आनन्द मोहन पाठक और गंगा पाठक हैं असली आरोपी : जबलपुर के जिस प्रेस क्लब में छापे की चर्चा हो रही है उसमें कोई भी पत्रकार जुआ खेलते नहीं पकड़ा गया है। यह पुलिस का रिकार्ड भी बताता है। बी4एम पर जिस तरह से जबलपुर के पत्रकारों को जुआड़ी बताया गया है, यह घोर आपित्तजनक है। हां, यह सही है कि प्रेस क्लब के नाम पर शहर में कई जगहों पर जुआघर चल रहे थे। उनको बंद कराने का साहस भी जबलपुर के पत्रकारों ने दिखाया है। जबलपुर के ही एक पत्रकार ने जुआ क्लबों के विरोध में मार्च 2006 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। हालांकि वह याचिका खारिज हो गई। उसमें जबलपुर के एसपी और कलेक्टर को कार्यवाही करने के लिए आवेदन देने की सलाह न्यायालय ने दी थी।
शहर के महाकौशल प्रेस क्लब में जुआघर पर 11 जून 2009 को पुलिस ने छापा मारा और आरोपियों को गिरफ़्तार किया। इससे पहले भी 5-6 प्रेस क्लबों पर छापे मारे जा चुके हैं। यहां यह भी बताना जरूरी है कि प्रेस क्लब कुछ छोटे स्थानीय अखबारों के मालिकों और कथित बेरोजगार पत्रकारों ने खोले थे। वे रजिस्टार फर्म एन्ड सोसायटी में 11 पत्रकारों के नाम देकर क्लब को पंजीकृत करा लेते थे और क्लब को जुआ खिलाने वाले अपराधियों को ठेके पर देकर रुपए वसूलते रहे। जबलपुर के कार्यरत कई अखबारों में सम्पादक रहे एक पत्रकार को छोड़कर किसी का भी ऐसे क्लबों से लेना देना नहीं था। सन् 2003-04 में सबसे पहला क्लब महाकौशल प्रेस क्लब ही खुला था।
इसका उद्देश्य पत्रकारों की भलाई करना रहा। क्लब खुलते ही उससे जुड़े पत्रकारों ने अपने प्रभाव का उपयोग कर राजनेताओं और बड़े व्यावसायिक घरानों से चंदा उगाही की। क्लब के पहले अध्यक्ष नवभारत के तत्कालीन सम्पादक गंगा पाठक रहे। उनके साथ उनके अधीन काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार भी उसके सदस्य बन गए। क्लब में पत्रकार वार्ताएं होने लगीं। आयोजकों से इसके लिए निर्धारित शुल्क लिया जाता था। इससे क्लब के खर्चे निकाले जाने लगे। लेकिन क्लब से ज़ुडे कथित पत्रकार आनन्द मोहन पाठक ने जबलपुर क्लब में कार्ड रूम चलाए जाने के अनुभव का उदाहरण देकर प्रेस क्लब में भी कार्ड रुम चालू कराने का सुझाव दिया ओर कार्ड रूम शुरू हो गया। पहले रमेश कुमार को मैनेजर बनाया गया और उसने क्लब में जुआड़ियों को लाने ओर नाल (जुआ खेलने वाले से 100 रुपए प्रति घंटा) वसूलना शुरू कर दिया। बाद में रमेश को हटाकर पेशेवर जुआ खिलाने वालों को ठेका दिया जाने लगा। इसके बाद क्लब से जुड़े दो कार्यरत पत्रकार अलग हो गए या उन्हें क्लब पर कब्जा करने वालों ने अलग कर दिया। इसके बाद क्लब गंगा पाठक और आनन्द मोहन पाठक की निजी सम्पति बन गया।
संभ्रांत पत्रकारों ने क्लब से दूरी बना ली लेकिन उनके नाम की आड़ में जुआ खिलाया जाता रहा। जब पुलिस ने छापा मारा और क्लब के पंजीयन प्रमाण पत्र में दर्ज नामों को सार्वजनिक किया तो शहर में हड़कम्प मच गया। जो क्लब से वास्ता नहीं रखते थे, वे आरोपी बताए जाने लगे। इससे पुलिस पर दबाव पड़ा और दोनों वास्तविक आरोपी भी बच गए। जबलपुर के पत्रकारों में अभी भी चर्चा है कि पुलिस को पिछले 7 सालों में क्लब के नाम पर वसूल की गई रकम का पता लगाना चाहिए। सोसायटी के नाम पर कमाई गई राशि पर शासन का अधिकार होता है। शासन जुआ क्लब की जांच कराए तो बड़े घोटाले उजागर होंगे और उसमें सिर्फ और सिर्फ दो पत्रकारों का नाम आएगा, यह तय है। इसीलिए जबलपुर के पत्रकारों को जुआड़ी बताना बंद होना चाहिए।
यहां इस बात की भी चर्चा होना चाहिए कि जब-जब प्रेस क्लबों पर छापा डाला गया तो सभी समाचार पत्रों ने हर बार प्रमुखता से समाचारों का प्रकाशन किया। इसीलिए खबर देने वाले खबरची ने जबलपुर के पत्रकार जगत को कलंकित करने का प्रयास किया है। उस खबरची ने पत्रकारिता को कलंकित करने वालों का नाम उजागर न कर आरोपियों को बचाने का काम किया है। इस लेख के माध्यम से जबलपुर की पत्रकारिता पर खुली बहस होना चाहिए जिससे गलत, धंधेबाज, भू-माफिया और फर्जी पत्रकारों को बेनकाब किया जा सके।
लेखक रवींद्र दुबे जबलपुर के जुझारू पत्रकार हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.











