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‘राजेंद्र अवस्थी ने अपने लिए कभी नहीं जिया’

श्रद्धांजलि अर्पित की :  ‘राजेन्द्र अवस्थी के एक से बढ़कर एक रूप थे। वे ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने प्रथाओं को तोड़ते हुए विज्ञान कथाओं को भी साहित्य में समेट लिया। वे ऐसे संपादक थे जो डंके की चोट पर अपनी बातें कहते थे और दुनियाभर में अनगिनत साहित्यकार-लेखकों को स्थापित किया। वे ऐसे चिंतक थे जिन्होंने कादम्बिनी के अपने कॉलम काल चिंतन के माध्यम से कितनों के परम श्रद्धेय और आदरणीय बन गए। और इन सबसे बढ़कर, वे ऐसे इंसान थे जो हर किसी को अपना बना लेते थे।’ साहित्यकार-संपादक-चिंतक राजेन्द्र अवस्थी की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों और उन्हें जानने वालों ने उनके विभिन्न रूपों को याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की।

श्रद्धांजलि अर्पित की :  ‘राजेन्द्र अवस्थी के एक से बढ़कर एक रूप थे। वे ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने प्रथाओं को तोड़ते हुए विज्ञान कथाओं को भी साहित्य में समेट लिया। वे ऐसे संपादक थे जो डंके की चोट पर अपनी बातें कहते थे और दुनियाभर में अनगिनत साहित्यकार-लेखकों को स्थापित किया। वे ऐसे चिंतक थे जिन्होंने कादम्बिनी के अपने कॉलम काल चिंतन के माध्यम से कितनों के परम श्रद्धेय और आदरणीय बन गए। और इन सबसे बढ़कर, वे ऐसे इंसान थे जो हर किसी को अपना बना लेते थे।’ साहित्यकार-संपादक-चिंतक राजेन्द्र अवस्थी की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में साहित्यकारों, पत्रकारों, समाजसेवियों और उन्हें जानने वालों ने उनके विभिन्न रूपों को याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की।

दिल्ली के अणुव्रत भवन में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके लंगोटिया दोस्त पूर्व सरसंघ चालक के. सुदर्शन ने कहा कि अवस्थी ने अपने लिए कभी नहीं जिआ और जो लोग दूसरों के लिए जीते हैं उन्हें दुनिया कभी नहीं भूलती। वरिष्ठ पत्रकार गौरीशंकर राजहंस को श्री अवस्थी बेहद याद आते हैं क्योंकि कई सारी महत्वपूर्ण योजनाओं पर काम शुरू कर वे चले गए। ज्योतिषी अजय भाम्बी ने कहा कि वे तो कई रूपों में याद आते हैं लेकिन ज्योतिष को साहित्य से जोड़ने और लोकप्रिय बनाने के लिए भी काफी याद आएंगे।

आथर्स गिल्ड आफ इंडिया के महासचिव उपेन्द्र कुमार ने शोक प्रस्ताव में कहा कि वे उन्होंने इस संस्था को काफी महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंचाया। शीला झुनझुनवाला ने कहा कि बहु आयामी प्रतिभा के धनी अवस्थी की साहित्य के अलावा एक और बड़ी उपलब्धि थी कि वे जिससे मिलते थे, उन्हें अपना बना लेते थे। वी.एम. बाली ने उन्हें क्रांतिकारी संपादक के रूप में याद किया तो डॉ. शेरजंग गर्ग ने रेनू और शैलेश मटियानी की परंपरा का साहित्यकार बताया। गंगा प्रसाद विमल ने उन्हें अदभुत परंपरा के संपादक के रूप में याद किया तो विधायक रमाकांत गोस्वामी ने उन्हें डंके की चोट पर बात कहने वाले संपादक के रूप में स्मरण किया। कार्यक्रम का संचालन कर रही सरोजनी प्रीतम ने कहा कि वे अभूतपूर्व थे, अभूतपूर्व हैं और अभूतपूर्व रहेंगे। साभार : हिंदुस्तान

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