एक पत्रकार मरता है लेकिन जमाने को इसकी खबर एक साल बाद होती है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेशनल काउंसिल से लेकर उसकी मैग्जीन के संपादक मंडल तक में रहे और बाद में अमर उजाला व दैनिक जागरण जैसे अखबारों में वर्षों तक अपनी सेवाएं देने वाले वरिष्ठ पत्रकार कुंवर जी अंजुम नहीं रहे। एक साल पहले लखनऊ के एसजीपीजीआई में उनका निधन हो गया। निधन की सूचना सबको तब पता चली जब उनकी पत्नी बकाया रकम लेने एक साल बाद दैनिक जागरण, नोएडा आफिस पहुंचीं। देह त्यागने से पहले कुंवर जी अंजुम कुछ महीनों से बेरोजगार चल रहे थे और इन्हीं दिनों में लीवर सिरोसिस की वजह से उन्हें भर्ती कराना पड़ा। कुंवर जी अंजुम एक अच्छे पत्रकार के साथ बेहतरीन इंसान और उम्दा संस्कृतिकर्मी भी रहे हैं।
सीपीआई के लिए दशकों तक नेतृत्वकारी भूमिका में काम करने वाले कुंवर जी ने पार्टी से मोहभंग के बाद पत्रकारिता को ही पूरी तरह अपना लिया। अंजुम जी की भाषा, साहित्य, संस्कृति, इतिहास समेत कई विषयों पर गहरी पकड़ थी। सहज, सरल, शिष्ट, अंतर्मुखी स्वभाव के अंजुम जी ने पार्टी में सक्रियता के दिनों में कई किताबें भी लिखीं।
अंतिम नौकरी दैनिक जागरण, नोएडा में थी, जहां से उन्हें निकाल दिया गया था। इसके बाद वे डिप्रेशन में चले गए थे। बताया जाता है कि उन दिनों वे शराब ज्यादा पीने लगे थे।
देर से सूचना मिलने के बावजूद भड़ास4मीडिया की तरफ से अपने पत्रकार साथी कुंवर जी अंजुम को श्रद्धांजलि।
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किसे फरक पड़ता है किसी करुणाकर या कुंवर जी अंजुम के न होने पर











