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‘जो हकों के लिए लड़ता है, उसी का शोषण होता है’

प्रिय यशवंत जी, प्रेम, मैं एक 76 वर्षीय व्यक्ति व अमित सिंह बाबा का पिता हूँ. मैंने अपने जीवन में जान-बूझकर कभी भी किसी के साथ न अन्याय किया न किसी का अन्याय  बर्दाश्त किया.पर अमित के साथ विगत कुछ वर्षों में जो होता रहा चुपचाप देखते रहना पड़ा क्योंकि मैं कुछ भी करूँ इसके लिए अमित जी मुझे सीधा मना कर देते. मुझे बड़ा असह्य दुः ख था कि एक पत्रकार जो तमाम लोगों के हकों के लिए लड़ता है उसका किस हद तक शोषण होता है यह किसी को पता तक नहीं. मुझे और भी आश्चर्य यह था कि मीडिया के एक भी व्यक्ति ने एक छोटी-सी आवाज़ भी नहीं उठाई.

प्रिय यशवंत जी, प्रेम, मैं एक 76 वर्षीय व्यक्ति व अमित सिंह बाबा का पिता हूँ. मैंने अपने जीवन में जान-बूझकर कभी भी किसी के साथ न अन्याय किया न किसी का अन्याय  बर्दाश्त किया.पर अमित के साथ विगत कुछ वर्षों में जो होता रहा चुपचाप देखते रहना पड़ा क्योंकि मैं कुछ भी करूँ इसके लिए अमित जी मुझे सीधा मना कर देते. मुझे बड़ा असह्य दुः ख था कि एक पत्रकार जो तमाम लोगों के हकों के लिए लड़ता है उसका किस हद तक शोषण होता है यह किसी को पता तक नहीं. मुझे और भी आश्चर्य यह था कि मीडिया के एक भी व्यक्ति ने एक छोटी-सी आवाज़ भी नहीं उठाई.

ऐसी स्थिति में मैंने जब ‘भड़ास4मीडिया’ पर ‘तबादले और वेतन कटौती से क्षुब्ध बाबा का इस्तीफा‘ शीर्षक समाचार पढ़ा तो लगा कि नहीं, पूरा मीडिया बेजान नहीं है. वहां भी ऐसे लोग हैं जिनके भीतर एक धड़कता ह्रदय है. मैं आपकी सहृदयता, साहस व न्यायप्रियता के लिए हार्दिक बधाई, साधुवाद व आशीष भेजता हूँ. परमात्मा करे आपको वह सब संभव हो जो कभी भी किसी को भी संभव हुआ हो.

अमित जी को ऐसे शोषण व अन्याय में पिसते देखकर मुझे एक प्रतीति हुयी उसे आपसे कहूँ कि ‘आंतकवादी मिटाए जा सकते हैं, आतंकवाद नहीं’. उसकी जड़ें अधिक गहरी हैं. जब तक हम प्रत्येक मनुष्य के लिए प्रेम और न्याय की सुविधा नहीं जुटा पाते तब तक आतंकवाद और नाक्सालवाद जैसी बीमारियों से निजात पाना असंभव है. जब तक हमारे समाज में एन केन प्रकारेण सफल हो जाना ही जीवन का मूल्य जो बन गया है इसके स्थान पर सत्यम, शिवम् और सुन्दरम को फिर स्थापित नहीं करते तब तक सब ऐसा ही चलता रहेगा बल्कि और अधिक खराब स्थितियां देखनी पड़ सकती हैं. हम ऐसे मूढ़ हैं कि हमी बीमारियों की दवा खोजते हैं जबकि हमी उन्हें जन्माते और पोषित करते हैं. देश-दुनिया अब आप सबके हाथों में है, जैसी चाहें वैसी बनायें.

एक बार पुनः साधुवाद व नमस्कार.

आपका,

स्वामी अगेह भारती

सतना (म.प.)

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