शैलेंद्रजी के बारे में लिखने की बिल्कुल ही इच्छा नहीं थी क्योंकि मुझे मालूम है कि जैसे-जैसे यादों की चारदीवारी में घुसने की कोशिश करूंगा, मैं अपने आंसूओं को रोक नहीं पाऊंगा… कभी वो अपनी लिखी गजलों और नज्मों को सैकड़ों हजारों बार गुनागुनाकर सुनाए होंगे… अब मैं उनके द्वारा सौंपी गई किताब की पहली प्रति में लिखी गजलों और नज्मों को कई-कई बार पढ़ रहा हूं…
शुक्रवार (18 जून) देर रात साढ़े तीन बजे जब शारदा हॉस्पीटल के एक कर्मचारी ने मुझे फोन पर बताया कि शैलेंद्र जी का एक्सीडेंट हो गया है, वो भी ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस हाईवे पर… तो दिमाग जैसे सुन्न पड़ गया… बार-बार ये सवाल उठने लगे कि आखिर रात के साढ़े तीन बजे वो ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर क्या कर रहे थे… लेकिन मन में कहीं न कहीं शैलेंद्र जी की लिखी नज्म ही याद आ रही थी…
“मैं भटक रहा था डगर-डगर, मैं उजड़ रहा था नगर-नगर
मेरा दिन नहीं निकला कभी, मेरी रात होती थी रात भर
मेरी बेखुदी मेरे साथ थी, मेरे दिल में एक ही बात थी
कि हो राह कितनी ही पुरखतर, मैं रहूंगा खुद को तलाश कर”
क्या शैलेंद्र जी खुद को तलाश करने निकले थे… दरअसल शैलेंद्र की तलाश बरसों की है… चाहे वो मुंबई का वाकया हो, या फिर दिल्ली का… घंटों यूं ही इधर उधर भटकना। मुंबई में कभी मेरी बाइक से तो कभी यूं ही पैदल… वर्ली सीफेस, जुहू बीच, मरीन ड्राइव्स, या फिर नरीमन प्वाइंट… इसी यायावरी जिंदगी को वो दिल्ली में भी जीने की कोशिश कर रहे थे… देर रात एक्सप्रेस हाईवे पर चले जाना… या फिर फिल्म सिटी के इर्द गिर्द चक्कर लगाना… लेकिन इसके बावजूद उनके मन के किसी न किसी कोने में हलचल बनी रहती, हर वक्त बेचैनी… आखिर ये कौन सी तलाश थी। खुद वो लिखते हैं…
“मैं यू दर-ब-दर, यूं डगर-डगर, किसे ढूंढता हूं नगर-नगर
तू समझ सकेगा न हमसफर, ये तलाश ही कोई और है”
वाकई एक ऐसी तलाश में जुटे थे शैलेंद्र, जिसके बारे में कोई भी दावा के साथ कुछ नहीं कह सकता… क्योंकि ये सब कहने से पहले उस हद तक साहस भी चाहिए… और मंजिल की तलाश भी एक बहुत विचित्र तरीके से होती थी। वो मौत के बेहद करीब से होकर गुजरना चाहते थे। गजलों की किताब पूरी करने के लिए उन्होंने शराब की दुनिया में गोते लगाकर जिस तरह से अपनी जिंदगी के साथ ही भयंकर एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश की… वो बहुत डरावनी है… कई बारगी उन्होंने ये प्रयोग मुंबई के मेरे कमरे में करने की कोशिश की है। तब मैं भीतर से डर जाता था और मेहा भाभी (शैलेंद्र जी की पत्नी) को फोन कर मुंबई भी बुला चुका था।
किसी भी काम को करते समय वो हद से भी गुजर जाना चाहते थे। ऐसे वक्त में उन्हें किसी भी बात का ख्याल नहीं रहता था। एक बार जब लोअर परेल में उनके कमरानुमा फ्लैट में पहुंचा तो देखता हूं कि वो किसी से बात कर रहे हैं… मैं उस समय सन्न रह गया कि उनका मोबाइल तो दूर कहीं पड़ा है… जबकि सिर्फ हाथ कान में चिपकाए हुए वो लगातार आधे घंटे तक किसी से बात करते रहे… मैं सही बताऊं तो उस समय डरकर तुरंत बाहर निकला, उनके फ्लैट के दरवाजे लगाए और अपने घर वापस आ गया। इस बात का जिक्र मैंने उस समय स्टार न्यूज में उनके करीबी गौरव बैनर्जी से भी किया था। तो शैलेंद्र ने इसके बारे में बिना कुछ बताए बात को टाल दी। लेकिन हकीकत वो खुद अपनी एक कविता में भी बयान करते हैं… अंतत: नाम की अपनी कविता में वो लिखते हैं….
“आखिकार…
अंतत:
पता नहीं किससे रोज होती है
निरंतर बातचीत
पता नहीं”
एक्सट्रीम में जाना शैलेंद्र जी का शौक ही नहीं, बल्कि नियति थी। और इस नियति को उन्होंने खुद चुना था। आखिर कैसे? ये बताने से पहले मैं उनकी किताब कुछ छूट गया है में भूमिका की आखिरी पंक्ति उद्धृत कर रहा हूं। उन्होंने लिखा है कि –“मुंबई के लोअर परेल का वो एक कमरा नहीं होता तो शायद इस पुस्तक का सफर अधूरा ही रहता।”
उन्होंने सच लिखा है कि उस एक कमरे के बिना न तो शायद ये किताब पूरी हुई होती… और न ही उनकी जिंदगी का एक बड़ा अंश पूरी दुनिया के सामने आया होता… और न ही मेरी और उनकी घनिष्ठता हो पाती। शैलेंद्र जी गजलों की किताब लिखना शुरू कर चुके थे… और ज्यादातर वक्त उनका मेरे लोअर परेल के उसी फ्लैटनुमा कमरे में ही गुजरता था। इस एक कमरे से तो कई कहानियां जुड़ी हैं… लेकिन सबसे मजेदार कहानी आपको बताता हूं… पहली बार मुझे फ्लाइट से मुंबई से कोलकाता जाना था। उससे पहले की रात मेरे कमरे में मंडली जमी हुई थी… रात में गप्पें मारने के लिए मेरे साथ शैलेंद्र जी और दो दोस्त भी मौजूद थे। रात भर हमलोगों ने खूब गप्पें मारीं। शैलेंद्र जी उस समय खूब शराब पीते थे… उस दिन भी उनका मन था… उनका साथ देने के लिए एक दोस्त तो तैयार था… लेकिन मेरे आलावा एक और शख्स शराब नहीं पीते थे… इसलिए शैलेंद्र शराब पीने के लिए हमें रात भर डराते रहे … कि फ्लाइट में सफर कर लेने से पहले शराब पीना बेहद जरूरी है… क्योंकि फ्लाइट में एक्सिडेंट होने के बाद बचना बिल्कुल भी नामुमकिन है। इसलिए नशे में इंसान को डर नहीं लगता…
तो ये है शैलेंद्र जी का मिजाज… जाते-जाते मैंने अपने फ्लैट की चाबी शैलेंद्र जी तो दे दी… क्योंकि उन्होंने साफ कर दिया था कि इस कमरे पर अब मेरे से ज्यादा उनका हक हो गया है। जब करीब दो हफ्ते बाद मुंबई वापस आया तो देखता हूं कि चारों तरफ शराब की बोतलें बिखरी पड़ी हैं… पानी रखने के टब के भीतर कई बोतलें पड़ी हैं… गैस सिलेंडर, चूल्हे, कपड़े रखने के दराज… हर तरफ शराब की बोतलें… ऐसा नहीं था कि शैलेंद्र कोई बहुत पुराने शराबी हों… लेकिन उनको एक्सट्रीम में जाना अच्छा लगता था। होश खोकर दुनिया को देखने का उनका बहुत बड़ा शौक था। वो खुद लिखते हैं…
“फिलहाल तो हमको बहने दो
अपना हर दुख-सुख सहने दो
हमको भी शराफत मालूम है
हमको भी समझ है दुनिया की”
एक्सट्रीम तक पहुंचने के उनके इस शौक में मुझे कई बारगी भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। कई बार मैं इरीटेट हुआ, कई बार उनसे लड़ाई की… लेकिन उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि मैं कभी दूर नहीं हो पाया… चाहे इसके लिए मुझे दफ्तर पहुंचने में देरी हुई हो… या फिर दूसरी परेशानी का सामना करना पडा़। एक वाकया बताता हूं… मुंबई में जब उनके फ्लैट पहुंचा तो वो नशे में थे… और मन ही मन कुछ गुनगुना रहे थे… उन्होंने मेरी तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। तो मैं भी वापस अपने फ्लैट (लोअर परेल में मेरा और उनका फ्लैट आमने सामने था) में आ गया। दूसरे दिन मैं फिर उनके पास पहुंचा… तो वो उस वक्त भी नशे में थे। तीसरे दिन पहुंचा तो देखता हूं कि वो बिल्कुल भी चलने फिरने की स्थिति में नहीं हैं… नशे में सराबोर हैं… न तो मेरी तरफ ध्यान दे रहे हैं और न ही बातचीत कर रहे हैं… फिर मैं उनको उठाकर अपने कमरे में ले आया। यहां उन्हें ठीक करने की भरपूर कोशिश की… लेकिन वो पूरी तरह नशे में डूबे थे… अब मैंने उनके शराब पीने पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी… लेकिन उनका नशा उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था… उन्होंने खुद लिखा भी…
“पांचवें दिन भी पिया जिसको, बिना कुछ खाए
और सुध अपनी गंवाकर मैं गिरा तब भी था”
जब मैं हर तरफ से थक हार गया तो फिर मेहा भाभी को दिल्ली फोन किया… और सिर्फ यही कहा कि भाभी अगर आप चाहती हैं कि आपका शैलेंद्र सही सलामत रहें तो आप तुरंत मुंबई आ जाइये… भाभी आस्था और आदि को लेकर दिल्ली से निकल पड़ीं… और रास्ते भर मुझसे शैलेंद्र जी का हालचाल लेती रहीं… कुछ यही वाकया 18 मई की रात को हुआ … जब मुझे पता चला कि शैलेंद्र जी का एक्सीडेंट हो गया है तो मैंने रात के साढ़े तीन बजे भाभी को फोन कर पूछा कि शैलेंद्र भैया कहां हैं… तो उन्होंने बताया कि घर से बाहर हैं… आखिरी बार ढाई बजे रात बात हुई है और वो रास्ता भटक गए हैं…. ये सब सुनने के बाद मैंने भाभी को बताया कि उनका एक्सिडेंट हो गया है…….. शैलेंद्र जी पिछले सात साल में तीन बार हॉस्पीटल में भर्ती हुए और तीनों ही बार इसकी जानकारी मैंने ही भाभी को दी… हर बार भाभी पूछती रहीं कि शैलेंद्र ठीक तो हैं न… तो मैंने बार बार यही कहा कि आप चिंता मत कीजिए… मैं हूं न… लेकिन इस बार मैं ऐसा न कह सका…. बस यही कहा कि भाभी वो ठीक हैं… लेकिन आप जब हॉस्पीटल पहुंच जाएं तो बताइयेगा कि कैसी हालत है…
शैलेंद्र जी की शख्सियत एक भरा पूरा व्यक्तित्व है… जिसके कई आयाम हैं…. वो कभी अलविदा नहीं कह सकते …. कभी गुनगुनाते हुए सामने आ जाते हैं… कभी मजाक करते नजर आते हैं … तो कभी गुस्सा होते हुए। मुझे याद आता है कि हमें साथ-साथ रहते कई साल गुजर गए… लेकिन कभी पता नहीं चला कि उन्हें ढोलक भी बजाना आता है… एक बार मेहा भाभी दोनों बच्चों के साथ मुंबई आई हुईं थीं… तो हर बार की तरह मेरा रात का खाना वहीं बना हुआ था…. हम डिनर के लिए पहुंचे… रात में खाने-पीने के बाद गाने-बजाने का दौर शुरू हुआ… सबसे पहले मैंने उनकी लिखी एक गजल गाकर सुनाई… उसके बाद उन्होंने हम सबको ढोलक बजाकर सुनाना शुरू कर दिया… मैं हैरान रह गया कि उन्होंने अलग-अलग रागों में तकरीबन एक घंटे तक ढोलक बजाया… वो भी थाली और लकड़ी के पट्टे में… मैं दंग था क्योंकि अब तक उनके इस हुनर से अपरिचित था… उन्होंने सही लिखा है….
“कौन कैसा है, क्या है, क्यूंकर है
आप सोचे नहीं तो बेहतर है”
वाकई शैलेंद्र जी के व्यक्तित्व को समझना आसान नहीं… मैंने उनके साथ लंबा अर्सा गुजारा… मेरी शादी में जब इनका पूरा परिवार शरीक हुआ तो ये संबंध और भी प्रगाढ़ हुआ… इसके बावजूद मैं ये तो जानता हूं कि शैलेंद्र जी के व्यक्तित्व का दायरा कितना बड़ा था … लेकिन ये अब भी नहीं जानता कि उस व्यक्तित्व में क्या कुछ समाया हुआ है… कभी वो गीता पर बोलने लगते… तो कभी गालिब से लेकर निदा फाजली के शेर गुनगुनाने लगते…. कभी टेलीविजन में स्क्रिप्ट की जादूगरी पर बात करने लगते… तो कभी-कभी ढोलक बजाते-बजाते पूरी रात काट देते… इसके अलावा भी उनके व्यक्तित्व के कई ऐसे सिरे हैं…. जिसे मैंने छुआ तो जरूर लेकिन कभी पकड़ नहीं पाया…
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लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल युवा साहित्यकार और पत्रकार हैं। इन दिनों आईबीएन7 न्यूज चैनल में एसोसिएट एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं।











