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‘संपादक के नाम पत्र’ का रिकार्ड दम्माणी के नाम

श्याम लालजी दम्माणीबीकानेर मूल के बम्बई प्रवासी श्याम लाल जी दम्माणी ने सबसे ज्यादा ‘संपादक के नाम पत्र’ लिखा है। उनके करीब साढ़े चार हजार ‘लेटर टू एडिटर’ प्रकाशित हो चुके हैं। इस उपलब्धि के लिए उनका नाम लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज हो गया है। 70 वर्षीय दम्माणी ने संपादकों को पत्र लिखने का काम 60 वर्ष की उम्र में शुरू किया। श्याम लाल दम्माणी के ये पत्र हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी सहित गुजराती के समाचार पत्रों में छप चुके हैं। श्याम लाल दम्माणी ने अपनी स्नात्तकोत्तर शिक्षा अर्थशास्त्र में की है तथा विधि में भी स्नातक उपाधि ग्रहण की। वे बॉम्बे यूनिवर्सिटी में स्नात्तकोत्तर अर्थशास्त्र के स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी रहे हैं। दम्माणी का स्वास्थ्य अब पूर्ण रूप से सही नहीं है इसलिए 2004 के बाद दम्माणी ने लिखना बंद कर दिया। अब वे आंखों की कमजोरी के कारण लिख नहीं पाते लेकिन लिखने की तमन्ना उनके मन में है। वे अब विभिन्न समारोहों में बोल कर अपनी तमन्ना पूरा करते हैं। श्याम लाल दम्माणी का कहना है कि वे अपने साठवें जन्मदिन पर ‘स्वाध्याय आंदोलन’ के प्रमुख व स्वनामधन्य पांडुरंग जी शास्त्री का आशीर्वाद लेने उनके घर पहचे। शास्त्री जी को दम्माणी अपना गुरू मानते हैं।

श्याम लालजी दम्माणीबीकानेर मूल के बम्बई प्रवासी श्याम लाल जी दम्माणी ने सबसे ज्यादा ‘संपादक के नाम पत्र’ लिखा है। उनके करीब साढ़े चार हजार ‘लेटर टू एडिटर’ प्रकाशित हो चुके हैं। इस उपलब्धि के लिए उनका नाम लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज हो गया है। 70 वर्षीय दम्माणी ने संपादकों को पत्र लिखने का काम 60 वर्ष की उम्र में शुरू किया। श्याम लाल दम्माणी के ये पत्र हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी सहित गुजराती के समाचार पत्रों में छप चुके हैं। श्याम लाल दम्माणी ने अपनी स्नात्तकोत्तर शिक्षा अर्थशास्त्र में की है तथा विधि में भी स्नातक उपाधि ग्रहण की। वे बॉम्बे यूनिवर्सिटी में स्नात्तकोत्तर अर्थशास्त्र के स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी रहे हैं। दम्माणी का स्वास्थ्य अब पूर्ण रूप से सही नहीं है इसलिए 2004 के बाद दम्माणी ने लिखना बंद कर दिया। अब वे आंखों की कमजोरी के कारण लिख नहीं पाते लेकिन लिखने की तमन्ना उनके मन में है। वे अब विभिन्न समारोहों में बोल कर अपनी तमन्ना पूरा करते हैं। श्याम लाल दम्माणी का कहना है कि वे अपने साठवें जन्मदिन पर ‘स्वाध्याय आंदोलन’ के प्रमुख व स्वनामधन्य पांडुरंग जी शास्त्री का आशीर्वाद लेने उनके घर पहचे। शास्त्री जी को दम्माणी अपना गुरू मानते हैं।

गुरु ने शिष्य से पूछा कि जिंदगी के साठ सालों में उपलब्धि क्या हासिल की तो श्याम लाल दम्माणी निरूत्तर हो गए। तब गुरू पांडुरंग जी शास्त्री ने श्याम लाल दम्माणी को सम्पादक के नाम पत्र लिखने का आदेश दिया। अपने गुरु का आदेश पाते ही श्याम लाल दम्माणी ने अपना पहला सम्पादक के नाम पत्र  1991 में लिखा और प्रसिद्ध दैनिक अखबार जनसत्ता को भेजा जिसका शीर्षक था- हम कहां जा रहें हैं। श्याम लाल दम्माणी का यह पहला पत्र जनसत्ता में छपा और इस तरह शुरू हुआ एक सिलसिला जो 2004 तक जारी रहा। इस दौरान श्याम लाल दम्माणी देश के राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय अखबारों में अनवरत व प्रतिदिन लिखते व छपते रहे। इस दौरान उन्होंने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सहित लगभग सभी विषयों को छुआ। श्याम लाल दम्माणी ने दैनिक हिन्दुस्तान के नामचीन सम्पादकों के सम्पादकीय पर टिप्पणियाँ की।

श्याम लाल दम्माणी के सम्पादक के नाम पत्र इंडियन एक्सप्रेस,  नवभारत टाइम्स,  टाइम्स ऑफ इंडिया,  गुजरात समाचार,  दैनिक सामना सहित देश के सभी प्रमुख अखबारों में छप चुके हैं। श्याम लाल दम्माणी की इस अनवरत यात्रा को लिम्का बुक ऑंफ रिकार्ड्स में दर्ज किया गया। पूरे देश ने श्याम लाल दम्माणी के इस जुनून को इज्जत दी और देश भर की कईं संस्थाओं ने समय-समय पर श्याम लाल दम्माणी को सम्मानित किया। श्याम लाल दम्माणी का कहना है कि आज भी उन्हें वह दिन याद है जब उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के विरोध में सम्पादक के नाम पत्र लिखा और गोयनका जी ने उसे अपने अखबार में स्थान दिया और पत्र की प्रशंसा की। श्याम लाल दम्माणी पत्र लिखने के कार्य से मिले सम्मान से खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

अखबार की कुछ नीतियों को लेकर थोड़ी पीडा महसूस करते हुए दम्माणी ने बताया कि सम्पादक के नाम पत्र वैचारिक द्वंद्व को अभिव्यक्त करने का सशक्त जरिया है और किसी भी समाचार पत्र का महत्वपूर्ण स्तम्भ है लेकिन कोई भी अखबार सम्पादक के नाम पत्र के लेखक को उस अखबार की एक प्रति तक उपलब्ध करवाना उचित नहीं समझता और न ही कभी लेखक को किसी प्रकार का कोई भुगतान करने की बात सोचता है। दम्माणी ने कहा कि अगर ऐसा कुछ हो जाए तो इस प्रवृत्ति को प्रेरणा मिले। श्याम लाल दम्माणी का यह प्रयास मिसाल है कि उम्र के अंतिम पड़ाव कहे जाने वाले समय में भी बहुत कुछ किया जा सकता है। 


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