शशि शेखर और उनकी टीम को बधाई : एक जनवरी के अखबार के लिए कल्पेश याज्ञनिक और उनकी टीम को देर से बधाई : ‘हिंदुस्तान’ अखबार ने आज वाकई कमाल का काम किया है. शशि शेखर की स्टाइल दिखी है. पहले पन्ने पर मुख्य खबर को देखिए. बिना पढ़े नहीं रह पाएंगे. एक लाइन से तस्वीरें हैं सोते हुए मुख्यमंत्रियों की. ये लोग देश की आंतरिक सुरक्षा पर दिल्ली में आयोजित एक अहम बैठक में शिरकत करने आए थे. इनकी आंखें बंद हो गईं. मीडिया के कैमरों ने सभी सोते हुए मुख्यमंत्रियों को पकड़ा. सोते हुए सुरक्षा की चिंता शीर्षक से प्रकाशित खबर के इंट्रो में कहा गया है- ‘देश की आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर चौतरफा चुनौतियों से दो-दो हाथ करने के लिए हमारे राजनेता कितने संजीदा हैं, इसका नजरा रविवार को विज्ञान भवन में दिखा. सुरक्षा पर बुलाई गई अहम बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जहां राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आपसी सहयोग का पाठ पढ़ा रहे थे, वहीं कई मुख्यमंत्री इससे बेखबर नींद में मस्त दिखे.’
जिन पांच सोते हुए मुख्यमंत्रियों की तस्वीर लगी है, उसका कैप्शन है- नई दिल्ली में रविवार को बैठक में ऊंघते केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन, आंध्र के के. रोसैया, राजस्थान के अशोक गहलोत, असम के तरूण गोगोई और मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान.
हालांकि कल कुछ न्यूज चैनलों पर भी सोते हुए मुख्यमंत्रियों को दिखाया गया और इससे संबंधित खबर थी लेकिन हिंदी अखबारों में आज संभवतः हिंदुस्तान ही है जिसने इस एंगल से खबर को प्रकाशित किया है. दैनिक भास्कर और नई दुनिया ने बिलकुल फ्लैट तरीके से ट्रेडीशनल हेडिंग के जरिए लीड स्टोरी पेश की है. इन दोनों अखबारों की हेडिंग पढ़ने के बाद आगे पढ़ने की इच्छा नहीं होती. पर हिंदुस्तान का जो ओवरआल प्रजेंटेशन, हेडिंग व तस्वीर है, उससे पाठक बरबस ही खबर पढ़ने को मजबूर होते हैं.
आंतरिक सुरक्षा का मसला बेहद गंभीर है. पीएम और गृहमंत्री को पता रहता है कि मुंबई में हमला होने वाला है लेकिन वे कुछ नहीं कर पाते और हमला हो जाता है. शायद, सोते हुए नेताओं के कारण ही जनता बेचारी बनी हुई है और कोई कहीं से आकर देश में उपद्रव मचा जा रहा है.
शशि शेखर व उनकी टीम को इस शानदार खबर, डिस्प्ले के लिए बधाई.
लेआउट और डिस्प्ले की अगर बात चली है तो कल्पेश याज्ञनिक का नाम लेना जरूरी है. दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याज्ञनिक जिस शानदार तैयारी, रिसर्च और अलग एंगल के साथ अखबार निकालते हैं, वह प्रभावकारी होता है. नए साल के पहले दिन दैनिक भास्कर ने बिलकुल अलग अंदाज में अखबार निकाला. अखबार वालों को दैनिक भास्कर का एक जनवरी का एडिशन जरूर देखना चाहिए. इसे देखकर लगा कि काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी गई थी नए साल के पहले दिन सबसे अलग अखबार निकालने के लिए. कल्पेश याज्ञनिक और उनकी पूरी टीम ने अच्छी मेहनत की. कह सकते हैं कि कल्पेश अपने मकसद में सफल रहे. कल्पेश याज्ञनिक नेशनल एडिटर बनकर भोपाल बैठने से पहले राजस्थान के स्टेट हेड के रूप में जयपुर से दैनिक भास्कर निकालते रहे हैं. वहां भी उन्होंने ढेर सारे प्रयोग किए. एक बार जयपुर यात्रा के दौरान मैं कल्पेश याज्ञनिक से मिला तो अखबार की फाइल मंगाकर पुराने अंक देखे. वाकई कमाल के प्रयोग उन्होंने किए.
हिंदी अखबारों में जिस तरह रिसर्च, लेआउट, वैल्यू एडिशन, प्रजेंटेशन आदि पर जोर बढ़ता जा रहा है उससे धीरे-धीरे ये अंग्रेजी अखबारों को टक्कर देने लगेंगे. कंटेंट क्वालिटी इंप्रूव करने के लिए बेहद जरूरी है कि अखबार राजधानियों व शहरों पर केंद्रित होकर न रह जाएं. वे अपने विशाल नेटवर्क का इस्तेमाल कर गांव-कस्बे से खबरें निकालें व वहां के दुख-सुख को नेताओं तक पहुंचाएं ताकि सोई हुई मशीनरी पर लगे जंग को मिटाया जा सके.
पर दिक्कत एक ही बात की है कि पैसे लेकर खबर छापने की जो परंपरा बड़े अखबारों ने शुरू की है, उसे बंद नहीं करते हैं तो सारा प्रजेंटेशन और लेआउट धरा का धरा रह जाएगा. छोटे अखबार और छोटे मीडिया ग्रुप गलत काम करते हैं तो उसे ये मानते हुए कि ये मेनस्ट्रीम के हिस्से नहीं है, एक बार इगनोर भी किया जा सकता है, माफ भी किया जा सकता है लेकिन दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, पंजाब केसरी जैसे मीडिया घरानों को पैसी की क्या कमी पड़ी है जो विज्ञापन छापकर कमाई करते-करते खबरों बेचकर कमाने पर तुल गए हैं.
वैसे, ये मुद्दा अलग है जिस पर हम लोग अक्सर बात करते रहते हैं. आज नकारात्म की बजाय सकारात्मक बात कर रहे हैं. अगर कहीं अच्छाई दिखे तो उस पर भी बात होनी चाहिए और अच्छा करने वालों की सराहना भी होनी चाहिए. अगर आप को भी लगता है कि कोई अखबार कुछ अच्छा कर रहा है तो उसे जरूर भड़ास4मीडिया के संज्ञान में ला आएं.
यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया
09999330099












deepak parsai
February 8, 2010 at 9:41 am
अब शशिशेखर और कल्पेश को कुछ नया तो करना ही पड़ेगा ना.
यदि ऐसा नहीं कर पाए तो जल्द ही नया ठौर तलाशना पद सकता है.
nitin sharma
February 8, 2010 at 11:19 am
sahi hai bahut achi story uthai hai….team ko bhadai
विनीत कुमार
February 8, 2010 at 1:19 pm
आप बेवजह तूल दे रहे हैं। यहां पूरी सुरक्षा व्यवस्था रही होगी तभी तो सो सके। नहीं तो अपने-अपने राज्यों में डर के मारे नींद कहां आती होगी?
kaalkoot
February 8, 2010 at 1:53 pm
[b]भाई यह शशि शेखर भी कमाल का आदमी है इतने संपोले इसके पीछे पडे है लेकिन भाई अपनी बीन पर
सबको नचा रहा है कुछ तो भाई मैं तन्त्र शक्ति है जो जादू चल रहा हे
लगे रहो शेखर भाई हाथी की मानिद कुत्ते (वो तो बेचारे बिला वजह शोर नहीं मचाते [b][/b]
सत्यजीत
February 8, 2010 at 3:40 pm
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का बोरिंग भाषण सुनकर कोई सोएगा नहीं तो खरहे की तरह कान किए रहेगा. जहां 99 प्रतिशत लोग हिंदी समझने वाले हैं वहां वे अंग्रेजी बोलकर अफसरशाही करते हैं. तो इसका हश्र क्या होगा. ये भाषण चेन मार्केटर के लिए बेहतर हो सकता है.
Reporter
February 9, 2010 at 4:29 am
यशवंतजी जरा आज हिन्दुस्तान का पहला पेज भी देखिये। तस्वीरों के साथ सात कॉलम में खबर छपी है- कर्म का फल : रुचिका से छेड़छाड़ के दोषी राठौर पर अदालत के बाहर चाकू से हुआ हमला।
वाह संपादक महोदय। तो क्या अब अखबार भी सड़क के इंसाफ में यकीन करने लगे हैं? क्या हिन्दुस्तान के संपादक को अदालत पर भरोसा नहीं रहा? अगर होता तो शायद राठौर पर चंडीगढ़ कोर्ट के बाहर हुए हमले को कर्म का फल नहीं कहते। सार्वजनिक रूप से ये कहने की हिम्मत तो रुचिका पक्ष के लोग भी नहीं कर पाए। रुचिका की सहेली आराधना और उनके पिता आनंद प्रकाश ने बिल्कुल सतर्क प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। यही सभ्य समाज का तकाजा भी है। इसी से ही सुचारु व्यवस्था चल सकती है। इसी रास्ते से सही इंसाफ भी मिल सकता है।
लेकिन, अगर कोई अखबार किसी हमले को कर्म का फल कहने लगे तो डर लगने लगता है। ये ठीक है कि राठौर एक अदालत से दो महीने की सजा पा चुके हैं, लेकिन अभी दूसरी अदालतों में उनका ट्रायल चल रहा है। ऐसे में उनके कर्मों का फल तय करने वाले अखबार वाले कैसे हो सकते हैं? क्या एक तरह ये उकसाने वाली कार्रवाई नहीं है? क्या इससे समाज में गलत संदेश नहीं जा रहा? कल अगर हिन्दुस्तान के संपादक पर कोई गंभीर आरोप लगाता है और फिर उन पर ऐसा ही कुछ होता है तो क्या इसे कर्मों का फल कहना उचित लगेगा उन्हें?
लेकिन, अखबारों में ऐसा अतिरेक पहली बार नहीं हुआ है। एक अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबर मुझे आज भी याद है। कटिंग मेरे पास नहीं है इसलिए नाम का उल्लेख नहीं कर रहा। खबर ये थी कि बलात्कार के एक आरोपी की बहन के साथ बलात्कार हुआ था। बलात्कार उस लड़की के भाई ने किया था, जिसके साथ आरोपी ने बलात्कार किया था। ये खबर कुछ इस तरह लिखी गई थी। ऊपर वाले की लाठी जब चलती है तो आवाज नहीं करती है। ये ऊपर वाले का इंसाफ है। ना तो रिपोर्टर ने ना ही संपादक ने इतनी संवेदना समझी कि किसी के भाई ने अगर बलात्कार किया है तो उस बहन का क्या दोष? क्या बलात्कार के बदले बलात्कार ऊपर वाले का न्याय हो सकता है?
जाहिर है ऐसे मामलों में संपादकों को थोड़ा विवेक से काम लेना चाहिए और तठस्थ होकर रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
shishir kumar das
February 9, 2010 at 6:48 am
Really, great work done by ……’HINDUSTAN’ dainik !!
tushar
February 11, 2010 at 8:08 am
defenatly hindustan dainik is a great news paper……..
vishnu
February 13, 2010 at 12:42 pm
wakai khabar bahut shandar thi. kya khabar ke bad bhi netaon ki neend khulegi eski kya guarnty hai .
surender singh
September 30, 2010 at 6:59 am
kya kran ab rajniti main interest hi nahin raha, man bhar gya hai, sone do, desh apne aap chlega
surender singh
September 30, 2010 at 7:06 am
sone do yar ache lug ruhe hain thoda aarm krenge to hi to desh ko chala payenge