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‘कैरेक्टर पर उंगली उठाओ, लड़की हराओ’

मेरे पहनावे को लेकर आपको और आपके दैनिक जागरण को इतनी ही आपत्ति है तो ऑफिस के बाहर एक बोर्ड लगवा दीजिए जिस पर साफ-साफ शब्दों में लिखवा दीजिए- “Girls, only in suits are allowd inside” : धन्यवाद पवन जी, पहले मेल में मैं काफी बातें कह नहीं पाई थी, आपने मुझे एक और मौका दे दिया है अपनी बात रखने का. मैं कई बातों को छुपाना चाहती थी पर आप मुझे मजबूर कर रहे हैं जागरण की और अधिक पोल खोलने के लिए. खैर, कोई बात नहीं. पवन का पत्र पढ़कर मुझे कठपुतलियों का खेल याद आ गया है कि कैसे कठपुतलियों को धागों से चलाया-नचाया जाता है और कठपुतलियां चुपचाप चलती-नाचती रहती हैं. पवन जी, क्या आप इन कठपुतलियों में से तो नहीं! वैसे, ये बात भी सभी जानते हैं कि जूनियर तो जूनियर, जागरण में ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग भी कठपुतलियों से कुछ कम नहीं हैं.

मेरे पहनावे को लेकर आपको और आपके दैनिक जागरण को इतनी ही आपत्ति है तो ऑफिस के बाहर एक बोर्ड लगवा दीजिए जिस पर साफ-साफ शब्दों में लिखवा दीजिए- “Girls, only in suits are allowd inside” : धन्यवाद पवन जी, पहले मेल में मैं काफी बातें कह नहीं पाई थी, आपने मुझे एक और मौका दे दिया है अपनी बात रखने का. मैं कई बातों को छुपाना चाहती थी पर आप मुझे मजबूर कर रहे हैं जागरण की और अधिक पोल खोलने के लिए. खैर, कोई बात नहीं. पवन का पत्र पढ़कर मुझे कठपुतलियों का खेल याद आ गया है कि कैसे कठपुतलियों को धागों से चलाया-नचाया जाता है और कठपुतलियां चुपचाप चलती-नाचती रहती हैं. पवन जी, क्या आप इन कठपुतलियों में से तो नहीं! वैसे, ये बात भी सभी जानते हैं कि जूनियर तो जूनियर, जागरण में ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग भी कठपुतलियों से कुछ कम नहीं हैं.

न जाने क्यों जब एक महिला पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगती है तो पुरुषों के अंतर्मन को चोट पहुंचने लगती है. इसलिए वो उसकी राह में रोडे़ अटकाना शुरू कर देते हैं और अगर तब भी कुछ नहीं होता तो उसके कैरेक्टर पर ऊंगली उठाने लगते हैं क्योंकि केवल कैरेक्टर ही एक ऐसी चीज़ है जिसके बारे में बोलने के लिए किसी सुबूत की आवश्यकता नहीं होती है. महिलाओं को हराने के लिए दुनिया भर में एक ही हथियार इस्तेमाल किया जाता है. और वह है उसके कैरेक्टर पर उंगली उठा दो. उसे चरित्रहीन घोषित कर दो. पवन, आप जो कुछ कर रहे हैं, वह इसी मंशा के तहत किसी के द्वारा कराया जा रहा है. पर आप तो ठहरे कठपुतली, इसलिए आप अपनी जुबान नहीं बोल रहे बल्कि दूसरों के शब्दों को अपनी जुबान दे रहे हैं.

खैर, मुद्दे पर आते हैं. किसी के पहनावे के आधार पर आप ये डिसाइड नहीं कर सकते कि उसे संस्थान से बाहर निकाल देना है या नहीं. ये बेतुकी बात है और ऐसा कोई मापदंड किसी भी संस्था में नहीं है. क्या मैं कभी बिकनी में ऑफिस गयी जो आप ऐसी बेतुकी और बिना सर पैर की बात कह रहे हैं? ऑफिस में मेरे पुरुष सहकर्मी गालियां देकर आपसी बात करते थे, इन गालियों में एक दूसरे की मां-बहन पर टिप्पणियां होती थीं,  लेकिन वो गलत नहीं है. उसे लाइसेंस मिला हुआ है. एक पुरुष सड़क पर खड़े होकर सबके सामने पैंट खोलकर यूरिन कर सकता है, पर वो गलत नहीं है,  इसके लिए भी आप लोगों को पैदाइशी लाइसेंस मिला हुआ है, पर यदि एक लड़की जींस और टॉप में कॉलेज या ऑफिस जाती है तो वो गलत है. वाह भाई वाह.

पवन जी, दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है और आप अभी भी केवल जींस और टॉप पर अटके हैं, जैसे कट्टरपंथी लोग अटके हुए हैं? आप भी कहीं उन्हीं कट्टरपंथियों और पोंगापंथियों वाले समुदाय से तो ताल्लुक नहीं रखते हैं?

सुना था जागरण कट्टरपंथी हिन्दूवाद को समर्थन करता है पर अब इस सुनी सुनाई बात पर भरोसा भी होने लगा है. ये लोग शायद हिंदुत्व की आड़ में एक तालिबानी समाज बनाना चाहते हैं जहां लड़कियों के जींस पहनने पर आपत्ति हो और बुरका पहनने पर सभी की रजामंदी. यदि ऐसी बात है तो जागरण वालों को अपने मीडिया इंस्टीट्यूट में लड़कियों को ए़डमिशन देने पर भी स्पष्ट तौर पर रोक लगा देनी चाहिये. अगर ये लोग स्त्री का सम्मान नहीं कर सकते तो बेहतर है कि आप उन्हें एडमिशन भी न दें. जिस इंस्टीट्यूट की आप बात कर रहे हैं, मुझे याद है कि वहां की एक सीनियर मैडम ने केवल इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि उनके अनुसार, यहां पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को उतना सम्मान नहीं दिया जाता है.

जब मैं आपका लिखा मेल पढ़ रही थी तो मेरी माता जी ने मुझसे पूछा कि क्या जागरण वाले एक रिपोर्टर से ये अपेक्षा रखते हैं कि वो बुर्के में रिपोर्टिंग करने फील्ड में जाये? पवनजी, बुरा न मानें, पर आपके मेल को पढ़कर आप पर थोड़ी हंसी आई और थोड़ा तरस भी. आपकी जानकारी के लिए मैं बता दूं कि मैं जागरण इंस्टीट्यूट के टॉप टेन छात्रों में थी. और रही बात पहनावे की तो मुझे इंस्टीट्यूट के स्पेक्ट्रम प्रोग्राम में ‘मोस्ट फैशनेबल गर्ल’ का खिताब दिया गया था. यदि मेरे जागरण इंस्टीट्यूट को मुझसे इतनी ही शिकायत रहती तो वो लोग मुझे टोकते,  न की अवार्ड देते. ये तो रही बात जागरण की, जहां मैंने केवल कुछ ही महीने गुजारे थे.  मेरे कॉलेज, जहां पर मैंने तीन साल बिताये, वहां के एनुवल फंक्शन में मुझे मिस कनजीनिएलिटी (बेस्ट बिहैवियर) के अवार्ड से नवाजा गया था. यानि,  तीन सालों के दौरान मेरा व्यवहार सबसे अच्छा रहा था. इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आप मेरे कॉलेज (गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, सेक्टर- 39, नोएडा) की अंग्रेजी विभाग की प्रभारी डॉक्टर अनीता रानी राठौर से संपर्क कर सकते हैं.

आपकी अल्प जानकारी को बढ़ाने के लिए मैं आपको बता दूं कि मैं श्रीमती मेनका गाँधी जी की संस्था पीएफए (पीपुल फॉर एनीमल) की मेंबर हूं और लगभग दो सालों से बतौर एक्टिविस्ट भी काम कर रही हूं. अगर मेरा व्यवहार ख़राब होता तो सबसे पहले मुझे वहां से निकाला जाता, जागरण तो बहुत छोटी बात है. पवन जी, मैदान में उतरिये और किसी पर ऊंगली उठाने के पहले अपनी जानकारी बढ़ाइये. जागरण के संस्थानों के बारे में आपकी जानकारी बेहद कम है, मैंने सारे संस्थानों की नहीं, केवल चंडीगढ़ की बात की थी. वहां के माहौल से सभी परिचित हैं. मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहती पर ऊंचे ओहदे पर जो मैडम बैठी हैं, उनके क्रियाकलापों और तानाशाही से सभी परिचित हैं फिर भी कभी कोई एक्शन नहीं लिया जाता है. इसके कारणों से सभी परिचित हैं.

मैं एक समृद्ध परिवार से हूं और सफलता हासिल करने के लिए कोई शार्टकट मारने की जरूरत मुझे नहीं है. पर आप अपने अगल-बगल झांकिए, आपको दिख जाएगा कि किस तरह सफल होने के लिए लोगों ने शार्टकट मारे हैं और आप भी उसी राह पर चल पड़े हैं. अपने नंबर बढ़ाने के लिए ही आपने इस तरह की अनर्गल बातें लिख मारी हैं ताकि जागरण में आपकी नौकरी चलती रहे और आपको तरक्की मिलती रहे. रही बात चंडीगढ़ में मुझे टोकने की तो किसी ने भी पहनावे को लेकर मुझे एक बार भी नहीं टोका. हो सकता है मुझे निकालने के लिए यही बहाना गढ़ दिया गया हो.

ब्यूरो चीफ महोदया ने दो महीने में केवल एक बार अपनी शक्ल दिखाई. उस दौरान मुझसे पूछा गया कि आप कल्चरल रिपोर्टिंग कर सकती हैं या नहीं. हां, ये बात अलग है कि मुझे भगाने के लिए उन्हें कोई तो बहाना चाहिये था सो ये टुच्चा पहनावे वाला बहाना ही सही. मुझे मीनाक्षी जी ने सिर्फ इतना कहा कि मेरे पास वैकेंसी नहीं है, तुम कल आकर अपना लेटर ले जाना. मुझे अन्त तक पहनावे वाले विषय पर किसी ने कुछ नहीं कहा. आखिर में मैं कहना चाहती हूं कि अगर मेरे पहनावे को लेकर आपको और आपके दैनिक जागरण को इतनी ही आपत्ति है तो ऑफिस के बाहर एक बोर्ड लगवा दीजिए जिस पर साफ-साफ शब्दों में लिखवा दीजिए- “Girls, only in suits are allowd inside”

धन्यवाद

पायल चक्रवर्ती

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0 Comments

  1. love sharma

    August 20, 2010 at 10:28 am

    payal ji aapne es kam akal vale reporter ko acha javab diya ha. yadi esme reporter vala 1 bhe gun baki bacha hooga tau ese awasye he aapne likhe par pastawa hoga.

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