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‘पांच लाख में दिलवा देंगे चैनल की फ्रेंचाइजी’

जागरण समूह के टैबलायड अखबार आई-नेक्स्ट की आगरा यूनिट के दो रिपोर्टरों संजय त्रिपाठी और राजीव शर्मा ने एक नायाब काम किया है। इन दोनों ने पत्रकारिता में चल रहे धंधेबाजी का खुलासा एक स्टिंग आपरेशन के जरिए किया। इस स्टिंग आपरेशन से संबंधित विस्तृत खबर आज के आई-नेक्स्ट, आगरा के तीन पेजों पर प्रकाशित हुई है। वहीं से साभार लेकर पूरी कहानी और तस्वीरें हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। शायद यह पहली बार हुआ है जब मुख्य धारा के किसी बड़े अखबार ने पत्रकारिता के धंधे के खिलाफ स्टिंग आपरेशन किया हो। इस रिपोर्ट के पढ़ने के बाद यह महसूस होता है कि किस तरह गली-कूचे में पत्रकारिता का धंधा जोर पकड़ रहा है। पूरी स्टोरी बेहद अच्छे तरीके से लिखी और संपादित की गई है। बहुत दिनों बाद किसी अच्छी स्टोरी को पढ़ने का सुख मिलेगा हम सभी को। आई नेक्स्ट, आगरा के दोनों रिपोर्टरों संजय त्रिपाठी और राजीव शर्मा को उनकी जांबाजी के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। 

– एडिटर, भड़ास4मीडिया

जागरण समूह के टैबलायड अखबार आई-नेक्स्ट की आगरा यूनिट के दो रिपोर्टरों संजय त्रिपाठी और राजीव शर्मा ने एक नायाब काम किया है। इन दोनों ने पत्रकारिता में चल रहे धंधेबाजी का खुलासा एक स्टिंग आपरेशन के जरिए किया। इस स्टिंग आपरेशन से संबंधित विस्तृत खबर आज के आई-नेक्स्ट, आगरा के तीन पेजों पर प्रकाशित हुई है। वहीं से साभार लेकर पूरी कहानी और तस्वीरें हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। शायद यह पहली बार हुआ है जब मुख्य धारा के किसी बड़े अखबार ने पत्रकारिता के धंधे के खिलाफ स्टिंग आपरेशन किया हो। इस रिपोर्ट के पढ़ने के बाद यह महसूस होता है कि किस तरह गली-कूचे में पत्रकारिता का धंधा जोर पकड़ रहा है। पूरी स्टोरी बेहद अच्छे तरीके से लिखी और संपादित की गई है। बहुत दिनों बाद किसी अच्छी स्टोरी को पढ़ने का सुख मिलेगा हम सभी को। आई नेक्स्ट, आगरा के दोनों रिपोर्टरों संजय त्रिपाठी और राजीव शर्मा को उनकी जांबाजी के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। 

– एडिटर, भड़ास4मीडिया

पत्रकारिता का धंधा

इधर लगातार शहर में और शहर के बाहर से ऐसी खबरें आईं, जिनमें फर्जी पत्रकारों की करतूतें या फिर पत्रकारिता की आड़ में गलत धंधों को बड़ी बेफिक्री से अंजाम दिया जा रहा था. बीते दिनों आईएसआई एजेंट इम्तियाज उर्फ इमली के पास से भी प्रेस का आईकार्ड मिला था. इसके अलावा शहर में भी पुलिस ने तमाम फर्जी पत्रकारों को गिरफ्तार किया. ये वाकये जहां हमें चौंका रहे थे, वहीं ऐसे लोगों की हरकतों से पत्रकारिता पर लग रहे कलंक को लेकर चिंता भी हुई. इसे देखते हुए हमने शहर में चल रहे पत्रकारिता के गोरखधंधे के खिलाफ एक स्टिंग आपरेशन प्लान किया. आखिरकार एक जालसाज हमारे हत्थे चढ़ा, जो खुलेआम लोगों को कुछ नोटों के बदले पत्रकार होने का लाइसेंस दे रहा था. जब हम उससे मिले तो उसने महज कुछ सौ रुपए में सिर्फ एक दिन की मुलाकात के बाद हमें अपनी पत्रिका का आईकार्ड दे दिया. आई नेक्स्ट के इस सनसनीखेज खुलासे को अपने हिडेन कैमरे में कैद किया आई नेक्स्ट के रिपोर्टर संजय त्रिपाठी और राजीव शर्मा ने.

पांच लाख में दिलवा देंगे चैनल की फ्रेंचाइजी

वैसे तो अभी तक स्टिंग ऑपरेशन करने का ट्रेंड इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ही हुआ करता था, क्योंकि वहां विजुअल्स का प्रेजेंटेशन बेहतर तरीके से किया जा सकता है. मगर, हिडेन कैमरे से यह प्रयोग हमने पहली बार आई नेक्स्ट में किया है, ताकि शहर में पत्रकारिता को बदनाम कर रहे लोगों के चेहरे बेनकाब हो सकें. यह कहने में हमें जरा सी भी हिचक नहीं है कि कुछ कारणों और मामलों के चलते मीडिया पर भी उंगलियां उठने लगी हैं. वहीं मीडिया के नेम-फेम को देखते हुए तमाम ऐसे लोग जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक का नाता नहीं है, वे भी अब नोटों का वजन रखकर पत्रकारिता को तौल रहे हैं. ऐसे लोगों का साथ देने वाले भी पत्रकार की खाल में छुपे धंधेबाज ही हैं. ये बड़ा ही शर्मनाक पहलू है, लेकिन इस गंदगी की सफाई का जिम्मा भी शायद हमारे ही पास है. आई नेक्स्ट ने इस खुलासे के जरिए पत्रकारिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी दिखाई.

यूं हुआ सामना : इस स्टिंग ऑपरेशन में हमें एक ऐसे शख्स का पता चला जो एक पत्रिका की आड़ में लोगों को प्रेस लिखा आईकार्ड बांटने का धंधा करता है. इनका नाम है वरुण महाराज. इनका ठिकाना है पुलिस लाइन के सामने स्थित एडीए मार्केट की एक दुकान में. सटीक सूचना पर हम इनसे मिलने पहुंचे. दुकान के बाहर एक एलएमएल स्कूटर खड़ा दिखा, जिस पर संपादक लिखा था. साथ ही कुछ और टू-व्हीलर्स खड़ी थीं, जिनमें प्रेस लिखा हुआ था. दुकान के भीतर गए तो सामने ही वरुण महाराज दिखे. भारी-भरकम शरीर वाले वरुण महाराज के सामने हम बैठ गए. उनके पीछे की दीवार पर तमाम देवी-देवताओं की तस्वीरें भी थीं. दिन के करीब बारह बजे थे. वरुण महाराज एक बड़े से रजिस्टर में कुछ नामों की एंट्री कर रहे थे. ये तमाम नाम उन फॉर्म से उतारे जा रहे थे जिन पर जर्नलिस्ट एसोसिएशन लिखा हुआ था. थोड़ी देर तक उन्होंने कुछ पूछा ही नहीं आप कौन-कहां से. इस पर हमने खुद ही उन्हें टोक दिया. आने की वजह साफ-साफ बता दी.

रिपोर्टर : गुरूजी हमें प्रेस का आईकार्ड चाहिए.

गुरूजी : किस लिए.

रिपोर्टर : बस ऐसे ही कभी-कदार पुलिस गाड़ी रोक लेती है. पेपर हैं नहीं.

गुरूजी : तुमने पहले भी इस संबंध में बातचीत की थी.

रिपोर्टर : जी.

गुरूजी : (झल्लाकर) फिर आए क्यों नहीं. मैंने तुम्हें तमाम फोन किए. मैं तुम्हें कर्जा मांगने के लिए तो फोन नहीं कर रहा था और न ही मैं तुम्हारा चौकीदार हूं.

रिपोर्टर : गुरूजी, गलती हो गई. कुछ पारिवारिक विवाद हो गया था. उसी में उलझ गया था.

गुरूजी : तो अब क्या करने आए हो.

रिपोर्टर : अरे, गुरूजी अब क्षमा कर दीजिए. इस बार गायब नहीं होऊंगा.

इसके बाद काफी मान-मनौव्वल के बाद गुरूजी प्रेस का आईकार्ड बनाने को तैयार हो गए. लाइफ टाइम कार्ड की कीमत उन्होंने बारह सौ रुपए बताई. बहुत ज्यादा होने की बात गुरूजी से कही गई तो उन्होंने एक साल की वैलेडिटी वाले कार्ड के लिए सात सौ पैंतीस रुपए मांगे. रिपोर्टर ने कुछ कम करने को कहा तो वे एक पैसा कम करने को तैयार नहीं हुए. साथ ही पूरे पैसे जमा करने को कहा. मगर, रिपोर्टर ने पूरे पैसे न होने के चलते दो सौ रुपए एडवांस दिए. इस पर गुरूजी ने रिपोर्टर को एक फॉर्म दिया. यह फॉर्म किसी जर्नलिस्ट एसोसिएशन की पत्रिका का था. पहला रिपोर्टर फॉर्म भरने में मशगूल हो गया तभी दूसरे रिपोर्टर ने भी गुरूजी से बातचीत शुरू की.

गुरूजी : (दूसरे रिपोर्टर से) आप क्या करते हैं.

रिपोर्टर : कुछ नहीं, आप बताइए कुछ काम हो तो. ये चैनल-वैनल का कुछ काम मिल सकता है गुरूजी.

गुरूजी : हां, क्यों नहीं. पैसे खर्च करने की दम है?

रिपोर्टर : कितना.

गुरूजी : करीब पांच लाख.

रिपोर्टर : इस पैसे का क्या होगा.

गुरूजी : किसी चैनल की फ्रेंचाइजी दिलवा देंगे.

रिपोर्टर : उससे फायदे क्या-क्या होंगे.

गुरूजी : फायदे-ही फायदे हैं. कुछ भी करो. पुलिस-प्रशासन सब मुठ्ठी में.

रिपोर्टर : अगर, किसी अपराधी को थाने से छुड़वाना हुआ तो.

गुरूजी : सब हो जाएगा.

रिपोर्टर : अच्छा गुरूजी. आप के पास कौन-कौन से काम हैं.

गुरूजी : मैं दो मैगजीन निकालता हूं. देवी जागरण भी करने जाता हूं.

(इसी बीच गुरूजी ने राजस्थान के एक बड़े हिंदी दैनिक में अपने जागरण कार्यक्रम की फोटो दिखाई)

रिपोर्टर : बहुत अच्छा है. अपने काम में ही लगा लीजिए.

गुरूजी : किसमें.

रिपोर्टर : बस आप अपनी मैगजीन की फ्रेंचाइजी मुझे दे दीजिए, किसी दूसरे जिले के लिए. मैं भी वहां से ऐसे लोगों को लाऊंगा, जो प्रेस कार्ड बनवाने के लिए मोटा पैसा देंगे. इस पैसे का बंटवारा कर लिया जाएगा.

गुरूजी : लेकिन कार्ड मैं ही जारी करूंगा और हेड ऑफिस का एड्रेस यहीं का होगा.

रिपोर्टर : कोई दिक्कत नहीं. कितना पैसा देना होगा.

गुरूजी : कितना दे सकते हो.

रिपोर्टर : आप कम से कम बता दीजिए. एक बार काम शुरू हो गया तो फिर वारे-न्यारे हो जाएंगे.

गुरूजी : चलो बीस हजार रुपए तैयार करो.

रिपोर्टर : गुरूजी. आपकी मैगजीन की एक कॉपी देख सकता हूं.

गुरूजी : अभी तो है नहीं. फिर दिखा दूंगा.

इधर, पहला रिपोर्टर फॉर्म भर चुका था. गुरूजी ने उससे फोटो मांगे. रिपोर्टर ने शाम को कार्ड देने की बात कहते हुए फोटो उन्हें सौंप दीं. फॉर्म में भरे फर्जी पते पर गुरूजी को कुछ शक हुआ. उन्होंने पूछताछ शुरू कर दी.

गुरूजी : यह पता सही है?

रिपोर्टर : हां, गुरूजी. गलत क्यों देंगे.

गुरूजी : नहीं तुम आदमी ठीक नहीं लगते हो.

रिपोर्टर : (हंसते हुए) अरे नहीं गुरूजी. ऐसा कुछ नहीं है. आप चेक करवा लो.

गुरूजी : हां. अब चेक करने के बाद ही कार्ड दूंगा.

रिपोर्टर : आप चेक करवा लो. हम शाम को आ जाएंगे कार्ड लेने.

गुरूजी : आज नहीं कल शाम को आना.

रिपोर्टर : अरे, ऐसा न कहिए. गड़बड़ हो जाएगी.

गुरूजी : क्या गड़बड़ हो जाएगी. इतनी जल्दी में क्यों हो.

रिपोर्टर : गुरूजी, कल दिल्ली जाना है. दूसरे की बाइक लेकर. लाइसेंस खो गया है. कहीं पुलिस ने गाड़ी रोक ली तो कार्ड दिखाकर बच तो जाएंगे.

गुरूजी : लाइसेंस खोने की रिपोर्ट दिखाओ.

रिपोर्टर : (अनजान बनते हुए) कैसी रिपोर्ट. क्या रिपोर्ट भी करानी पड़ती है.

गुरूजी : थाने में लिखकर देना पड़ता है.

रिपोर्टर : पता नहीं था. अभी करा देता हूं.

गुरूजी : अच्छा, चलो कल दिन में आ जाना.

रिपोर्टर : शाम को दे दीजिए गुरूजी.

गुरूजी : (नाराज होते हुए) कार्ड बनवाना हो तो बनवाओ नहीं तो ये अपने पैसे उठाओ.

रिपोर्टर : अरे नाराज मत होइए. कल दिन में आ जाऊंगा.

गुरूजी ने कहा कि वे पहले फॉर्म में भरे गए पते की जांच करेंगे, तभी कार्ड इश्यू करेंगे. इस पर मन में यह संशय था कि अगर पते की जांच की जाएगी तो पोल खुल जाएगी और यह जालसाज हाथ से निकला समझो. खैर किसी तरह से रात कटी. अगले दिन की सुबह हम फिर वहां पहुंचे, लेकिन लाइट नहीं आ रही थी. एक वकील साहब बैठे थे, जिनसे गुरूजी करौली में अपनी किसी जमीन के डिस्प्यूट पर चर्चा में मशगूल थे. धीमी-धीमी बारिश हो रही थी.

रिपोर्टर : (पैर छूकर) गुरूजी प्रणाम.

गुरूजी ने ध्यान नहीं दिया. वे लगातार वकील से बातें करते रहे.

रिपोर्टर : (पांच मिनट बाद) गुरूजी वो कार्ड..

गुरूजी : (पुरी बात बोल पाते इससे पहले ही गुरूजी तपाक से एक पेन ड्राइव दिखाते हुए बोले) लाइट नहीं आ रही है. आधे घंटे इंतजार करो. अभी तुम्हारे साथ चलूंगा. कार्ड बन गया है प्रिंट होना बाकी है. बाहर देखो पानी बरस रहा है या रुक गया.

रिपोर्टर : नहीं गुरूजी. बारिश हो रही है.

गुरूजी : पानी रुक जाए फिर साथ में चलते हैं.

रिपोर्टर : (थोड़ी देर बैठने के बाद) गुरूजी भूख लगी है. हम थोड़ी देर में कुछ आ-पीकर आते हैं.

गुरूजी : जाओ, लेकिन जल्दी लौट आना. अगर मैं यहां से उठ गया तो फिर काम लटक जाएगा.

हम लोग करीब चालीस मिनट बाद लौटे. लाइट अभी भी नहीं आ रही थी. गुरूजी की हनक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था इस बार उनके सामने एक दरोगा और सिपाही बैठे थे. गुरूजी बड़े दोस्ताना अंदाज में उनसे बात कर रहे थे. गुरूजी ने उनसे भी जमीन वाला डिस्कशन किया. चाय-पानी करके ये पुलिसवाले वहां से चले गए.

गुरूजी : हां, अब बताओ.

रिपोर्टर : बस आपके आदेश का इंतजार है.

गुरूजी : चलो बाकी के पैसे दो.

रिपोर्टर ने बाकी के पांच सौ पैंतीस रुपए गुरूजी के हाथ में थमा दिए.

गुरूजी : कौन सी गाड़ी से आए हो?

रिपोर्टर : कार है गुरूजी.

गुरूजी : तो पहले क्यों नहीं बताया. पानी रुकने का इंतजार क्यों करते. चलो चला जाए.

रिपोर्टर : कहां चलना है.

गुरूजी : जयपुर हाउस.

गाड़ी में बैठाकर गुरूजी के बताए रास्ते की तरफ हम चल पड़े. रास्ते में गुरूजी ने गाड़ी को ट्रैफिक पुलिस लाइन की तरफ मुड़वाया. गाड़ी उन्होंने ठीक एसपी ट्रैफिक के ऑफिस के सामने लगाने को कहा. गाड़ी की अगली सीट पर गुरूजी को देख वहां मौजूद तीन-चार सिपाहियों ने उन्हें सलाम ठोंका. इसके बाद वे उनकी तरफ बढ़े. गुरूजी भी सिपाहियों पर रौब ठोंकते हुए उनका हाल-चाल लेते हैं. एक सिपाही तो गुरूजी को गाड़ी से उतरकर ऑफिस के भीतर आने की जिद तक करने लगा. काफी कहने के बाद गुरूजी ऑफिस में गए. यहां मौजूद स्टाफ में से शायद ही कोई ऐसा हो जो उन्हें न जानता हो. करीब पांच-सात मिनट तक गुरूजी यहां रुके. उसके बाद चलने का इशारा करते हुए गाड़ी मुड़वाई. गाड़ी सीधे जयपुर हाउस स्थित एक इंटरनेट कैफे कम प्रिंटिंग सेंटर में रुकी. कैफे संचालक की तरफ गुरूजी ने पेन ड्राइव बढ़ाते हुए कुछ मैटर प्रिंट करने को कहा. मगर, उसने लाइट न आने की बात कही. गुरूजी ने हमसे थोड़ी देर यहीं इंतजार करने को कहा. कुछ मिनट भी नहीं बीते कि अचानक ट्यूबलाइट्स जगमगा उठीं. सभी खुश हो गए कि लाइट आ गई. गुरूजी ने पेन ड्राइव संचालक के आगे बढ़ाते हुए प्रेस कार्ड के मैटर का प्रिंट आउट निकालने को कहा. इसी में हमारा भी प्रेस कार्ड थी जिसमें पिता का नाम गलत लिख गया था. गुरूजी ने उसे करेक्ट करवाकर एक बड़ी सी शीट पर प्रिंट ले लिया. इस शीट पर अलग-अलग करीब दो दर्जन लोगों के प्रेस कार्ड थे. प्रिंट आउट हमारे सामने भी आया जिसे देखकर हैरानी का ठिकाना न रहा. ये सभी प्रेस कार्ड महज चालीस रुपए देकर गुरूजी के हाथ में थे. यहां काम करने वाले युवक ने कटर से सभी कार्ड अलग-अलग किए और प्रेस कार्ड की गड्डी गुरूजी को थमा दी. इन्हीं में से कुछ कार्डस हमने भी देखे जिसे हिडेन कैमरे में कैद किया गया. इस दौरान गुरूजी कैफे के कर्मचारियों से बातचीत में मशगूल रहे. हमारा कार्ड भी गुरूजी के पास था, जिसे देखकर हम मन ही मन मुस्कुरा रहे थे, कि चलो अभियान अंतिम दौर तक पहुंच गया. गुरूजी ने हमें यहां से चलने का इशारा किया. गाड़ी स्टार्ट करके हम सीधे गुरूजी के ऑफिस लौट आए. भीतर लाइट नहीं थी, इसलिए गुरूजी ने बाहर ही कुर्सियां डलवाकर हमें बैठा दिया. उसके बाद गड्डी से हमारा कार्ड निकाला और फोटो निकालकर उस पर चस्पा कर दिया. कार्ड को फिनिशिंग टच देने के बाद गुरूजी दोबारा ऑफिस में गए. वहां बड़े आराम से कार्ड पर साइन कर अपनी मोहर लगाई.

गुरूजी : ये रहा तुम्हारा कार्ड, लेकिन एक बात ध्यान रखना खुद कोई गलत काम में बंद मत होना. जो भी काम करना पहले मुझे बता देना.

रिपोर्टर : (कार्ड हाथ में लेते हुए) जैसा आपका आदेश.

कार्ड मिलने के बाद दूसरे रिपोर्टर ने खुद का कार्ड बनाने के लिए गुरूजी से कहा. इस पर गुरूजी ने अपनी दूसरी संस्था एंटी करप्शन ब्यूरो का कार्ड हमें ऑफर किया. हमने इसके फायदे पूछे तो गुरूजी बोले कि यह कार्ड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के कार्ड से कहीं पॉवरफुल है. हमने एक और जिज्ञासा गुरूजी के सामने रखी कि अगर थाने-चौकी में किसी मुलजिम को छुड़वाना है और उसके बदले मोटी रकम मिले तो गुरूजी तपाक से बोले बिल्कुल. मगर, पहले मुझे बता देना मैं सब निपटा लूंगा. सारी बातचीत के बाद हम लोगों ने कार्ड लिया और गुरूजी का आशीर्वाद लेकर वहां से चलते बने.  

फिर देखा कार्ड का करिश्मा : हमारा काम यहीं खत्म नहीं हुआ था. गुरूजी की बताई गई हनक और कार्ड की पॉवर आजमाने के लिए हमने फिर एक प्लान किया. सबसे पहले हम एक बाइक पर तीन लोग सवार होकर हरीपर्वत चौराहे पर पहुंचे. यहां हमने अपनी बाइक को ठीक चौराहे पर बैठी पुलिस पिकेट के सामने रोका. बाइक रुकते ही ट्रैफिक पुलिस के सिपाही हमारी ओर लपके और बाइक की चाभी निकालते हुए कागज दिखाने को कहा. हमने कागज-वागज को किनारे करते हुए जेब से सीधे इस कार्ड को निकालकर सिपाही के चेहरे के सामने अड़ा दिया. प्रेस लिखा देख सिपाही सिर्फ इतना ही कह सका कि भाई साहब पहले क्यों नहीं बताया. जाइए, आपको कौन रोकेगा. मुझे माफ कीजिएगा.

टीएसआई भी आ गया अर्दब में : हम लोग यहां से बाइक घुमाकर सेंट जॉन्स चौराहे पर पहुंचे. यहां हमेशा की तरह नीम के पेड़ के नीचे पुलिस की फौज जमी थी. जैसा अमूमन होता है सिपाही ने गाड़ी रोकी और सामने खड़े टीएसआई के पास भेजा. हमारे एक साथी ने टीएसआई को बताया कि हम प्रेस से हैं. इस पर टीएसआई ने कार्ड दिखाने को कहा. पलक झपकते ही भरपूर तेवरों के साथ कार्ड टीएसआई के सामने था. टीएसआई ने कार्ड पर एक नजर डाली और उसके बाद कार्ड हमें सौंपते हुए वहां जाने का ग्रीन सिग्नल दे दिया.

इस स्टिंग ऑपरेशन के जरिये हम गुरूजी को बदनाम नहीं करना चाहते बल्कि हम गुरूजी सहित शहर में तमाम ऐसे लोगों को बता देना चाहता हैं जो पत्रकारिता की आड़ में गोरखधंधे चला रहे हैं. साथ ही उन्हें बता देना चाहते हैं कि पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ ही रहने दें उसे धंधा न बनाएं. हम आपको ये भी बता दें कि गुरूजी की पत्रिका का रजिस्ट्रेशन है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वे बिना जांच-पड़ताल किए चंद रुपए के खातिर किसी भी अंजान व्यक्ति का प्रेस कार्ड बना दें. ये प्रेस कार्ड सम्मान और प्रतिष्ठा का पहचान पत्र नहीं है बल्कि ये समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराने के लिए है.

नोट- इस स्टिंग आपरेशन से जुड़ा वीडियो और दस्तावेज आई नेक्स्ट के आगरा कार्यालय में मौजूद है.


साभार- आई नेक्स्ट, आगरा

आई नेक्स्ट, आगरा में इस प्रकाशित स्टोरी को ई-पेपर पर देखने के लिए क्लिक करें- 1, 2 और 3

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