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क्या बात है रवीशजी! बहुत खूब!!

[caption id="attachment_16851" align="alignleft"]दयानंद पांडेयदयानंद पांडेय[/caption]क्या बात है रवीशजी! हालांकि हमारे ही क्या अधिसंख्य लोगों के घर आप अकसर आते ही रहते हैं। तो भी हमारी आप की वैसी मुलाकात नहीं है| पर मैं तो सच कहूं आप से अकसर मिलता ही रहता हूं। आप से आप की आवाज़ से। आप की आवाज़ जैसे बांध सी लेती है। कई बार आप को सुनते हुए लगता है कि मैं एक साथ मोहन राकेश, निर्मल वर्मा और मनोहर श्याम जोशी को पढ रहा होऊं। ऐसा आनंद देते हैं आप और आप का नैरेशन। सच कहूं तो मुझे ओम पुरी, कमाल खान और रवीश कुमार की आवाज़ बहुत भाती है। निधि कुलपति की साड़ी और उनका सहज अंदाज़ जैसे सुहाता है। पुण्य प्रसून वाजपेयी का खबरों को कथा की तरह बल्कि किसी फ़िल्म की तरह पेश करने का अंदाज़ भी मुझे भाता है। कई बार लगता है जैसे गुरुदत्त की कोई फ़िल्म देख रहा होऊं।

दयानंद पांडेयक्या बात है रवीशजी! हालांकि हमारे ही क्या अधिसंख्य लोगों के घर आप अकसर आते ही रहते हैं। तो भी हमारी आप की वैसी मुलाकात नहीं है| पर मैं तो सच कहूं आप से अकसर मिलता ही रहता हूं। आप से आप की आवाज़ से। आप की आवाज़ जैसे बांध सी लेती है। कई बार आप को सुनते हुए लगता है कि मैं एक साथ मोहन राकेश, निर्मल वर्मा और मनोहर श्याम जोशी को पढ रहा होऊं। ऐसा आनंद देते हैं आप और आप का नैरेशन। सच कहूं तो मुझे ओम पुरी, कमाल खान और रवीश कुमार की आवाज़ बहुत भाती है। निधि कुलपति की साड़ी और उनका सहज अंदाज़ जैसे सुहाता है। पुण्य प्रसून वाजपेयी का खबरों को कथा की तरह बल्कि किसी फ़िल्म की तरह पेश करने का अंदाज़ भी मुझे भाता है। कई बार लगता है जैसे गुरुदत्त की कोई फ़िल्म देख रहा होऊं।

प्रसून जी से एक बार फ़ोन पर मैंने कहा भी कि आप को फ़िल्म बनानी चाहिए। तो वह हंसने लगे। इस चीख पुकार और भूत-प्रेत, अपराध, क्रिकेट, धारावाहिकों की छाया और लाफ़्टर शो के शोर के भूचाली दौर में आप लोग ठंडी हवा के झोंके सा सुकून देते हैं। देते रहिए। नहीं अब तो आप का एनडीटीवी इंडिया भी कभी- कभी इस फिसलन का संताप देता ही है, देने ही लगा है। खासतौर पर जिस तरह एक शाम हेडली की तसवीर चीख-चीख कर सस्पेंस की चाशनी में भिगो-भिगो कर परोसी है कि बड़े-बड़े तमाशेबाज़ पानी मांग गए। बाज़ार की ऐसी मार कि बाप रे बाप जो कहीं भूत होता-हवाता हो तो वह भी डर जाए। यहां तक कि रजत शर्मा और उनका चैनल भी। आजतक वाले भी। कौवा चले हंस की चाल तो सुनता रहा हूं पर हंस भी कौआ की चाल चलने लगे यह तो हद है। ब्योरे और भी बहुतेरे हैं पर क्या फ़ायदा?

ऐसे में रवीश कुमार, कमाल खान, पुण्य प्रसून वाजपेयी और हां, निधि कुलपति की नित-नई सलीकेदार साड़ी और उनका अंदाज़ मन को राहत-सी देते हैं। गोया अपच और खट्टी डकार के बीच पुदीन हरा या हाजमोला मिल गया हो। और हां, कभी मन करे तो इस पर भी कभी कोई स्पेशल रिपोर्ट ज़रूर करने की सोचिएगा कि चैनलों में इतने साक्षर, जाहिल और मूर्ख लोग कैसे और कहां से आकर बैठ गए। पर क्या कहें, आज- कल आप भी तो स्पेशल रिपोर्ट कहां करते दिखते हैं। बाज़ार की मार है यह कि रूटीन में समा जाने की नियति?

न मन करे तो मत बताइएगा। पर ऐसे तो आपकी लोच बिला जाएगी ! फिर कैसे कोई इसी ललक के साथ बुलाएगा कि फिर आइएगा। क्योंकि यह दुनिया बडी ज़ालिम है। अरहर की दाल सौ रूपए किलो भूल चली है। गांधी को भूल गई। चैनल और कि अपना समाज भी भगत सिह को भूल अमर सिंह को याद रखने लगा। अमर सिंह की दलाली भी लगता है, अवसान पर है। तो उन्हें भी हम जल्दी ही भूल जाएंगे। वैसे भी इस कृतघ्न समाज में संबंध अब पर्फ़्यूम से भी ज़्यादा गए-गुज़रे हो चले हैं। कि महक आई और गई। लोग मां-बाप भूल जा रहे हैं तो यह तो रिपोर्टिंग के संबंध हैं। आप, आप की आवाज़, आप का नैरेशन, स्पेशल रिपोर्ट छोटे परदे से गुम हो गई, जिस दिन गुम हुई, आप भी गुम। फिर संस्मरण,डायरी और आत्मकथा के हिस्से हो जाएंगे यह सब।

मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा होगा!

इब्राहिम अल्काज़ी को जानते ही होंगे आप। उन के पढाए सिखाए बहुतेरे अभिनेताओं को पद्म पुरस्कार कब के मिल गए। ओम शिवपुरी, मनोहर सिंह, नसीरूद्दीन शाह, ओमपुरी सुरेका सीकरी, उत्तरा बवकर, नीना गुप्ता से लगायत जाने कितने नामी-बेनामी लोगों ने क्या-क्या पा लिया। पर नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के संस्थापक इब्राहिम अल्काज़ी जैसे थिएटर और पेंटिंग के श्लाका पुरूश को अब पद्म पुरस्कार मिला है। छॊडिए अपने बिहार में महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री को याद कीजिए।उन को भी अब पद्मश्री मिली तो वह बिफर गए। अपमान लगा उन को यह।

खैर छोडिए भी मैं भी कहां भूले बिसरे लोगों की याद में समा गया। अभी तो आप हैं आप की आवाज़ है, कोने- कोने से मिल रहे आमंत्रण हैं। मज़ा लीजिए। क्यों कि बच्चन जी लिख ही गए हैं कि इस पार प्रिये तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा !

हा, पर स्पेशल रिपोर्ट ले कर आइएगा ज़रूर। हम भी देखेंगे घर में अपने रजाई ओढ कर अगर बिजली आती रही तो! आमीन!

आपका

दयानंद पांडेय

लखनऊ

[email protected]

09335233424

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0 Comments

  1. PRAVEEN DUTTA

    January 31, 2010 at 8:07 am

    दयानन्दजी, प्रणाम. आप जैसे लोगो का मुखर समर्थन ही… और रवीश कुमार तैयार करेगा. मैं कुछ भी नहीं पर फिर भी …..धन्यवाद

  2. ashok priyadarshi, india news, delhi

    January 31, 2010 at 10:41 am

    Namaskar dyanandji….
    bilkul theek kah rahe hain aap, halanki main nidi kulpati ke sath hi ek nam aur jodna chahunga aur wah hai alka saxena ka……

  3. rajdrohi

    January 31, 2010 at 12:54 pm

    apni aankh se khas kism ka chasma hata ke dekhiye bahut se reporter tv mein achcha kaam karrahe hain…gana gaa ke ya shero shayri padh ke koi achcha reporter ho jata hai kya…aankh ke andhe…naam rakha hai nayansukh…kabhi theek se tv dekh karo chutiyam sulfate

  4. aryan

    January 31, 2010 at 1:01 pm

    ‘लखनऊ हमपे फिदा है, और हम फिदा-ए -लखनऊ हैं ‘

    क्या कहने हैं दया जी आपके !!

    -आर्यन

  5. rajendrakumar

    January 31, 2010 at 2:36 pm

    Baat kahin tak sahi hai magar maqsad samajh se pare hai. DNP G, patrkaarita jab DHandha ban gayi to fir patrakaron ka DHANDHEBAAJ banane me galat kya ha ? thoda yo sudhren thoda ham to mamla jyada kharab nahin hoga saheb.

  6. रचित पंकज

    January 31, 2010 at 2:45 pm

    क्य दनपा जी, आप भी कहां रवीश-फवीश के चक्कर में खर्च होने लगे ! आप जैसे लोग मूत दें तो कितने रवीश पैदा हो जाएं। ये सब फ़िल्मी लटकों-झटकों वाले खोखले लोग हैं। खा कमा रहे हैं। खाने कमाने दीजिए। आप कुछ सार्थक लिखिए, जैसा लिखते हैं। इन गगन विहारियों पर न्यौछावर होने से बचिए। आप का कबीर वाला रूप ही ठीक लगता है। लिखना ही है तो पत्रकारिता के अमर सिंह, राजीव शुक्ला, प्रमोद महाजनों पर लिख कर उनको नंगा कीजिए। ये सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। अभी उपराश्ट्रपति तक ने पेड खबरों के बारे में चिंता जताई, पर किसी अखबार या चैनल ने संपादकीय टिप्पणी या विशलेशड करने की ज़रूरत नहीं समझी। क्यो? आप इस पर लिखिए। पर आप तो निधि कुलपति की साडियों पर फ़िदा हो गए ! ए भाई आप के अपने-अपने युद्ध का संजय है न यह सब करने के लिए। उसे ही यह सब करने दीजिए। वैसे यशवंत को भी लगता है कब्ज़ का बीमारी है। कभी युद्ध होता है भडास पर कभी नहीं। पता नहीं क्या है आप दोनों की मोनोपोली। राम ही जाने १ हम तो इंतज़ार कर-कर के चट हो गए हैं और आप दोनों को लिख कर भी। अब ज़िंदगी में यही भर तो एक काम है नहीं। कि इंतज़ार ही करते रहें। कि अपने-अपने युद्ध ससुरा कब आएगा?

  7. ravish kumar

    January 31, 2010 at 2:56 pm

    दयानंद जी

    आपकी बातों को पढ़ कर हंसी आई। हम जैसे साधारण लोगों में आपने क्या क्या न देख लिया। इतना प्यार मत कीजिए। औसत किस्म के काम से ज़्यादा कुछ नहीं किया है। ज़िम्मेदारी से कह रहा हूं। यह भी सही है कि बाज़ार और फंड के दबाव में बाहर जाना बंद हो गया था लेकिन सिर्फ आठ नौ महीने के लिए। इसके पहले तक हज़ारों रुपये उड़ाकर आपके लिए स्पेशल रिपोर्ट बनाता रहा किसी ने उफ तक नहीं की तो आठ महीने की मंदी के दौरान मुझे भी उफ नहीं करना चाहिए।
    लेकिन अच्छी खबर ये है कि फिर से स्पेशल रिपोर्ट बनाना मुमकिन लग रहा है। रुटीन के काम से मुक्ति मिलने का रास्ता दिख रहा है। आपकी तरह मैं भी उत्साहित हूं।

    पर इतनी तारीफ न करें। वाकई हम इस लायक नहीं हैं। आपकी श्रद्धा सर आंखों पर लेकिन मन कहता है कि दयानंद जी कुछ ज्‍यादा उदार हो रहे हैं।

  8. manish

    January 31, 2010 at 6:08 pm

    बांग्ला में एक कहावत है – अति भक्ति चोर का लक्षण होता है … लगता है दयानंद जी, आपने रवीश कुमार की ज़्यादा ही भक्ति कर दी … कहीं कुछ हासिल करने का इरादा तो नहीं है … वैसे मैं आपके बारे में नहीं जानता … लेकिन एक बात ज़रुर कहना चाहूंगा कि टीवी न्यूज़वालों की इतनी बड़ाई का कोई औचित्य नहीं है …

  9. Pankaj

    February 1, 2010 at 8:18 am

    Bahut badhiya kikha hai aapne Dayanand ji….
    Thanku

  10. Pankaj

    February 1, 2010 at 8:18 am

    Bahut khub likha hai Dayanand ji ne…..Thanku

  11. SACHIN KUMAR

    February 1, 2010 at 8:38 am

    NAMASKAR TO ALL OF YOU,
    I AM A BIG FAN OF RAVISH KUMAR AND NDTV. I AM NOT GOING TO COMMENT ON WHAT PANDEY JI HAS WRITTEN. BUT I SHOULD SAY TO THOSE WHO ARE GIVING COMMENT…PLEASE DONOT USE SUCH ABUSIVE WORDS WHICH CAN HURT OTHER. AND IF IT COMES I WOULD REQUEST YASWANT JI TO DELETE THE COMMENT. THNX

  12. Ek Patrakar

    February 1, 2010 at 7:12 pm

    Dayanand ji…ravish ji par apki baaton ka kitna asar hoga mein nahi janta par
    mujh par ye asar hua hai ki ap likte bahut acha hai…Pyar se Pungi baja di apne. Ap jaise darshak aur bade yahi kah sakta huin…Amin.

  13. vikas kumar gupta

    October 10, 2010 at 4:28 am

    ravish ji aap ka may bahut big fan hu . may aaj tak kabi bahi kisi ko bahi email nahi kiya tha .
    aap ka reproting ka staly bahut pasand hi mujko …………..

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