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पत्रकारिता पर दस किताबों का दिल्ली में लोकार्पण

लोकार्पणमाखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की दस पुस्तकों का सोमवार को राजधानी दिल्ली में एक साथ लोकार्पण किया गया। मालवीय भवन में आयोजित एक समारोह में कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कन्हैयालाल नंदन ने इन पुस्तकों का लोकार्पण किया। इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने की। समारोह में मुख्य अतिथि त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि अराजकता की भाषा का संतुलन कैसे किया जाए, यह विचारणीय प्रश्न है। पहले के पत्रकार आत्मसम्मान की भावना के साथ अपने उद्देश्य और लक्ष्यों को ध्यान में रखकर काम करते थे। पद्मश्री डॉ. कन्हैयालाल नंदन ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता से संबंधित किताबें लिखवाने में अब तक कोई संस्था आगे नहीं आई है। लेकिन विश्वविद्यालय ने इस संदर्भ में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लोकार्पणमाखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की दस पुस्तकों का सोमवार को राजधानी दिल्ली में एक साथ लोकार्पण किया गया। मालवीय भवन में आयोजित एक समारोह में कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कन्हैयालाल नंदन ने इन पुस्तकों का लोकार्पण किया। इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने की। समारोह में मुख्य अतिथि त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि अराजकता की भाषा का संतुलन कैसे किया जाए, यह विचारणीय प्रश्न है। पहले के पत्रकार आत्मसम्मान की भावना के साथ अपने उद्देश्य और लक्ष्यों को ध्यान में रखकर काम करते थे। पद्मश्री डॉ. कन्हैयालाल नंदन ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता से संबंधित किताबें लिखवाने में अब तक कोई संस्था आगे नहीं आई है। लेकिन विश्वविद्यालय ने इस संदर्भ में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने बताया कि इन लोकार्पित पुस्तकों से पत्रकारिता के इतिहास को जांचना आसान हो जाएगा। आज की पत्रकारिता इस प्रवृत्ति की मारी है कि ब्रेक के लिए विराम का प्रयोग नहीं कर सकते। पत्रकारिता में वर्तनी की दृष्टि से काफी हमले होते हैं। कौन सा शब्द किस तरह लिखा जाए इसकी अब तक मानक शब्दावली नहीं बनी थी। मानक शब्दों को उसी भाषा में लेकर चलाया जाए तो पत्रकारिता की वर्तनी को सुधारा जा सकता है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी के चंगुल से कैसे छुड़ाया जाए यह विचारणीय है। साहित्यकार कमल किशोर गोयनका ने कहा कि हिंदी की बात की जाए तो साहित्य पहले आता है, जबकि पत्रकारिता पीछे छूट जाती है। लेकिन इस परियोजना द्वारा हिंदी पत्रकारिता का विकास हो सकता है।

कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय पत्रकारिता की बहुत बड़ी भूमिका रही है। आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता को अनुवाद की पत्रकारिता बना दी गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। कार्यक्रम में प्रो. नंदकिशोर त्रिखा, राहुलदेव, शिवाजी सरकार, अवधेश कुमार, केए बद्रीनाथ, श्रीमति मंगला अनुज, अशोक टंडन सहित अन्य पत्रकार, साहित्यकार और लेखक आदि मौजूद थे। लोकापर्ण में शामिल की गई पुस्तकें थीं- महात्मा गांधी-  कमल किशोर गोयनका, बनारसी दास चतुर्वेदी- मंगला अनुज, माधवराव सप्रे- संतोष कुमार शुक्ल, माखनलाल चतुर्वेदी- शिवकुमार अवस्थी, राहुल बारपुते- विजय मनोहर तिवारी, राजेन्द्र माथुर- शिव अनुराग पटैरया, शिवपूजन सहाय- कर्मेन्दु शिशिर, हनुमान प्रसाद पोद्दार- रजनीश कुमार चतुर्वेदी और हिंदी की वर्तनी- संत समीर। इन पुस्तकों का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन ने किया है। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर द्वारा किया गया था। साभार : नईदुनिया

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