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दुख-दर्द

शैलेंद्र!, रीटेक करके वापस आ जाओ

[caption id="attachment_15056" align="alignleft"]शैलेंद्र सिंहशैलेंद्र सिंह[/caption]शैलेन्द्र सिंह..और उसका नहीं रहना, मेरे लिए ये विरोधाभास है. कई बार उसके फोन काटे. कई बार हड़काया. मगर अब कौन कहेगा–भय्या मुझे पीट लेना मगर मेरी बात सुन लो. मेरे लिए शैलेन्द्र जान पहचान वाला नहीं  था. वो मेरी समाचार एजेन्सी में काम करता था और जब केबीसी का जिम्मा मुझे मिला तो वो मेरी टीम में था. फिर जब मैं आजतक गया तो वहां शैलेंद्र को उदय शंकर से मिलवाया। उसके बाद शैलेन्द्र ने आजतक की पारी शुरू की. बाद में उदय ही उसे स्टार न्यूज में ले गए. वहां से बड़े लम्बे फोन करता था. कभी-कभी नशे में. कई बार निदा फाजली और महेश भट्ट के घर बैठा मिला. बार-बार कहता था– आप मुम्बई आ जाओ. दिल्ली आपकी जगह नहीं है.

शैलेंद्र सिंहशैलेन्द्र सिंह..और उसका नहीं रहना, मेरे लिए ये विरोधाभास है. कई बार उसके फोन काटे. कई बार हड़काया. मगर अब कौन कहेगा–भय्या मुझे पीट लेना मगर मेरी बात सुन लो. मेरे लिए शैलेन्द्र जान पहचान वाला नहीं  था. वो मेरी समाचार एजेन्सी में काम करता था और जब केबीसी का जिम्मा मुझे मिला तो वो मेरी टीम में था. फिर जब मैं आजतक गया तो वहां शैलेंद्र को उदय शंकर से मिलवाया। उसके बाद शैलेन्द्र ने आजतक की पारी शुरू की. बाद में उदय ही उसे स्टार न्यूज में ले गए. वहां से बड़े लम्बे फोन करता था. कभी-कभी नशे में. कई बार निदा फाजली और महेश भट्ट के घर बैठा मिला. बार-बार कहता था– आप मुम्बई आ जाओ. दिल्ली आपकी जगह नहीं है.

मगर एक दिन वो खुद दिल्ली आ गया. बड़े गर्व से अपनी स्विफ्ट कार दिखाए. लोग मिठाई देते हैं, उसने वोदका की बोतल दी. इंडिया टीवी के सामने पार्किंग में उसने मुझसे डांट खाई. एक दिन उसने अपनी गाड़ी ठोक ली. फोन करके पहला वाक्य बोला- भैया, कसम से दारू नहीं पी थी, बस, नींद आ गयी थी.

शैलेन्द्र से अपने रिश्ते की परिभाषा मैं नहीं कर पाऊंगा. एक बार तो मेरे पास अपन की समाचार एजेंसी में काम करने वालों को पगार देने के शैलेंद्र सिंहपैसे नहीं थे, तो शैलेंद्र ब्याज पर पैसा उधार ले आया.

एक दिन शैलेन्द्र ने वाकई चकित किया. शर्माते हुए आया और एक किताब दी.. कहा- मेरी शायरी है. मैं स्तब्ध.., सोचा- शैलेन्द्र भावुक तो है..मगर शायरी? निदा फाजली को फोन लगाया तो वे बोले–कच्चा है मगर जान है बच्चे में. फिर एक दिन अक्षरधाम मंदिर के सामने शैलेन्द्र को गीता पाठ करते टीवी पर देखा. फोन किया, तो वो बोला–अब आप मुझे गंभीरता से लो.

आखिरी बार तीन दिन पहले फोन आया था. जनाब टीवी के मनोरंजन कार्यकमों की दुनिया में जाना चाहते थे. कह रहे थे आप स्क्रिप्ट लिखना, मैं गीत लिखूंगा. मैं हंस दिया तो चिढ़ कर बोला–आप मुझे गधा समझते हैं.

अभी कुछ दिनो पहले की हो तो बात है, बी4एम पर ही भाषा के मामले में शैलेंद्र का नाम लेते हुए उसकी तारीफ़ कर दी तो वह धन्य हो कर कहा–आप ने तारीफ कर दी, अब मर भी जाऊं तो कोइ फर्क नहीं पड़ता. नहीं पता था कि ये आखिरी बार बात की है. कई फोन नंबर हाल के वर्षों में डिलीट किये हैं मगर शैलेन्द्र सिंह? नहीं शैलेन्द्र, मुझे फोन करो और बोलो की ये झूठ है. रीटेक कर के वापस आ जाओ. कसम से, अब नहीं हड़काऊंगा।

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