसका स्वागत हुआ था।

जैसा कि पहले कहा कि मीडिया और खास तौर पर टीवी मीडिया में ग्लैमर जुड़ गया है और जो पीढ़ी पहले मुंबई में हीरो या पटकथा लेखक बनने के लिए भागती थी, वह मीडिया की ओर आ रही है। लगभग हर चैनल ने अपने मीडिया स्कूल खोल रखे हैं और उनकी सफलता इस बात का सबूत है कि चाहे जितने मीडिया संस्थान खोल ले, उनमें आने वालों की कमी नहीं रहेगी। मंदी के दौर में भी पांच नए टीवी चैनल तीन महीने में खुले। टीवी की भाषा संवाद और वाचिक परंपरा की भाषा है। दुर्भाग्य से टीवी के सर्वोच्च पदों पर जो लोग बैठे हैं और जो भाषा निर्धारित करते हैं, उनमें से ज्यादातर अब भी अखबारी पृष्ठिभूमि के हैं और अपने आपको इस ग्रंथि से मुक्त कराने के लिए जिस तरह की हिंदी का इस्तेमाल करने पर वे अपने पत्रकारों को बाध्य कर रहे हैं वह न लिखित परंपरा की हिंदी रह गई है और न वाचिक परंपरा की।

यहां यह भी याद रखा जाना चाहिए कि जीटीवी हिंदी का पहला प्रमाणिक समाचार चैनल था। इसके पहले भी जैन टीवी था मगर डॉक्टर जे के जैन जैसे हाथ की सफाई दिखाने वाले और फुटपाथ पर बैठ कर मदारियों की तरह खबरों की हाट लगाने वाले दो कौड़ी के लोग कभी मीडिया की मुख्यधारा में आ ही नहीं पाए। उनके लिए संपत्तियों पर कब्जा करना, विदेशों से उपकरण आयात कर के भारत में बेचना और भारतीय जनता पार्टी से शुरू करके कांग्रेस तक पहुंचना ही प्राथमिकता थी। लेकिन जीटीवी के समाचार विभाग जो अब पूरा जी न्यूज चैनल हैं, की शुरुआत करने का श्रेय रजत शर्मा को जाता है। उन्होंने टीवी की भाषा तो नहीं लेकिन खबरे दिखाने का व्याकरण जरूर बदल दिया। इसके साथ ही यह कलंक भी वे कभी नहीं मिटा पाएंगे कि टीवी की भाषा को रजत शर्मा के नेतृत्व में जितना भ्रष्ट किया गया है उतना शायद किसी और ने नहीं किया।

हमारे एक सहयोगी मित्र हैं श्रीपति। हम लोग साथ बैठ कर खबरें लिखते हैं और इंडिया टीवी में बहुत समय तक रहने के बावजूद श्रीपति कई बार चौकाने वाले चमत्कार कर डालते हैं। जैसे शीतल मफतलाल को जब कस्टम विभाग ने गिरफ्तार किया और मफतलाल परिवार के विवाद सामने आए तो पता चला कि इस परिवार की एक बेटी ने पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा पाने के लिए सेक्स चेंज करवा कर लड़का बन जाने की हरकत की थी। अपर्णा नाम था लेकिन अब वह अजय है। इतनी लंबी कहानी को श्रीपति ने एक वाक्य में समेट दिया कि ”एक ननद थी जो अब देवर बन गई है”। टीवी को ऐसी त्वरित और सार्थक भाषा चाहिए।

कुछ मित्रों ने यह भी लिखा कि मैथिली, अवधी और भोजपुरी को पूरी भाषा की संज्ञा नहीं दी गई है और ये ऐतराज की बात है। अवधी में रामचरित मानस लिखा गया था, मैथिली में विद्यापति जैसे महाकवि जन्में हैं और भोजपुरी की संस्कृति का एक पूरा संसार हैं। उसका फिल्म उद्योग भी काफी विकसित है। मगर इन सबका व्याकरण और लिपि देवनागरी हैं इसलिए इन्हें कम से कम सहोदरा तो कहा जाना चाहिए। वरना भाषा की मान्यता का सवाल आया तो बुंदेलखंडी, ब्रज और दूसरी कई देसी बोलियां भी दौड़ में शामिल हो जाएंगी और खुद बुंदेलखंडी पृष्ठिभूमि से आने के बावजूद मैं फिर यही कहूंगा कि बुंदेलखंडी और ब्रज भाषा नहीं अभिव्यक्तियां हैं और बहुत ताकतवर अभिव्यक्तियां हैं। किसी भाषा के भाषा होने के लिए उसका अपना व्याकरण और संभव हो तो लिपि भी चाहिए होती है।

एक कोई साहब है शाहिद मिर्जा। मेरे एक दिवंगत मित्र भी शाहिद मिर्जा थे जो नवभारत टाइम्स में रहने के बाद दैनिक भास्कर के किसी संस्करण के संपादक हो गए थे। वे जैसी भाषा लिखते थे उसके सामने उनकी जो पैरोडी यानी नए शाहिद मिर्जा हैं उन्हें इस नाम पर कलंक ही कहा जाना चाहिए। जिस मूरख को यह पता न हो कि कान लगा कर कैसे सुना जाता है उससे क्या बात करनी?

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