छापामारी के बीच में ही टीम के अगुवा अफसर उज्जवल चौधरी का तबादला कर दिया गया क्योंकि उनकी टीम के हाथ लगे दस्तावेजों में उन हरामी नेताओं-अफसरों के नाम मिले जो केंद्रीय सरकार में सुशोभित हैं : मधु कोड़ा मामले में दो दौर में करीब डेढ़ सौ जगहों पर छापामारी अभियान का नेतृत्व करने वाले उज्जवल के तबादले को तूल देकर नेशनल मुद्दा क्यों नहीं बना रही है नेशनल मीडिया? : राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबार और न्यूज चैनल चुप हैं. इनके बड़े-बड़े स्वनामधन्य संपादक खामोश हैं. इनके लिए यह मुद्दा शायद टीआरपी बटोरू नहीं है, तभी तो ये नोटिस नहीं ले रहे. संभव है, इनमें बूता न हो इस स्टोरी पर काम करने-कराने का क्योंकि इनके मालिक लोग कांग्रेस की केंद्रीय सरकार के तलवे चाटकर पैसे व अन्य लाभ जमकर लेते रहते हैं, सो, वे मालिक से अलग कैसे जा सकते हैं. आजकल के ये लाखों रुपये पाने वाले बाजारू संपादक अपने मालिकों की भला अनदेखी भी कैसे कर सकते हैं क्योंकि मालिक लोग इसीलिए तो इन्हें लाखों रुपये हर महीने देते हैं कि जो हमको हो नापसंद, वो तुम ना बात करोगे, वो तुम ना काम करोगे.
खाली समय में मालिक के ये चंपू संपादक अच्छे-खासे गुर्राते-टर्राते कुत्ते की माफिक इधर-उधर टहलते हुए दिख जाते हैं. देश-दुनिया के ढेर सारे मुद्दों पर भाषण पेलते मिल जाते हैं. पर ऐसे नाजुक मौकों पर जब मालिक की कंपनी और केंद्रीय सरकार का हित इकट्ठे सधने वाले हों या हित को प्रभावित करने वाली कोई खबर आती दिखती है तो ये संपादक किसी संन्यासी की तरह शून्य में निहारते हुए गंभीर से गंभीर मुद्दों को गोल कर जाते हैं और उटपटांग टाइप की खबरों पर खेलते हुए खुद के पौरुष का बखान करते रहते हैं.
आइए, बताते हैं कि वो खबर क्या है, जिसे मीडिया ने मुद्दा नहीं बनाया और न मीडिया के लोग मुद्दा बनाएंगे क्योंकि इससे केंद्रीय सरकार और कांग्रेस के कई लोग नंगे हो सकते हैं और नंगई के मीडिया द्वारा उघाड़े जाने से देश की जनता इन कांग्रेसियों को जूतों से पीटती. जाहिर है, अक्षम्य अनैतिकता के कारण पैदा होने वाले जनाक्रोश, जनदबाव के चलते केंद्रीय सरकार तक जा सकती है. पर यह सब तभी हो सकता है जब मीडिया के शूरवीर सत्ता के खिलाफ इनवेस्टीगेट करते, स्टिंग करते, खोजी पत्रकारिता करते और साहस के साथ प्रकाशित करते, दिखाते. पर आजकल की पत्रकारिता के धुरंधर सत्ता के दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते दांत चियारते हुए टें बोलने लगते हैं और पूंछ हिलाते हुए सत्ता की चौखट पर पड़ी हुई धूल को आचमन करने लगते हैं, आंखें बंद किए, परम तृप्ति के साथ, जैसे यही मंजिल हो और मंजिल मिल गई हो. संपादक और उनके मालिक लोग केंद्रीय मंत्रियों संग मीटिंग कर लें, डील-डाल कर लें, कंपनी का ब्लैक में या ह्वाइट में, जैसे भी हो रहा हो, भला करा लें, यही इनके जीवन का अंतिम लक्ष्य है. ऐसे हीन व घटिया मानसिकता वाले संपादकों व मीडिया मालिकों के दौर में सत्ता संरक्षित अत्याचार, भ्रष्टाचार और अनैतिकता को रोक पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है क्योंकि इन गलत चीजों से जो पर्दा उठाता, वही पर्दा न उठाने के एवज में तुच्छ लाभ लेकर चुप बैठ गया है.
आइए. आपको उस खबर से परिचित कराते हैं जिसे नेशनल मीडिया वाले पूरी तरह पी गए हैं. मामला है रांची का लेकिन दर्द दिल्ली के पेट में उठा है. मधु कोड़ा मामले में दूसरे दौर की छापेमारी का काम दो दिनों पूर्व शुरू होते ही जब कई बड़ी मछलियां फंदे में फंसने लगीं, इनके खुलासे का समय आने लगा, दिल्ली के कई हरामियों के हरामीपने का सुबूत अफसरों के हाथ में लगने लगा तो अचानक भ्रष्टाचार से लड़ने वाली आयकर विभाग की सेना के जांबाज सेनापति को ही वापस छावनी में जाने को कह दिया गया है. कोड़ा-बिनोद मामले में पहले दौर फिर अब दूसरे दौर में छापामारी का नेतृत्व करने वाले आयकर निदेशक (अनुसंधान) उज्जवल चौधरी का तबादला करने का आदेश केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने जारी कर दिया है.
उज्जवल चौधरी उन अधिकारियों में शुमार किए जाते हैं जो बेहद ईमानदार हैं और वे किसी भी तरह के दबाव के आगे नहीं झुकते, भले ही कोई उनका कितना भी बिगाड़ ले. वे पुराने टाइप के उन ईमानदार अफसरों में से हैं जो मीडिया से आमतौर पर नहीं मिलते. ज्यादा नहीं बोलते. रीढ़ हमेशा सीधी रखते हैं. काम को चुपचाप कर गुजरने में यकीन रखते हैं. जो गलत है, उसे अपनी फाइल में हर हाल में गलत ही लिखते हैं. इस उज्जवल चौधरी का तबादला आदेश उस समय जारी किया गया है, जब श्री चौधरी इसी प्रकरण के दूसरे चरण की छापामारी का नेतृत्व कर रहे थे.
आयकर विभाग के इतिहास में पहली बार इस तरह से तबादला किया गया है. छापामारी के दौरान इससे पहले अब तक किसी भी अधिकारी का तबादला नहीं किया गया. श्री चौधरी का तबादला आदेश उस समय जारी किया गया, जब वह चाईबासा में छापामारी का नेतृत्व कर रहे थे. वह सिर्फ सात माह ही इस पद पर रहे. नियमानुसार ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थापित अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल तीन साल होता है. उज्जवल के हटाए जाने के तुरंत बाद दुर्गा उरांव की ओर से हाईकोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर कर कहा गया है कि श्री चौधरी को इस समय हटाना गलत है, इनके निर्देशन में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और उनके करीबियों के यहां अब तक का सबसे बड़ा सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है. सर्च ऑपरेशन जारी है. अनुसंधान को प्रभावित करने के उद्देश्य से श्री चौधरी का तबादला किया गया है.
इस मामले में कई लोगों का आरोप है कि मधु कोड़ा और सहयोगियों द्वारा अर्जित अवैध संपत्ति के संबंध में छापामारी से जब देश के सबसे बड़े घोटाले की परतें खुलने लगीं, तो उज्जवल चौधरी का आनन-फानन में केंद्र सरकार ने तबादला कर दिया. सूत्रों का दावे के साथ कहना है कि पिछले तीन दिनों से देश भर में हुई छापामारी के दौरान ऐसे सबूत मिले हैं, जिनसे प्रमाणित हो सकता है कि झारखंड लूट में केंद्रीय नेताओं के साथ-साथ बड़े-बड़े उद्योगपति भी शामिल हैं. कायदे से, जब तक उज्जवल चौधरी के नेतृत्व से चलाये गये अभियान में अनुसंधान नहीं हो जाता है, तब तक उनका तबादला नहीं किया जाना चाहिए.
पर कहानी बस यहीं खत्म नहीं हो जाती है. दरअसल दूसरे दौर की छापेमारी के दौरान दिल्ली और पुणे में दो ऐसे व्यक्ति आयकर विभाग की पकड़ में आए हैं जिनके यहां से मिले दस्तावेजों में कई केंद्रीय मंत्रियों और नेताओं के नाम हैं. इन लोगों ने हवाला और स्विस बैंक के जरिए अरबों रुपये इधर-उधर किए हैं. आयकर विभाग को लगने लगा है कि मधु कोड़ा तो बहुत छोटी मछली है, जिसे अब तक बड़ी मछली माना जा रहा था. असली मछलियां तो दिल्ली में रहते हुए देश व प्रदेशों की राजनीति कर रही हैं और इनका दखल इतना है कि पीएम तक के यहां तुरंत इनकी सिफारिश में कहीं से फोन पहुंच जाता है और पीएमओ को तुरंत हरकत में आना पड़ता है.
-यशवंत
कुछ ही देर में पढ़िए…. आयकर विभाग की छापामारी से पता चला- भ्रष्ट नेताओं-अफसरों का स्विस बैंक में खाता खुलवाता है दिल्ली का अशोक चितकारा!












एक दर्शक
February 20, 2010 at 10:12 am
इस खबर को सहारा के सभी न्यूज चैनलों ने प्रमुखता से उठाया. करीब 10 मिनट तक इसी मुद्दे पर न्यूज डायरेक्टर उपेंद्र राय का फोनो चला. रात 9.15 से लेकर 9.25 तक. डायरेक्टर इनवेस्टीगेशन उज्जवल चौधरी को कमिंश्नर सेंट्रल बना दिया गया है और कमिश्नर सेंट्रल अजय कुमार को डायरेक्टर इनवेस्टीगेशन बनाया गया है. तबादला आदेश में उज्जवल को जांच से संबद्ध रहने को कहा गया है. मतलब है कि अजय कुमार तो जांच देखेंगे ही, उज्जवल भी उसमें शामिल होंगे. पर सेनापति बीच युद्ध में बदल देने पर शक तो होता ही है. उज्जवल भले ही जांच से जुड़े रहेंगे लेकिन संवेदनशील फाइलों पर तो सबसे पहले अब अजय कुमार का हक होगा. वे सत्ता के इशारे पर थोड़ा बहुत तो हेरफेर कर ही सकते हैं ताकि केंद्रीय सरकार के चेहरे पर दाग लगने की आशंका को पहले ही धोया-पोंछा जा सके.
santosh kumar jha
February 20, 2010 at 10:16 am
Yahi naseeb ban chuka hai bhartiya media ka. Koi awaaz uthane wala nahin hai.
raj lucknow
February 20, 2010 at 10:17 am
Yashwant…tumse bada chutiyam sulphait maine dekha nahi…kaisi kasi bhasha likhte ho tum apne article mein…pehle seekh lo yaar…fir article likha karo….warna congress walon ko jooton se pitwane ka comments likhne se pehle kahin yahi sab tumhare sath bhi hua to kya karoge…?
yashwant singh
February 20, 2010 at 10:31 am
राज लखनऊ भाई…. जूते खाने में लगता है आप डरते हैं… मैं नहीं डरता… कई बार खाया भी है… बचपन में पिता मारते थे… आजकल आप जैसे अनामी रोज ही जूते मारते रहते हैं… इतनी खा ली है कि आदत पड़ गई है… वैसे, गांधी ने भी जूते खाए थे… अंग्रेजों ने उन्हें ट्रेन से फिंकवा दिया था… कई बार जूतियाये लतियाये व लठियाये गए थे…. हम लोगों ने भी छात्र राजनीति में लात जूते व लाठी खाने का साथ साथ कई बार जेल यात्राएं की हैं…
रही खराब भाषा की बात तो गुरु, जब दिल से गरियाने का मन कर रहा हो तो वैसे में आपको प्रेम पत्र कैसे लिख सकता हूं… भाषा वही है जो आपके मन के भाव को अभिव्यक्त करे.. ये कोई लाला का अखबार तो नहीं जहां थपोरी छाप भाषा चले. यह एक प्रयोगात्मक पोर्टल है जहां कई तरह के प्रयोग चलते रहते हैं, एक यह भी सही.
दूसरे, अब मैं किसी के कमेंट का जवाब तो नहीं दे पाता क्योंकि टाइम नहीं होता, साथ ही अपने खिलाफ आए कमेंट को रोकता भी नहीं क्योंकि अगर इस पोर्टल पर दूसरों के खिलाफ आने वाले कमेंट्स को पब्लिश करता हूं तो मेरे को पड़ने वाली गालियां भी पब्लिश होनी चाहिए. ये न्यू मीडिया, वेब मीडिया की स्ट्रेंथ है जो ट्रेडीशनल मीडिया में नहीं है… यहां संपादक को गाली खाने के लिए तैयार रहना पड़ता है, इसलिए मैं आपके जूते भी अब खाने को तैयार हूं, कहिए,, कहा मिलूं…. 🙂
यशवंत
09999330099
Hanuman Mishrra
February 20, 2010 at 11:51 am
यशवंत जी अच्छा लगा सच्चाई की चिंगारी को आपने हवा दी, असली मजा तब आएगा जब ये चिंगारी शोला बन जाए और इसकी आंच से गोरखधंधे और काले कारनामो को अंजाम देने वालों के मुंह पर कालिख पुते, परन्तु……भाषा तो वाकई कडवाहट से लबालब है boss, आज तो नहीं लेकिन जब भी आपका आक्रोश ठंडा हो, आप इस आलेख को पुनः पढ़े, आप स्वयं अनुभव करेंगे कि, हमेशा से कड़वी सच्चाई यहाँ कुछ ज्यादा ही कड़वी हो गयी है, खैर सच्चाई बोलने के लिए बधाई व धन्यबाद. एक बात और कहना चाहूँगा, ऐसा लगा जैसे एक टिप्पणी विशेष ने आपको थोडा विचलित किया है या यूँ कहें कि उस टिप्पणी विशेष से शायद आप कुछ आहत से हुए है, उसके लिए एम् जी हशमत के ये चंद शब्द फायदेमंद रहेंगे,
“जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे,
हो कितनी भी लम्बी रात, दिया बन जलते जाना रे………………
उदय शंकर खवाड़े
February 20, 2010 at 1:13 pm
प्रिय मित्र यशवंत जी..मैंने पहले ही आपको कहा था की बिना पहचान के कोई भी कमेन्ट मत पब्लिश करें..ये गलत परंपरा की शुरुवात कर रहे है आप, राज कुमार, दिनेश कुमार, मुकेश कुमार, हरी कुमार, श्वेता कुमारी, रीना कुमारी, पूजा कुमारी ना जाने कितने ऐसे खुले नाम पड़े है ..जिसकी ना कोई जाति है, ना कोई पहचान …ये तो सिर्फ घटिया मजाक है..कृपा करके कमेन्ट लिखने वाले को कहें की वो अपना मोबाइल नंबर जरुर डाले…अगर वो पब्लिश नहीं करवाना चाहते है तो ये भी लिखे की मेरा मोबाइल नंबर सिर्फ आपकी जानकारी के लिए है..पब्लिश नहीं कीजियेगा..बस…फिर देखिये..पत्रकारिता के छोटे चूतिये फिर ऐसा काम नहीं करेंगे…और जो बड़ा है वो चूतिया हो ही नहीं सकता..हा हा हा
krishna murari
February 20, 2010 at 2:47 pm
ye gahri sajish hai pata nhi congress se achchha mujhe dakshinpanth hi lagta hai
aajadi ke sathh saal se jyaada ho gya. kamobesh congress ne hi sarkar chalayi hai. lekin inka garibi hatao ke alawa koi naraa aaj tak nhi aaya hai. ye naara phaltu ka hai. garibo ke naam par kendra ka 100 se jyada programme chalta hai. ye sare programme isliye chalte hai ki sab mil bant ke kha sake.inke sare kam itne ghise pite hai ki mujhe aaschary hota hai.ek udaharan dekh lijiye congress sarkar aate hi Nirupama rao, Shyam saran, montek singh aadi wafadar aa jate hai bachpan se inka naam sunta aaya hun. jab aadmi ghise pite hai to programme to hoga hi. kisi raajya me inka vikaas mudda nhi hai.kabhi aapne suna hai hai ki congress ke shasankal me media ne koi sting kar liya. tahlka, duryodhan,sansado ka ghus kand sabhi bjp raaj me kyo aaya. kya congressi dudh ke dhule hai.lalu ko congress ne isi tarah phasaya tha ab koda ki baari hai.bjp wale to murkh hai aaj tak ram mandir pakde hue hai ye nhi jaante ki bharat ka yuvaa kya chahta hai.media manage karna aur sarkar chalana bjp ko nhi paata.bjp ki kai raajya sarkare hai. lekin bjp wale nhi jaante ki rastriya level par votoro ka mijaj badal jaata hai. ya ye jaante bhi honge to khamosh hai. kyoki mujhe lagta hai ki rastriya staar par dono ki milibhagat hai.
madhav chandra chandel
February 20, 2010 at 4:43 pm
yashwant je …be baak lage rahiye…satyamev jayate
अगर सचाई का परचम उराना हीं बग़ावत है,
तो समझो मैं भी बागी हूँ,
मेरा मजहब हीं बगावत है …..
jai ho
madhav chandra chandel
dugdugi.prasad
February 20, 2010 at 9:20 pm
sri udai shankar khaware ji ki baaton par dhayan dijiye,
vikas
February 23, 2010 at 4:51 am
wefgerlgt;rhltr’jky