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पर्स छीनकर भागते दो पत्रकार दबोचे गए

पकड़े गए दोनों लुटेरेमेरठ : पत्रकारिता के पेशे से जुड़कर समाज को राह दिखाने चले मेरठ के दो युवक मंजिल से भटक गए और लुटेरे बन बैठे। मंगलवार को उन्होंने जैसे ही एक युवती का पर्स लूटा, लोगों ने घेरकर दबोच लिया और पिटाई करते हुए पुलिस के हवाले कर दिया। इनमें एक एनएएस कालेज का छात्र भी है। पुलिस का दावा है कि दोनों कई घटनाओं में शामिल रहे हैं। देर रात तक उनसे पूछताछ होती रही। पकड़े गए पत्रकार हैं मोहित गुप्ता पुत्र उमेश कुमार गुप्ता और रिंकू शर्मा पुत्र सुशील शर्मा। दोनों ही ब्रहमपुरी के रहने वाले हैं और ”दैनिक अपराध क्यों” के रिपोर्टर हैं।

पकड़े गए दोनों लुटेरेमेरठ : पत्रकारिता के पेशे से जुड़कर समाज को राह दिखाने चले मेरठ के दो युवक मंजिल से भटक गए और लुटेरे बन बैठे। मंगलवार को उन्होंने जैसे ही एक युवती का पर्स लूटा, लोगों ने घेरकर दबोच लिया और पिटाई करते हुए पुलिस के हवाले कर दिया। इनमें एक एनएएस कालेज का छात्र भी है। पुलिस का दावा है कि दोनों कई घटनाओं में शामिल रहे हैं। देर रात तक उनसे पूछताछ होती रही। पकड़े गए पत्रकार हैं मोहित गुप्ता पुत्र उमेश कुमार गुप्ता और रिंकू शर्मा पुत्र सुशील शर्मा। दोनों ही ब्रहमपुरी के रहने वाले हैं और ”दैनिक अपराध क्यों” के रिपोर्टर हैं।

एसपी सिटी प्रबल प्रताप सिंह ने बताया कि शाम को राजेंद्र नगर की युवती अंजू गुप्ता पुत्री देवीशरण गुप्ता अपनी एक्टिवा पर सवार होकर घर लौट रही थी। जब वह शांता स्मारक कालेज के पास पहुंची तभी पीछे से तेजी से बजाज केलिवर मोटर साइकिल संख्या यूपी 15 एएन 1388 पर सवार होकर आए दो युवकों ने पर्स छीन लिया और भाग लिये। अंजू ने उनका शोर मचाते हुए पीछा भी किया पर वे दूर निकल गए। इसी बीच लोगों ने सौ नम्बर पर फोन कर दिया। तत्काल पुलिस आ गई और घेराबंदी होने लगी। नंदन सिनेमा के समीप दोनों युवकों को दबोच लिया गया और पिटाई कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। एसपी सिटी ने बताया कि दोनों के कब्जे से पर्स में रखा मोबाइल फोन, 12 सौ रुपये, कागजात और अन्य सामान बरामद हो गया और अंजू ने इन्हें पहचान भी लिया। बाइक रिंकू चला रहा था और पीछे मोहित बैठा था।

बकौल एसपी सिटी, रिंकू ने उन्हें बताया कि वह दो हजार रुपये देकर ”अपराध क्यों का” रिपोर्टर बना था। साथ ही एनएएस कालेज से बीकाम प्रथम वर्ष भी कर रहा है। फीस के पैसे जमा करने के चलते ही उसने घटना की। उनके पास से नेहा शर्मा नाम का पैन कार्ड भी मिला। एसपी सिटी का दावा है कि दोनों और भी घटनाओं में शामिल हो सकते हैं। उनसे पूछताछ की जा रही है। साभार : दैनिक जागरण

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0 Comments

  1. Sudhir Tiwari

    March 3, 2010 at 6:29 am

    En jayse patrakaro aur 2000 Rs de kar farji patrakar bana ne vale maliko ko media se bahar nikal dena chahiye, kuch es tarha ke farjivada desh ke har sahar me chal raha hai,ese rok na hoga. varna patrakarita ka naam kharab ho jaye ga.

  2. CHANDAN GOSWAMI

    March 3, 2010 at 11:42 am

    yeshwantji aise logo ko kya aap patrkar mante hei, yeh to samajik gunde hei. aise gundoo ko to patrkar likhna hi gunaah hei, patrikarita apne aap bhe vishwas hei jise logo ka jivan hi badal jata hei,

  3. ajayrawat

    March 4, 2010 at 1:59 am

    hmare gwalior me aisa sare aam ho rha he. police khufiya janch kare to aese kai mamale ujager honge

  4. Narender Vats

    March 4, 2010 at 12:29 am

    यहां तो रेहड़ीवालों तक को नहीं बख्शते भाई….
    यशवंत भाई सहाब मेरठ में पत्रकारिता की आड़ में वेश्याओं तक को ब्लैकमेल करने की घटना ज्यादा चौंकाने वाली नहीं है। वेश्याओं के पास एक तरह से हराम की कमाई आती है। हमारे यहां तो ऐसे लुटेरों की लंबी फहरिस्त है, जो पत्रकारिता की आड़ में दिन भर महेनत से कमाने वाले रेहड़ी वालों तक को भी नहीं बख्शते। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की फर्जी आईडी हाथ में लेकर घूमने वाले ऐसे लोगों की संख्या काफी अधिक है, जो वेश्याओं की सप्लाई में दलाली करने तक में पीछे नहीं हैं। शराब की दुकानों से लेकर रेहडिय़ों तक पर पहुंचने वाले ये कथित पत्रकार चाट के पत्तों तक का मुफ्त में शौक फरमाते हैं।
    पत्रकारिता के क्षेत्र में आज भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है, जो इमानदारी के रास्ते पर चलते हुए इसे एक मिशन ही मानते हैं। लेकिन ऐसे लोग आज तमाम विपरीत परिस्थितियों का सामना करने को मजबूर हैं। उनकी इमानदारी का लेबल ही उनके लिए सबसे बड़ी समस्या बना हुआ है। आलम यह है कि जो पत्रकार खुद को आदर्शवादी बनाए रखना चाहता है, आज उसके लिए परिवार पालना भी मुश्किल हो रहा है। मीडिया हाउसों के मालिक उनकी इमानदारी पर पीठ तो जरूर थपथपाते हैं, लेकिन यह झांकने का प्रयास कतई नहीं करते कि सौदेबाजी से खुद को अलग रखने वाले ये आर्दश पत्रकार आज किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। हालांकि ऐसे पत्रकारों की संख्या बिकाऊ पत्रकारिता करने वाले लोगों की तुलना में कुछ फीसदी ही है। एसी गाड़ी और शानदार बंगलों में शाही ठाठ के साथ जिंदगी गुजारने वाले अधिकांश पत्रकार एक जर्नलिस्ट होने से ज्यादा व्यापारी बने हुए हैं। बिना वेतन काम करने वाले स्ट्रिंगरों के खबर प्रकाशित करने के नाम पर सौ-पचास रुपए लेने की स्थिति बड़े सौदागरों को किसी भी सूरत में रास नहीं आती। लुटेरों की तरह काम करने वाले ये सौदागर बड़े-बड़े डाके डालने के बावजूद अपना दामन पाक-साफ बताते फिरते हैं, जबकि खर्चा निकालने के लिए सौ-पचास रुपए लेने वाले कस्बों के स्ट्रिंगर इनकी नजर में चोर होते हैं। इस क्षेत्र में ऐसे डकैतों की कमी भी नहीं है, जो स्ट्रिंगरों से अपना हिस्सा तक मांगने से बाज नहीं आते। ऐसे पत्रकारों की लंबी फेहरिस्त है, जो दस से बीस हजार रुपए मासिक होने के बावजूद बड़े उद्योगपतियों की तरह ठाठ की जिंदगी बसर कर रहे हैं। उनके बच्चे महंगी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। नेताओं की चप्पलें उठाना उनकी फितरत में शूमार हो चुका है। ऐसे कथित पत्रकार एक ओर जहां नेताओं से खबरें प्रकाशित करने के नाम पर मोटा पैकेज हासिल करते हैं, वहीं अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपने काले धंधों को चमकाने में भी कामयाब होते रहते हैं। कुछ समाचार पत्र तो ऐसे हैं, जो वेतन के नाम पर अपने पत्रकारों को सिर्फ पहचान पत्र व बाइलाइन खबरें देने तक ही सीमित हैं। ऐसे अखबारों के डेस्क प्रभारी भले ही पांच या दस हजार रुपए की नौकरी कर रहे हों, लेकिन उनके शाही ठाठ भी निराले हैं। मतलब साफ है कि अपने रिपोर्टरों की खबरें प्रकाशित करने की ऐवज में ये डेस्क प्रभारी भी नजराना लेने में आगे रहते हैं। चुनावों के दौरान रिपोर्टर नेताओं व डेस्क प्रभारी के बीच डील कराने में भूमिका अदा करते हैं। जो रिपार्टर दलाली करने से इनकार कर देता है, उसकी खबरों का प्रकाशन रोक दिया जाता है।
    पत्रकारिता का बंटाधार करने में कई टीवी चैनल भी पीछे नहीं हैं। स्ट्रिंगरों को पांच से दस हजार रुपए में आईडी देकर लूट के मैदान में उतारने वाले टीवी चैनल इस इमानदारी के पेशे को सबसे ज्यादा बेइमान बनाने में भूमिका निभा रहे हैं। चैनलों से फूटी कौड़ी तक नहीं मिलने के बावजूद इन चैनलों के स्ट्रिंगरों का गुजारा कैसे हो रहा है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। हाथ में चैनल की आईडी लेकर आईएएस और आपीएस से अटपटे सवाल करने वाले कई स्ट्रिंगर तो ऐसे हैं, जो शायद दसवीं कक्षा तक पास नहीं कर पाए। इमानदार अधिकारी ऐसे पत्रकारों की हकीकत जानकर उन्हें मुंह नहीं लगाते, जबकि भ्रष्ट अधिकारी ऐसे पत्रकारों के साथ दोस्ती करने में आगे रहते हैं। ऐसे में इन दोनों ही तरह के पत्रकारों की पांचों उंगलियां घी में होती हैं। मुसीबत है, तो सिर्फ उन पत्रकारों की, जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने दामन को दागदार होने से बचाने के प्रयास में लगे हुए हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार बढ़ती गंदगी को साफ करने के लिए ऐसे लोगों को चिंतन करना ही होगा, जो इस पेशे को बदमान होने से बचाने की दिशा में सार्थक प्रयास कर रहे हैं। नहीं तो वह दिन दूर नहीं, जब भ्रष्टाचारियों के साथ-साथ इमानदार पत्रकारों की छवि भी आम लोगों में पूरी तरह धूमिल हो जाएगी।

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