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‘लाठरजी, पत्र को बेबस इंसान का गुस्सा मानते’

श्री लाठर साहब, मैं सोच रहा था कि जवाब न दूं। पर आपने मुझे दोस्त कहा। उन लाठर साहब ने जिन्हें मैं पूरे दिन फोन मिलाता था वे नहीं उठाते थे, मुझे मित्र कह रहे हैं। इस नाते गबन का हिसाब दे रहा हूं। आपने पूछा कि मैंने एडीवीटी में कितना गबन किया। मुझे पता होता कि आप एक दिन हिसाब मांगेंगे तो पाई-पाई का हिसाब रखता। लेकिन नहीं रखा, इसलिए मोटा-मोटा हिसाब दे रहा हूं। दरअसल उन दिनों दुनियाभर में ‘अभी अभी’ का बड़ा नाम था, टाइम्स, एचटी, जागरण, भास्कर, उजाला एक तरफ, न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट में विज्ञापन देने वाली पार्टियां मेरे पास आ रही थीं। सुबह चार बजे से कार्यालय के बाहर लाइन लग जाती थीं, लेकिन मैंने ज्यादा लालच नहीं किया, रोज कोई 50-60 लाख के विज्ञापन लेता था। हाजिरी रजिस्टर में देख लेना मैं कितने दिन वहां रहा, उस हिसाब से गबन की इस राशि को जोड़ लेना।

श्री लाठर साहब, मैं सोच रहा था कि जवाब न दूं। पर आपने मुझे दोस्त कहा। उन लाठर साहब ने जिन्हें मैं पूरे दिन फोन मिलाता था वे नहीं उठाते थे, मुझे मित्र कह रहे हैं। इस नाते गबन का हिसाब दे रहा हूं। आपने पूछा कि मैंने एडीवीटी में कितना गबन किया। मुझे पता होता कि आप एक दिन हिसाब मांगेंगे तो पाई-पाई का हिसाब रखता। लेकिन नहीं रखा, इसलिए मोटा-मोटा हिसाब दे रहा हूं। दरअसल उन दिनों दुनियाभर में ‘अभी अभी’ का बड़ा नाम था, टाइम्स, एचटी, जागरण, भास्कर, उजाला एक तरफ, न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट में विज्ञापन देने वाली पार्टियां मेरे पास आ रही थीं। सुबह चार बजे से कार्यालय के बाहर लाइन लग जाती थीं, लेकिन मैंने ज्यादा लालच नहीं किया, रोज कोई 50-60 लाख के विज्ञापन लेता था। हाजिरी रजिस्टर में देख लेना मैं कितने दिन वहां रहा, उस हिसाब से गबन की इस राशि को जोड़ लेना।

छूसरा, मैंने स्टाफ की कितनी सेलरी अपनी पाकेट में रखी। साहब, वैसे आपने सभी के सेलरी एकाउंट खुलवा रखे थे, पर आप हर महीने की सात तारीख को चुपचाप मेरे पास आते थे और पूरे स्टाफ की सेलरी दे जाते थे, जिसे मैं अपनी पाकेट में रख लेता था। बाद में पॉकेट छोटे पड़ गये तो मैंने दर्जी से बड़े-बड़े थैलों के आकार के पाकेट वाले कपड़े सिलवाये। कभी देहरादून आइएगा को देखिएगा, मैं अभी भी उन्हीं थैले के आकार के पाकेट वाले कपड़े पहनकर घूम रहा हूं।

तीसरा, जाते समय मैं ऑफिस से क्या क्या ले गया। मित्र से झूठ क्यों बोलूं, मैं सिर्फ उस तिजोरी को ले गया, जो आपने वहां छोड़ रखी थी। बहुत पक्का ताला लगवाया था आपने उसमें, बड़ी मुश्किल से तोड़ा लाठर साहब। उसमें कोई 8-10 करोड़ रूपये थे। पर क्या करूं लाठर साहब, मेरा पेट इतना बड़ा हो गया है कि इतने पर भी नहीं भरा और कुछ हजार रुपल्ली की नौकरी के लिए बीमार पत्नी और स्कूल जाने वाले बच्चों को छोड़कर यहां देहरादून में हूं।

अरे लाठर जी। कितना अच्छा होता कि उस पत्र को आप पूर्वाग्रह न मानकर एक बेबस इंसान का गुस्सा मानते। काश आपको वो हरियाणवी कहावत याद होती कि भूखा बामण और झिक्का जाट बड़े खतरनाक होते हैं। आपको याद दिला देता हूं कि भूखा बामण झिक्के जाट से ज्यादा खतरनाक होता है। उम्मीद है आप इस हिसाब से संतुष्ट होंगे।

त्रिलोचन भट्ट

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0 Comments

  1. ANIL

    April 2, 2010 at 9:53 am

    रोहतक। बुरे काम का बुरा नतीजा, क्यों भई चाचा- हां भतीजा

    एक साथ 200 मीडियाकर्मियों को ठिकाने लगाने के लिए कुलदीप श्योराण और अजयदीप लाठर को लख-लख बधाईयां।
    अरे, कुछ शर्म आए तो किसी अखबार में विज्ञापन छपवाकर सार्वजनिक माफी ही मांग लो भिखमंगो।

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