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पागलों की तरह चीखने को दिल करता

[caption id="attachment_16938" align="alignleft"]नमिता शरणनमिता शरण[/caption]इस पागलपन को मत मरने दीजिए : उभरती टेनिस खिलाड़ी रुचिका को प्रताड़ित करने वाले रिटायर्ड डीजीपी राठौर पर एक युवक द्वारा वार कर जख्मी कर देने की घटना को भले ही सभ्य समाज कानून अपने हाथ में लेने की बात कहकर अच्छा न माने पर मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि इस वार ने कइयों को सुकून पहुंचाया होगा.

नमिता शरणइस पागलपन को मत मरने दीजिए : उभरती टेनिस खिलाड़ी रुचिका को प्रताड़ित करने वाले रिटायर्ड डीजीपी राठौर पर एक युवक द्वारा वार कर जख्मी कर देने की घटना को भले ही सभ्य समाज कानून अपने हाथ में लेने की बात कहकर अच्छा न माने पर मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि इस वार ने कइयों को सुकून पहुंचाया होगा.

डॉक्टर माँ और प्रोफेसर पिता ने अपने बेटे के बचाव में कहा कि उसके बेटे का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था. कइयों ने उसे पागल तक करार दिया. लेकिन मैं कहती हूं कि समाज में ऐसे पागलों की बहुत जरूरत है. वह खून ही क्या जो ऐसी गलत चीजों को देखकर ना खौले. उत्सव शर्मा को पागल कह कर, डिप्रेस्ड कह कर या इमोशनल कह कर खारिज नहीं किया जा सकता. सच तो यह है कि वह एक ऐसा पागल है जिसे अन्याय पसंद नहीं है. और न्याय मिलने में हो रही देरी ने उसे बेचैन कर दिया. सच तो यह है कि समाज को ऐसे पागलों की एक बड़ी टोली की जरूरत है.

पटना का राहुल राज आज भी लोगों के दिलों में जिन्दा है. मुंबई की बस में पिस्तौल पकड़े उसका मासूम चेहरा आज भी रह-रह कर याद आ जाता है. वह भी तो एक पागल ही था, जिसे अपने जैसे छात्रों की पिटाई बर्दाश्त नहीं हुई. उससे बड़ा पागल कौन हो सकता है, जो प्रान्त के साथ-साथ देश के भी बारे में सोचता है. दरअसल राहुल यह समझ सकने में असफल हो गया कि जब किसी में काबिलियत है तो वह कहीं भी परीक्षा क्यों नहीं दे सकता है. जब संविधान ने उन्हें ये अधिकार दिया है तो ये संकीर्ण सोच वाले नेता लोग रोकने वाले कौन होते हैं. राहुल राज ये पागलपन दिल में समेटे इस दुनिया को अलविदा कह चल गया.

पागलपन का एक और नमूना तब सामने आया जब निठारी कांड के मोनिंदर सिंह पंधेर को कोर्ट सजा सुनाने मे देर लगा रही थी. पागलों की एक बड़ी जमात ने उस पर हमला बोल दिया. अपने टीवी सेट पर जब लोगों ने पंधेर का बाल खींचते और उस पर लात जूतों का बौछार होते हुआ देखा तो उन्हें काफी सुकून मिला. चिल्ला कर बात ना करना, गुस्सा पे काबू पाना- ये कुछ पैमाने हैं सभ्य समाज के. पर कई बार ये सभ्यता इतनी घुटन भरी हो जाती है कि पागलों की तरह चीखना दिल को तसल्ली दे जाता है. इस पागलपन को मत मरने दीजिये, अभी इसकी बहुत जरूरत है.

लेखिका नमिता शरण वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों गोवा के चैनल ‘एचसीएन’ की हेड के रूप में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09850466965 के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. Abhishek sharma

    February 15, 2010 at 11:39 am

    namita jee aapko padha kafee achchha laga, but ek baat yeh bhi hai ki kya aisa kanoon sammat hai.kehne ka matlab yeh ki kya kanoon haath me lena jayaj hai?kehte hai krodh me insaan ki ankhen band ho jati hai. lihaja ye jayaj nahi lagta… is mudde par aam rai banana jaruri hai.jaruri yeh hona chahiye ki apradhi ko apradh ka ahsas dilana chahiye………………….

  2. sonia

    February 15, 2010 at 12:30 pm

    is pagalpan ko mat marne dijeye…aapne thek kaha.shayad aapne suna hoga…nagpur mai ek badmash ki istheneye logo ne court parisar mai he itna dhuna ke usne dum tod diya…kae bar aanyay ke khilaf chup rehne se ease logo ke hosle aur buland ho jate hai. kehte hai kanun ko aapne hath mai nahi lene chahiye lekin jab aanyay had se jyada bad jaye to ekjutta ke sath logo ko aage aana hoga tabhi hamari nyay pranali ke aagua aur sarkar chetege. ye kanun ke he udarta hai ki desdrohi pakde jane ke bad bhi phansi par nahi chade ja sake, isi ka he parinam hai ke aaj ruk-ruk kar aatankwad aur ugrawad hamere bharat desh ki jadein kamjor kar rahe hai…

  3. sonia

    February 15, 2010 at 1:10 pm

    is pagalpan ko mat marne dijeye…aapne sahi kaha.kanun to apna kam kar he raha hai iska jeta-jagta udaharan vo log hai jo phansi ki saja milne ke bad bhi jail mai sarkari mehman bane hue hai.yahi wajah hai ke aatankwadiyoin aur ugrawadiyoin ke houslein buland ho gaye hai.ajadi ke pehle ki isthiti par najar dalein to payeinge ke chahe bhagat singh ho ya sukhdev, inhone apne prano ke pahwah na karte hue bharat ke ajadi mai apna yogdan diya, unka tarika krantikari tha aur mahatma ghandi ka thek uske ulat lekin aaj bhi yadi dino ki karyapranali ki samiksha ki jaye to ek paksha ko galat hi thahraya jayega…isleye kya galat hai kya sahi ka postmartum karne ke bajaye pehle har insan ko apne jimmedariyain samajhne hoge…aapne sach kaha aaj samaj ko ease pagloin ke toli ke jarurat hai, sambhaw hai ea aam aadmi ke bus ki bat na ho, lekin jab tak aansu aur dard hai hamara kam khatum nahi hona chahiye…yahi bat mahiloin ko bhi samajhne ki jarurat hai…media ho ya koe aanya chetra agar aachae hai to burae bhe, lekin hame apne vevek se tey karna hai ki kis rah ko chune.ghar ke dehleej lagh diya to kease abla, khud he galat rah chune, cheroin ke jangal mai apna astitva mita do phir ghirte dekh kud he aarop laga do ki mere sath galat ho gaya aur jease tum nirdosh,,,aaj mahilayoin mai bhe isi tarah ke pagalpan ke jarurat hai…

  4. suman

    February 15, 2010 at 2:14 pm

    namita jee , aapne aachha kaha…. Pagalpan jaroori hai…IS DESH MAIN STONE AGE KE TALIBAN SE LADNE KE LIYE( JO BANDOOKON KI JAGAH PATTAR AUR DANDON KA TODFOD KKE LIYE ISTEMAL KARTE HAIN ) IS SYSTEM KO DURUST KARNE KE LIYE…..

  5. raj

    February 15, 2010 at 2:55 pm

    नमिता जी आपने बहुत सही और दिल को सुकुन देने वाली बात लिखी है। राहुल और उत्सव दोनो युवा है..वो हमारे देश के नेताओं की तरह कब्र में लटकी लाशें नहीं जो देश के हर कोने में धमाके और गुंडागर्दी की हद पर उतर चुकी पार्टियों की बदमाशियों पर भी उनका खून नहीं खौलता। उत्सव ने जो किया वो भले ही उस सभ्य समाज के लिए अपराध हो जो एसी के घरो और आलीशान गाड़ियों में घूमते है…लेकिन आम आदमी ने उत्सव को गाली नहीं दी होगी। बल्कि राठौड़ जैसे वहशी को चाकू गाल पर नहीं सीने में मारना चाहिए था। आप ही बताइये एक परिवार की इज्जत ( लड़की) के साथ छेड़छाड़ करके उसके परिवार का जीना मुश्किल कर दे….वो कानून का रखवाला कैसे होसकता है। और अब भी देखिए उस भेड़िए को हर बार जमानत मिलती जा रही है
    सरकार झक मार रही है। पुलिस वाले अपनी ही जमात के भेड़िए को बचाने मे लगे है।

  6. satish chauhan

    February 16, 2010 at 6:14 am

    namita ji aapki baat se main sahmnt hu aise nojavano ki desh ko jarurat hain,kuch virodh karne ka nazriya alag hin lekin jab akrosh had se gujar jaye to aankhir kya kiya jaye…..

  7. praween kumar

    February 16, 2010 at 12:38 pm

    नमिता जी आपने बहुत सही और दिल को सुकुन देने वाली बात लिखी है। राहुल और उत्सव दोनो युवा है..वो हमारे देश के नेताओं की तरह कब्र में लटकी लाशें नहीं जो देश के हर कोने में धमाके और गुंडागर्दी की हद पर उतर चुकी पार्टियों की बदमाशियों पर भी उनका खून नहीं खौलता। उत्सव ने जो किया वो भले ही उस सभ्य समाज के लिए अपराध हो जो एसी के घरो और आलीशान गाड़ियों में घूमते है…लेकिन आम आदमी ने उत्सव को गाली नहीं दी होगी। बल्कि राठौड़ जैसे वहशी को चाकू गाल पर नहीं सीने में मारना चाहिए था। आप ही बताइये एक परिवार की इज्जत ( लड़की) के साथ छेड़छाड़ करके उसके परिवार का जीना मुश्किल कर दे….वो कानून का रखवाला कैसे होसकता है। और अब भी देखिए उस भेड़िए को हर बार जमानत मिलती जा रही है
    सरकार झक मार रही है। पुलिस वाले अपनी ही जमात के भेड़िए को बचाने मे लगे है।

  8. geetashree

    February 16, 2010 at 4:28 pm

    नमिता जी, मैं कुछ हद तक आपके विचारो से सहमत हूं। सकारात्मक बदलाव के लिए बेहद जरुरी है इस किस्म का पागलपन। कुछ लोग आपसे असहमत हो सकते हैं.वे कानून की दुहाई देंगे। लेकिन वे लोग ही तब खूब तालियां बजाते हैं जब बड़े परदे पर नायक कानून को हाथ में लेकर खलनायक को बजा देता है। रंग दे वसंती की याद है ना। तब तो वहां युवा पीढी की पूरी फौज कौम का उद्दारक लग रही थी। तारनहार…अन्यायियो से निजात दिलाने वाली…दर्शक ताली बजा बजा बजा कर निहाल।
    फिल्मों के नायक जब खलनायक को कूट रहे होते हैं उस वक्त उस वक्त हमारे हाथ भी गतिमान हैं..ये मारा वो मारा…। वहीं नायक जब जीवन में आता है तब सुधारवादियों को कानून की याद आने लगती है। आखिर भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने का क्या तरीका हो। हिंदी फिल्मों महानायक का उदय ही तब हुआ जब वह कानून को हाथ में लेकर व्यवस्था से टकराता हैं, उसे बदलने की जंग अकेले लड़ता है। राहुल और उत्सव तो कपटी व्यवस्था के प्रति गुस्से का प्रतीक हैं…एसे घिनौवने मामले में भी युवाओं का खून ना खौले तो क्या कहिए….जो आंख से ना टपके वो लहू क्या हैं…

  9. alok nandan

    February 16, 2010 at 6:51 pm

    सच तो यह है कि समाज को ऐसे पागलों की एक बड़ी टोली की जरूरत है.
    आप सौ प्रतिशत सच कह रही हैं…..वाकई में पागलों की एक बड़ी टोली की जरूरत है….लेकिन इस सच को शायद इस तरह से बोला जाना ठीक नहीं है….खु्द को दाव पर लगाने की जिद भोथराई हुई सिस्टम को भले ही बेदम करे….टोली के लोगों को भी अंधकार के गर्त में ढकेल देगी…
    सादर आलोक नंदन

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