बिहार के लखीसराय जिले से एक चिट्ठी आई है। चिट्ठी संग सुबूत भी अटैच है। तस्वीरें भी हैं- पीड़ित महिला कर्मचारी और आरोपी जिलाधिकारी की। इन दोनों तस्वीरों को प्रकाशित किया जा रहा है। पत्र भेजा है लखीसराय के एक संवेदनशील और सजग पत्रकार ने।
महिला की पहचान छिपाने के लिए तस्वीर में उसका चेहरा ब्लर कर दिया गया है। इस खबर में महिला का नाम भी बदल दिया गया है। पत्र भेजने वाले पत्रकार ने मीडिया द्वारा दबा दी गई जिले की एक हाईप्रोफाइल वारदात के माध्यम से करप्ट हो चुकी पत्रकारिता और सड़ चुके लोकतंत्र के खंभों की बेहाली को बयान किया है। उन्होंने अपनी पहचान छुपाने का अनुरोध किया है, इसलिए पत्र भेजने वाले पत्रकार का भी नाम नहीं प्रकाशित किया जा रहा है। बी4एम ने अपनी ओर से उनकी चिट्ठी में दिए गए तथ्यों की पड़ताल कर ली है। हम उनकी इस चिट्ठी को प्रकाशित कर रहे हैं। मेरी तरह आप भी इस चिट्ठी को पढ़कर रोएंगे-सोचेंगे कि आखिर किस देश और किस दौर में जी रहे हैं हम लोग। -एडिटर
आदरणीय संपादक जी, बी4एम
पत्रकारिता चौथा खम्भा है और पत्रकार लोकतंत्र के सजग प्रहरी, मीडिया आमलोगों की आवाज है…इस तरह की न जाने कितनी बातें कही जाती हैं। इस पेशे में नए आने वाले पत्रकारों को उपर लिखे इन वाक्यों को सुनने में आनन्द आता होगा। लेकिन मैं आपको दो दिन पहले की एक घटना के बारे में बता रहा हूं जिसके बाद आप खुद तय करिए कि क्या पत्रकारिता चौथा खम्भा है और पत्रकार लोकतंत्र के सजग प्रहरी या फिर ये पत्रकार भड़ओं की जमात है। बिहार का एक जिला है लखीसराय। यहां के जिलाधिकारी हैं प्रेम कुमार झा। चार दिन पूर्व इन्होंने इसी जिले में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी उम्मीद देवी (पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिया गया है) को अपने आवास पर बुलाया और हवस का शिकार बनाने की कोशिश की। महिला किसी तरह भाग कर आवास से बाहर आई और डीएम के बाद के अधिकारियों को रो-रो कर सब कुछ बताया दिया। चूकि मामला वरीय पदाधिकारी का था, इसलिए अधीनस्थ अधिकारियों ने महिला को तत्काल जबरन छुट्टी पर भेज दिया।
इस घटना की भनक किसी तरह स्थानीय पत्रकारों को भी लग गई। सभी पत्रकार डीएम को फोन मिलाने लगे। डीएम का बयान लेने की कोशिश की जाने लगी। डीएम ने फोन करने वाले सभी पत्रकारों को अपने आवास पर बुलाया। इसके बाद जो जो हुआ वह एक पेशेवर भंड़ुआ भी करने में शर्म करेगा लेकिन पत्रकारों को शर्म नहीं आई। आनन-फानन में जिला मुख्यालय से पत्रकारों की एक टीम उस महिला के घर एक घंटे तक सफर करने के बाद पहुंची। वहां स्टोरी करने के बजाय पत्रकारों ने महिला से मुंह बंद रखने के लिए डीएम द्वारा दिए जाने वाले मदद की पेशकश को सुना कर मामले को मैनेज कर दिया। टीम वापस लौटी और डीएम से अपने मेहनताने को प्राप्त किया। इस प्रकरण का खुलासा नहीं होता लेकिन एक नए रीजनल न्यूज चैनल साधना न्यूज (बिहार-झारखंड) पर यहां की खबर प्रसारित हो गई। इस चैनल के रिपोर्टर ने महिला का बयान और डीएम की बाइट को अपने चैनल मुख्यालय को भेज दिया जिसे चैनल ने प्रसारित भी कर दिया।
महिला के साथ हुए हादसे की खबर किसी भी अन्य अखबार या टीवी चैनल ने अपने यहां प्रसारित-प्रकाशित नहीं की क्योंकि ब्यूरो चीफों, रिपोर्टरों ने खबर भेजी ही नहीं। किसी पत्रकार ने गरीब और अबला महिला की आवाज को बल देने की कोशिश नहीं की। चूंकि यह मामला डीएम से जुड़ा था इसलिए पत्रकारों ने भंड़ुआगिरी की है। महिला से छेड़छाड़ का प्रयास किसी साधारण व्यक्ति ने किया होता तो फिर अखबार वाले पाठकों को कई मसालेदार स्टोरी परोस देते। क्या यही है पत्रकारिता? कहां चले गए संपादकजी लोग? आज उस डीएम के खौफ से कोई भी महिला कर्मचारी उनके आवासीय कार्यालय में नही जाना चाहती। डीएम की करतूत, महिला की पीड़ा से संबंधित कोई भी मेन और साइड स्टोरी किसी भी मीडिया माध्यम में नहीं प्रकाशित-प्रसारित होने वाली क्योंकि मामला डीएम का जो है और डीएम ने पत्रकारों को बुलाकर ओबलाइज जो कर दिया है।
धन्य है लोकतंत्र, धन्य हैं लोकतंत्र के खंभे, धन्य है ब्यूरोक्रेसी, धन्य है पत्रकारिता।
आपका
एक पत्रकार
लखीसराय, बिहार











