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संपादकजी लोग पढ़ रहे हैं मैनेजमेंट का ककहरा

ग्रेटर नोएडा में पांच दिनी वर्कशाप : अखबार की तरक्की के लिए संपूर्ण समझ विकसित करने की ट्रेनिंग : छात्रों जैसी हुई संपादकों की जीवनचर्या : अमर उजाला के सभी एडिशनों के संपादक आजकल ग्रेटर नोएडा में डेरा डाले हुए हैं। इनकी ट्रेनिंग चल रही है। इन्हें बेहतर तरीके से रोजाना के कार्य निष्पादन के गुर सिखाए जा रहे हैं। खबरों की गूढ़ समझ रखने वाले संपादकों को बदले हुए जमाने में समूह को आगे ले जाने के लिए बेहतर प्रबंधन के फंडे भी बताए-पढ़ाए जा रहे हैं। इसके लिए संपादकों को ग्रेटर नोएडा स्थित बिरला इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट एंड टेक्नालजी के क्लास रूम में सुबह-सुबह जमा हो जाना पड़ता है। फिर शुरू होता है प्रबंधन गुरुओं द्वारा ट्रेनिंग का सिलसिला। दिन भर की पढ़ाई-लिखाई के बाद थके-हारे संपादाकों के लिए शाम के आखिरी सत्र में योगा की क्लास शुरू होती है। तनावमुक्त होने के बाद संपादक देर शाम अपने निवास की ओर कूच कर जाते हैं। 

ग्रेटर नोएडा में पांच दिनी वर्कशाप : अखबार की तरक्की के लिए संपूर्ण समझ विकसित करने की ट्रेनिंग : छात्रों जैसी हुई संपादकों की जीवनचर्या : अमर उजाला के सभी एडिशनों के संपादक आजकल ग्रेटर नोएडा में डेरा डाले हुए हैं। इनकी ट्रेनिंग चल रही है। इन्हें बेहतर तरीके से रोजाना के कार्य निष्पादन के गुर सिखाए जा रहे हैं। खबरों की गूढ़ समझ रखने वाले संपादकों को बदले हुए जमाने में समूह को आगे ले जाने के लिए बेहतर प्रबंधन के फंडे भी बताए-पढ़ाए जा रहे हैं। इसके लिए संपादकों को ग्रेटर नोएडा स्थित बिरला इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट एंड टेक्नालजी के क्लास रूम में सुबह-सुबह जमा हो जाना पड़ता है। फिर शुरू होता है प्रबंधन गुरुओं द्वारा ट्रेनिंग का सिलसिला। दिन भर की पढ़ाई-लिखाई के बाद थके-हारे संपादाकों के लिए शाम के आखिरी सत्र में योगा की क्लास शुरू होती है। तनावमुक्त होने के बाद संपादक देर शाम अपने निवास की ओर कूच कर जाते हैं। 

संपादकों के रुकने की व्यवस्था इंस्टीट्यूट के हास्टलों व गेस्ट हाउसों में की गई है। खाने का इंतजाम इंस्टीट्यूट के छात्रों वाले मेस में है। कल से शुरू हुआ ट्रेनिंग सेशन पांच दिनों तक चलेगा। अमर उजाला के सभी संपादकों के लिए यह वर्कशाप खुद को नई ऊर्जा से लैस करने का माध्यम बन रहा है। आमतौर पर अखबार के रोजाना के कामकाज में व्यस्त रहने वाले संपादक खुद के लिए फुर्सत कम निकाल पाते हैं। ग्रेटर नोएडा में आकर उन्हें न सिर्फ नई चीजें सीखने-समझने को मिल रही हैं बल्कि छात्रों सरीखी जीवनचर्या के जरिए खुद को तरोताजा कर पा रहे हैं। ट्रेनिंग में संपादकों को बताया जा रहा है कि मैनेजमेंट का मतलब सिर्फ सरकुलेशन और विज्ञापन के काम को समझना ही नहीं होता। अखबार की कंप्लीट ग्रोथ के बारे में संपूर्ण विजन विकसित करना सबसे महत्वपूर्ण काम है। एडिटोरियल में भी मैनेजमेंट की जरूरत होती है। टीम के सदस्यों के साथ बेहतर समन्वय, स्वस्थ माहौल में बेस्ट काम ले पाना भी इसी दायरे में आता है।

एमबीए का पांच दिनों का यह शार्ट कोर्स संपादकों को प्रतिद्वंद्वितापूर्ण आधुनिक माहौल में आगे बढ़ने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत बनाने वाला है। प्रबंधन की मंशा है कि संपादक नए जमाने के कारपोरेट स्किल से भी लैस हों ताकि अखबार को नई ऊंचाई प्रदान करने में वे अपनी संपूर्ण समझ का सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल कर सकें। शिक्षण-प्रशिक्षण के दौरान बताया जा रहा है कि पोंगापंथी और परंपरावादी संपादक इस दौर की चुनौतियों से निपटने में क्यों व किस तरह अक्षम है और नई उम्र के प्रतिभाशाली पत्रकार अखबार के सभी कामों की लय-ताल-गति समझ कर किस तरह अपने ब्रांड को प्रतिद्वंद्वी अखबारों से मजबूत बनाने में सक्षम हैं।

इस बीच, शशि शेखर के जाने के बाद अमर उजाला समूह के संपादकीय विभाग के प्रधान सेनापति के रूप में निदेशक अतुल माहेश्वरी ने पूरी सक्रियता के साथ कामकाज शुरू कर दिया है। ग्रुप के सभी संपादक सीधे उन्हें रिपोर्ट करने लगे हैं। अतुल माहेश्वरी हर रोज संपादकों से खबरों के संबंध में चर्चा-मशविरा करते हैं। समाचार संबंधी योजनाओं को अपने यहां मंगाकर उस पर राय देते हैं। इस प्रक्रिया में अतुल माहेश्वरी को अपने संपादकों के गुण-दोष भी समझने का मौका मिल रहा है। संपादकीय विभाग, संपादकीय नेतृत्व और कंटेंट की सर्वोच्चता को हर हाल में प्रथम वरीयता पर रखने वाले अतुल माहेश्वरी अखबार को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए संपादकों को प्रोफेशनल, प्रगतिशील व बहुआयामी सोच से लैस करने की मुहिम में जुटे हैं। वर्कशाप इसी का हिस्सा है। आने वाले दिनों में अमर उजाला में कंटेंट की बेहतरी के लिए कई और नए प्रयोग देखने को मिल सकते हैं।

अमर उजाला के संपादक जहां ग्रेटर नोएडा में अखबार को बेहतर बनाने के लिए खुद को अपग्रेड कर रहे हैं तो उनकी यूनिटों में कार्य करने वाले कई पत्रकार इन लोगों के न होने से राहत की सांस ले रहे हैं। रोजाना के काम के दबाव व तनाव से थोड़ी मुक्ति मिलने के कारण ये अपने को अपेक्षाकृत सहज पा रहे हैं। वर्कशाप में आए संपादक अपने मोबाइल फोन या तो स्विच आफ रखते हैं या फोन को साइलेंट मोड में डाल देते हैं। इससे खासकर रिपोर्टरों को राहत है। शाम को वर्कशाप से निकलने के बाद ही संपादक लोग अपनी यूनिटों से संपर्क स्थापित कर पाते हैं। चूंकि अमर उजाला एक सिस्टम प्रधान समूह है जहां व्यक्ति की बजाय सिस्टम कार्य करता है, इसलिए संपादकों के अपने-अपने आफिसों में कुछ दिन न होने से अखबार की क्वालिटी पर कोई खास फर्क नहीं दिखाई पड़ रहा है।

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