
जी हां, ये तस्वीरें गवाह हैं कि अब नामी-गिरामी टीवी चैनल्स ‘तथाकथित’ पत्रकारों की पहुंच से बाहर नहीं हैं। खबरों के मैदान में ये ‘तथाकथित’ पत्रकार अब डोमेस्टिक सिंगल सीसीडी कैमरा हाथों में और चैनल्स की माईक आईडी अपनी अंटी में ठूंस कर इतराते नजर आते हैं। इन्हें जहां भी मौका नजर आता है, ये अपनी अंटी से चैनल की माईक आईडी निकाल कर अधिकारी के मुंह में ठूंस देते हैं।
इन्हें ‘तथाकथित’ शब्द से इसलिए नवाजा जा रहा है क्योंकि इनमें से अधिकतर खुद सीधे तौर पर किसी चैनल से जुड़े नहीं हैं, बल्कि चैनल्स के जिम्मेदार स्टिंगर इन्हें अपने साथ भाड़े पर जोड़ कर रखते हैं, और भाड़े के ये लोग कभी इस स्टिंगर की डाल पर तो कभी उस स्टिंगर की डाल पर बैठे दिखाई देते हैं। इन अनप्रोफेशनल पत्रकारों के कारनामे समाज में टीवी चैनल्स की साख को बट्टा लगाने में अग्रणी भूमिका निभाते हैं। इनके द्बारा पूछे गए सवाल तो खुद सवालों के घेरे में रहते हैं, क्योंकि ये तो बलात्कार की पीड़िता से भी पूछ बैठते हैं कि अब आप कैसा महसूस कर रही हैं! बड़े-बड़े अधिकारी और नेताओं को इन अनप्रोफेशनल तथाकथित पत्रकारों के छोटे-छोटे (छोटी-छोटी मानसिकता वाले) सवालों का सामना करना पड़ता है।
पिछले दिनों मेरठ यूनिवर्सिटी में होस्टल्स खाली कराये जा रहे थे। मकसद था अवैध रूप से कब्जा जमाये तथाकथित छात्र नेताओं को कैम्पस से बाहर निकाला जाए। ऐसे में एक पत्रकार ने वाइस चांसलर से सवाल दागा कि आप यूनिवर्सिटी तो संभाल नहीं पा रहे हैं और अपनी विफलता छिपाने के लिए छात्रों के पीछे क्यों पड़े हैं? दरअसल, इस सवाल को पूछने वाला पत्रकार खुद यूनिवर्सिटी होस्टल के एक कमरे पर अवैध रूप से कब्जा जमाये था। अब सवाल ये खड़ा होता है कि मीडिया की इस गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार है… ये तथाकथित पत्रकार या चैनल्स के मालिक?











