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‘समकालीन जनमत’ का प्रकाशन फिर से शुरू

हिंदी पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ का प्रकाशन फिर से शुरू हो गया है। 1980 के बिहार के किसान आन्दोलन के गर्भ से पैदा हुई इस पत्रिका का प्रकाशन कई बार शुरू हुआ और संसाधनों के अभाव में कई बार स्थगित किया गया। कभी इसका मुख्यालय पटना बनाया गया तो कभी दिल्ली। एक बार फिर नए तेवर और कलेवर के साथ पत्रिका का पुनर्प्रकाशन शुरू हुआ है। अबकी इसका मुख्यालय इलाहाबाद है। 15 रुपये की इस पत्रिका के प्रधान संपादक रामजी राय हैं तो संपादक सुनील यादव। ‘समकालीन जनमत’ के नये अंक का लोकार्पण डा. भीमराव अम्बेडकर महासभा सभागार, लखनऊ में 8 अक्तूबर को हुआ।

हिंदी पत्रिका ‘समकालीन जनमत’ का प्रकाशन फिर से शुरू हो गया है। 1980 के बिहार के किसान आन्दोलन के गर्भ से पैदा हुई इस पत्रिका का प्रकाशन कई बार शुरू हुआ और संसाधनों के अभाव में कई बार स्थगित किया गया। कभी इसका मुख्यालय पटना बनाया गया तो कभी दिल्ली। एक बार फिर नए तेवर और कलेवर के साथ पत्रिका का पुनर्प्रकाशन शुरू हुआ है। अबकी इसका मुख्यालय इलाहाबाद है। 15 रुपये की इस पत्रिका के प्रधान संपादक रामजी राय हैं तो संपादक सुनील यादव। ‘समकालीन जनमत’ के नये अंक का लोकार्पण डा. भीमराव अम्बेडकर महासभा सभागार, लखनऊ में 8 अक्तूबर को हुआ।

कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच और लेनिन पुस्तक केन्द्र ने संयुक्त रूप से किया जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि व कथाकार भगवान स्वरूप कटियार ने की। कार्यक्रम का संचालन कवि और जसम, लखनऊ के संयोजक कौशल किशोर ने किया। पत्रिका का लोकार्पण करते हुए जाने-माने लेखक और पत्रकार अनिल सिन्हा ने कहा कि हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन से पत्रकारिता के क्षेत्र में जो सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना आयी थी उसे पूँजी तथा बाजार के दबाव ने खत्म कर दिया है। आहत व व्यथित कर देने वाली खबरें और घटनाएं भी इस तरह से परोसी जा रही हैं जो हमें संवेदित नहीं करती। इस चिन्ताजनक स्थिति ने ही वैकल्पिक या जनपक्षधर मीडिया की जरूरत को सामने ला दिया है। ‘समकालीन जनमत’ का मासिक के बतौर प्रकाशन इस दिशा में एक कारगर व जरूरी कदम कहा जायेगा।

‘समकालीन जनमत’ के सम्पादक सुनील यादव ने कहा कि जब ‘आम आदमी’ के नारे की आड़ लेकर आम आदमी के सवालों को खूबसूरती से दरकिनार किया जा रहा है, हमारे पत्थर दिल नेता आत्ममुग्धता के शिकार होकर अपनी मूर्तियां गढवाने तथा हरिजन बस्ती में गांधी जयन्ती मनाने का नाटक करने में मशगूल हैं, ऐसे में इन ताकतों का पर्दाफाश करते हुए जनता के सच और संघर्ष को मीडिया के माध्यम से बुलन्द करना ही सच्ची पत्रकारिता है। इसी मकसद से ‘समकालीन जनमत’ को हम अपने पाठकों के हाथ सौंप रहे हैं। समाज की बेहतरी के लिए सक्रिय लोगों का सहयोग ही इसकी ताकत है।

कार्यक्रम को अजय सिंह, डा. गिरीश चन्द श्रीवास्तव, सुभाषचन्द्र कुशवाहा, ताहिरा हसन, अनिल यादव, शोभा सिंह, वीरेन्द्र सारंग, श्याम अंकुरम, राजेश कुमार, के के वत्स, शालिनी बाजपेई, महेश पाण्डेय, आलोक पराड़कर, विमल किशोर, मंजु प्रसाद, बी एन गौड़, गंगा प्रसाद, दीपक श्रीवास्तव आदि लेखकों, पत्रकारों, संस्कृतिकर्मियों ने भी संबोधित किया तथा ‘समकालीन जनमत’ को अपनी शुभकामनाएं दीं। वक्ताओं का कहना था कि जहां उन्नत तकनीक की वजह से दृश्य व प्रिन्ट की गुणवत्ता बढ़ी है वहीं मुख्यधारा की पत्रकारिता की विश्वसनीयता में गिरावट दर्ज की जा रही है। बाजार और पूंजी के दबाव की वजह से जनसरोकारों के लिए मुख्यधारा की पत्रकारिता में जगह कम होती जा रही है। पत्रकारिता कारपोरेट पूंजी की गिरत में है। आज सम्पादकों, पत्रकारों, मीडिया से जुड़े कर्मचारियों के ऊपर छंटनी, रोजगार, असुरक्षा का शिकंजा कसता जा रहा है। पत्रकारों की स्वतन्त्रता और उनकी सृजनात्मकता खतरे में है। ये ही स्थितियां ‘समकालीन जनमत’ जैसी वैकल्पिक मीडिया की जरूरत को सामने लाती हैं।

ज्ञात हो कि ‘जनमत’ की शुरुआत पटना से हुई थी। अग्निपुष्प, नवेन्दु और श्रीकान्त – जैसे युवा लेखक व पत्रकार इसके शुरुआती संपादक थे। यह क्रान्तिकारी वामपंथी लेखक महेश्वर की प्रतिभा, परिश्रम और साथ था जिससे ‘जनमत’ में न सिर्फ राजनीतिक-वैचारिक गहराई आयी बल्कि इसके पाठकों का दायरा भी बढा। ‘आदमी को निर्णायक होना चाहिए’ इस वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ ताजिन्दगी संघर्ष करने वाले महेश्वर के लिए ‘जनमत’ उनका वैचारिक व सांस्कृतिक मंच था। ‘जनमत’ इसी प्रक्रिया में ‘समकालीन जनमत’ हुई। रामजी राय, बृजबिहारी पाण्डेय, सुधीर सुमन, प्रणय कृष्ण, के के पाण्डेय जैसे लेखक-संस्कृतिकर्मी पत्रिका के संपादन से जुड़े।

पत्रिका को पाने के लिए यहां संपर्क कर सकते हैं-

समकालीन जनमत

171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने)

इलाहाबाद-211002

मोबाइल नंबर- 09451845553

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