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कितनी परीक्षाएं लेगा ईटीवी?

यूपी में 25 स्ट्रिंगरों को टेस्ट के लिए बुलाया पर आए सिर्फ आधे : ईटीवी, यूपी के स्ट्रिंगरों का भी पिछले दिनों टेस्ट लिया गया। इसी टेस्ट की हकीकत को बयान करते हुए एक स्ट्रिंगर ने भड़ास4मीडिया के पास मेल भेजा है। उन्होंने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है। उनके अनुरोध का सम्मान करते हुए स्ट्रिंगर महोदय के पत्र को तो प्रकाशित कर रहे हैं पर उनके नाम को नहीं। इस पत्र को प्रकाशित करने का मकसद मीडिया के रीढ़ कहे जाने वाले सबसे वंचित लोगों के दुख-दर्द और उनकी भड़ास को सामने लाना है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

यूपी में 25 स्ट्रिंगरों को टेस्ट के लिए बुलाया पर आए सिर्फ आधे : ईटीवी, यूपी के स्ट्रिंगरों का भी पिछले दिनों टेस्ट लिया गया। इसी टेस्ट की हकीकत को बयान करते हुए एक स्ट्रिंगर ने भड़ास4मीडिया के पास मेल भेजा है। उन्होंने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है। उनके अनुरोध का सम्मान करते हुए स्ट्रिंगर महोदय के पत्र को तो प्रकाशित कर रहे हैं पर उनके नाम को नहीं। इस पत्र को प्रकाशित करने का मकसद मीडिया के रीढ़ कहे जाने वाले सबसे वंचित लोगों के दुख-दर्द और उनकी भड़ास को सामने लाना है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

इतने कम पैसे में कोई दूसरे शहर क्यों जाए?

अभी 29 नवम्बर को ईटीवी ने लखनऊ के सीएमएस, गोमती नगर में ट्रेनी रिपोर्टर के पद पर नियुक्ति के लिए यूपी के स्ट्रिंगरों का टेस्ट करवाया. इस परीक्षा में संस्थान में 5 वर्ष तक स्ट्रिंगर के तौर पर काम कर चुके लोगों को भी बुलाया गया. लगभग 25 लोगों को एचआर की तरफ से बुलावा भेजा गया जिसमें से लगभग आधे ही पलट कर आये. बाकी ने इस परीक्षा में शामिल होना उचित नहीं समझा. इसके कई कारण हैं. स्ट्रिंगरों की नाराजगी की पहली वजह तो यही थी कि इतने साल बाद भी दुबारा परीक्षा में शामिल होना, जबकि इनमें से ज़्यादातर लोग 1995 में आरएफ़सी में हुई ऐसी ही परीक्षा से गुज़ार चुके हैं. उसमें पास होने पर भी किसी को प्रोन्नत नहीं किया गया. दूसरी वजह थी कि क्या इतने वर्ष के अनुभव के बाद भी संस्थान उन्हें प्रशिक्षु ही मानेगा? तीसरी वजह है कि इनमें से अधिकतर अपने जिले में रह कर लगभग पंद्रह हज़ार पा जाते हैं तो फिर उससे कम लेकर वो हैदराबाद या किसी अन्य शहर क्यों जाएं?

इसके अलावा भी असंतोष की कई वजह हैं. इनमें से ज़्यादातर लोग संस्थान के कॉपी एडिटर और रिपोर्टर से बेहतर काम कर रहे हैं. और तो और, जबसे एफटीपी व्यवस्था लागू की गयी है, ये लोग एडिटिंग, स्क्रिप्ट टाइपिंग से लेकर खबर अग्रसारित करने तक का भी काम कर रहे हैं. संस्थान के खर्चों में इस वजह से काफी कमी हुई है. इसमें राइडर से लेकर तकनीशियन, विडियो एडिटर और लीज़ लाइन पर होने वाला खर्च कम हो जाना शामिल है. मगर इस सबका फायदा लेने वाला संस्थान स्ट्रिंगरों को कोई लाभ नहीं दे रहा. स्ट्रिंगरों फिर भी ये सोच कर सब्र कर लिया कि कम से कम यह संस्थान अन्य चैनलों से तो बेहतर ही बर्ताव कर रहा है. मगर फिर भी शोषण तो हो ही रहा है. इस परीक्षा में सबसे ज्यादा बेइज्ज़ती की बात तो यह थी कि फ्रेशर और अनुभवी, सबके साथ एक सामान बर्ताव किया गया. वरिष्ठतम, अनुभवी एवं तकनीकी रूप से मज़बूत लोगों को भी आठ साल बाद हुई इस ज़िल्लत को झेलना पड़ा.

ये तब है जब चैनल की डेस्क गंभीर संकट से गुज़र रही है. डेस्क पर ज़्यादातर अनुभवहीन लोग हैं. इनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्हें खबर का मतलब भी सही से मालूम नहीं मगर काम जैसे-तैसे चल रहा है. खर्चों में कटौती के नाम पर अधकचरे लोग भर लिए गए जिससे समस्या और बढ़ गयी. अपने पुराने लोगों पर संस्थान यकीन नहीं कर रहा. ये पुराने लोग उस समय भी संस्थान से नहीं गए जब ज्यादा पैसे के लिए और लोग झट से गायब हो गए थे. इनमे से कुछ तो चैनल की लांचिंग से ही संस्थान के साथ हैं. ऐसा नहीं है कि इन लोगों की शैक्षणिक योग्यता शक के दायरे में है. इनमें ज्यादातर तो संस्थान के वरिष्ठतम सहयोगियों से ज्यादा पढ़े-लिखे हैं. जो परीक्षा में शामिल हो भी गए हैं, वो आधे-अधूरे मन से आये. इनमें से शायद ही कोई अपना जिला छोड़कर दूसरे शहर का रुख करना चाहेगा, कम से कम जितने पैसे पर संस्थान चाह रहा है, उतने पर तो नहीं.

कृपया नाम ना छापें तो कृपा होगी.

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