एक टीवी जर्नलिस्ट ने अपना नाम और पहचान बताए बिना एक चैनल की अंदर की कहानी भेजी है। पूरा पढ़ने के बाद लगता तो यही है कि वे अपनी निजी भड़ास निकाल कर किसी से बरसों पुरानी खुन्नस का बदला लेना चाह रहे हैं पर उनके मंसूबे पर थोड़ा-सा पानी फेरते हुए हम यहां चैनल का नाम, चैनल के वरिष्ठों का नाम और उनके पद नाम को या तो हटा दे रहे हैं या फिर बदल दे रहे हैं ताकि किसी की परसनल खुन्नस का शिकार होने से यह चैनल और इसके लोग बच सकें। पर हम उनकी बात को संपादित कर प्रकाशित करने से खुद को रोक भी नहीं पा रहे हैं। इस कहानी की बढ़िया कापी देखने से लग रहा है कि लेखक उर्फ कवि काफी कलाकार किस्म के इंसान हैं जो शब्दों की जादूगरी को अच्छी तरह समझते हैं। उनकी इस कहानी के प्रकाशन के पीछे मंशा चैनलों के अंदर की राम कहानी बाहर वालों को बताना तो है ही, साथ ही टीवी वालों से मानसिक कसरत कराना भी है ताकि वे दिमाग पर जोर डालकर पात्रों व स्थितियों का गहन विश्लेषण करके पता कर सकें कि यह किस चैनल की राम कहानी है। आप लोग अंदाजा खुद लगाइए। भड़ास4मीडिया से इस पहेली का जवाब पाने की कोशिश न ही करें तो ठीक, अगर करेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। एक बात और, अगर इस कहानी के चरित्र व स्थितियों से किसी न्यूज चैनल का संबंध तुरंत स्थापित हो जाता है तो यह सिर्फ संयोग होगा, इसका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना न मानें। कोई शख्स खुद को इस कहानी के किसी पात्र की जगह पाता है तो यह भी संयोग होगा, अनुरोध है कि दिल पर मत ले यार….!! -एडिटर, भड़ास4मीडिया
हमें अपनों ने मारा गैरों में कहां दम था…. यह शेर इस न्यूज़ चैनल के लिए पूरी तरह से फिट बैठता है। आखिर क्या वजह है कि यह न्यूज चैनल पिछले कई महीनों से एक खास टीआरपी के बीच ही झूल रहा है। आखिर कमी है कहां पर? इस चैनल के सूत्रों से पता चला है कि इसके पीछे कई वजहें हैं। एपिसोड नंबर एक में हम पहली वजह पर विस्तार से प्रकाश डालेंगे। इस चैनल में खबरों के संचालन का जिम्मा मुख्यतौर पर दो लोगों के ऊपर है। मान लीजिए, एक का पद एक्जीक्यूटिव एडिटर का है और दूसरे का सीनियर एडिटर का। तो ये दो ही तय करते हैं कि क्या दिखाया जाए और क्या नहीं? इन दोनों की केमेस्ट्री ऐसी है कि ज्यादातर लोगों को ये पता ही नहीं है कि आउटपुट हेड है कौन? लेकिन मोटे तौर पर यही मालूम होता है कि एक्जीक्यूटिव एडिटर ही चैनल के सर्वेसर्वा हैं। लेकिन आउटपुट पर काम के बंटवारे का फैसला सीनियर एडिटर ही करते हैं। तो इन्हें ही कथित हेड मान लिया जाता है।
सूत्र बताते हैं कि इन दो महान लोगों के होते हुए भी बुलेटिन राम भरोसे ही चलते हैं। ना कोई ठोस प्लानिंग, ना कोई आइडिया। बस खबरें पकड़ा दी जाती हैं और कह दिया जाता है कि बनाओ। बेचारा प्रोड्यूसर इन्हें गरियाते हुए अपना बुलेटिन बनाता है। शाम को सात बजे क्या जाएगा – ये साढ़े छह बजे तक ना तो प्रोड्यूसर को पता होता है और ना ही एंकर को। अब ऐसे में आउटपुट हेड अचानक 6.55 पर रन डाउन सेट करते दिखते हैं। ऐसे में बुलेटिन का क्या होगा आप खुद ही समझ सकते हैं। सूत्र बताते हैं कि इसमें सबसे ज्यादा दोष आउटपुट के कथित हेड का है। ये महोदय एंकर चार्ट और शिफ्ट चार्ट बनाने में इतने व्यस्त रहते हैं कि खबरों पर चर्चा के लिए उनके पास अपने सहयोगियों के लिए समय ही नहीं रहता है। लेकिन जब केबिन (एडिटर) से ऑर्डर आता है तो सबसे ज्यादा कामकाजी ये ही नज़र आते हैं। इसके बाद केबिन की खबरों के लिए बाकी खबरें गईं भाड़ में। ना कोई तर्क ना कोई बहस। बस केबिन के लिए जान लगा दो। ये जानते हुए कि केबिन की फरमाइश गलत है फिर भी ये साहब इस गलत को सही बनाने के लिए दलील पर दलील दिए जाते हैं और खबर चलवा कर ही दम लेते हैं। यही इन महाशय की यूएसपी है और इसीलिए केबिन के करीबी हैं।
केबिन का काम हो तो ये फार्म में दिखते हैं नहीं तो अपनी कुर्सी पकड़े हुए एंकर चार्ट में ही मशगूल रहते हैं। ऐसे में कोई महिला एंकर इनके आसपास हो तो इनकी बांछें खिली रहती हैं। वैसे तो आउटपुट हेड पर पूरे चैनल की जिम्मेदारी है लेकिन इनकी सोच सिर्फ शाम पांच बजे से रात नौ बजे तक ही सीमित रहती है। ये बखूबी जानते हैं कि किसे खुश करना है और किसे नहीं। इसीलिए तो ये स्टार एंकर वाले शोज के लिए खुद ही पीसीआर में पैनल प्रोड्यूसर भी बन जाते हैं। ये बात और है कि सबसे ज्यादा बैंड इन्हीं दोनों बुलेटिनों का बजा हुआ है।
इनकी एक और खासियत है -इन्होंने तंबाकू गैंग पाला हुआ है। कई प्रोड्यूसर दिनभर इनके लिए टेबल के नीचे हाथ करते हुए तंबाकू मसलते हुए दिख सकते हैं और इन सभी चेलों का दावा है कि हेड साहब तो उनकी जेब में हैं। तंबाकू की कीमत वो अपने छोटे-मोटे काम (शिफ्ट चार्ट में बदलाव और मनचाही छुट्टी पाना) लेकर वसूलते हैं। अगर काम नहीं भी लेना हो तो क्या हुआ, आउटपुट हेड को तंबाकू खिलाने में जो मजा है वो और कहां। तो ऐसे हैं इस न्यूज चैनल के आउटपुट हेड। ये बात और है कि ताकत के नाम पर इन्हें ज्यादा पैर फैलाने की इजाजत नहीं है। ना तो ये अपनी मर्जी से कोई ग्राफिक्स बदलवा सकते हैं और ना ही किसी एंकर को डपट सकते हैं और ना ही कुछ बड़े प्रोड्यूसर्स को किसी खबर में गलती के लिए डपटने की हिम्मत इनमें है। बस इनका जोर कुछ नए नवेले ट्रेनीज पर चलता है – केबिन और तमाम दवाबों की भड़ास ये बेचारे ट्रेनी पर ही निकालते हैं।
यही नहीं, बताते तो ये भी हैं कि खबरों की बैठक में ये भी नरसिम्हा राव की तरह चुप्पी साध कर बैठ जाते हैं। खबरों पर आउटपुट हेड के सामने एसाइनमेंट वालों से बेचारे प्रोड्यूसर लड़ते हैं पर ये महोदय मुस्कुराते रहते हैं। इस न्यूज चैनल में कुछ जागरूक लोगों ने एक सर्वे भी कराया – कि न्यूज रूम में पीठ पीछे लोग सबसे ज्यादा किसे कोसते हैं – इसमें भी आउटपुट हेड ने ही बाजी मारी।
सूत्र बताते हैं कि चैनल में पदानुसार तीसरे नबंर की हैसियत है इनकी लेकिन सिर्फ कागजों में। असल में वो केबिन के मैनेजर ज्यादा दिखते हैं और कर्मचारियों में केबिन का डर फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते जबकि केबिन से ज्यादा सुलझा हुआ पूरे न्यूज चैनल में कोई नहीं है…लेकिन केबिन वाले भी शायद न्यूज रूम में हेड साहब से पीड़ितों तक नहीं पहुंचे हैं वरना न्यूज चैनल की ये हालत नहीं होती। इस न्यूज चैनल की टीआरपी लंबे समय से एक खास जगह स्थिर रहने की सबसे बड़ी वजह कमजोर आउटपुट हेड का होना है। इस पर इस एपिसोड में विस्तार से बताया गया। अगले एपिसोड में इस न्यूज चैनल की दूसरी कमजोर कड़ियों के बारे में वाकिफ कराया जाएगा।











