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अप्रेजल-इनक्रीमेंट वाला मारक मार्च-अप्रैल माह

आजकल मीडिया वालों की धड़कनें तेज हैं. एनुवल इनक्रीमेंट जो लगना है. भास्कर समेत कई अखबारों में प्रबंधन पिछले बरस इनक्रीमेंट रिसेसन के नाम पर पी गया. काम करने वाले कसमसा कर रह गए. भुनभुनाते हुए मालिकों को दसों गालियां देकर भड़ास निकालते रहे और काम करते रहे. पर इस बरस ऐसा नहीं होगा. गतिविधि तेज हो चुकी है. एप्रेजल फार्म भरे जाने लगे हैं. एडिटरों व यूनिट हेडों से रिपोर्टों का लेन-देन हो रहा है. मीडियाकर्मी भी अपने आकाओं का हुक्म पूरी विनम्रता से बजा रहे हैं. अमर उजाला में भी लोग सांस बांधे इंतजार कर रहे हैं. मार्च में जो अप्रेजल हो रहा है, उसका रिजल्ट अप्रैल में आ जाएगा. बढ़ी हुई सेलरी हाथ में मई महीने में आएगी. जो लोग दाएं-बाएं खिसकने वाले थे, वे रुक गए हैं. ठहर गए हैं इनक्रीमेंट तक. ”देख लेते हैं कितना बढ़ता है, फिर बढ़े हुए के आधार पर दूसरे हाउस में बारगेनिंग की जाएगी…..” मन ही मन मगन होकर सोच रहे हैं सब लोग. जितने पैसे बढ़ेंगे, उसके हिसाब से घर-गृहस्थी में भी कुछ बढ़ोतरी के ख्वाब बुने जाने लगे हैं. कुछ बास तो बदमाश टाइप होते हैं.

आजकल मीडिया वालों की धड़कनें तेज हैं. एनुवल इनक्रीमेंट जो लगना है. भास्कर समेत कई अखबारों में प्रबंधन पिछले बरस इनक्रीमेंट रिसेसन के नाम पर पी गया. काम करने वाले कसमसा कर रह गए. भुनभुनाते हुए मालिकों को दसों गालियां देकर भड़ास निकालते रहे और काम करते रहे. पर इस बरस ऐसा नहीं होगा. गतिविधि तेज हो चुकी है. एप्रेजल फार्म भरे जाने लगे हैं. एडिटरों व यूनिट हेडों से रिपोर्टों का लेन-देन हो रहा है. मीडियाकर्मी भी अपने आकाओं का हुक्म पूरी विनम्रता से बजा रहे हैं. अमर उजाला में भी लोग सांस बांधे इंतजार कर रहे हैं. मार्च में जो अप्रेजल हो रहा है, उसका रिजल्ट अप्रैल में आ जाएगा. बढ़ी हुई सेलरी हाथ में मई महीने में आएगी. जो लोग दाएं-बाएं खिसकने वाले थे, वे रुक गए हैं. ठहर गए हैं इनक्रीमेंट तक. ”देख लेते हैं कितना बढ़ता है, फिर बढ़े हुए के आधार पर दूसरे हाउस में बारगेनिंग की जाएगी…..” मन ही मन मगन होकर सोच रहे हैं सब लोग. जितने पैसे बढ़ेंगे, उसके हिसाब से घर-गृहस्थी में भी कुछ बढ़ोतरी के ख्वाब बुने जाने लगे हैं. कुछ बास तो बदमाश टाइप होते हैं.

ऐसे बदमाश बास मार्च भर अपने अधीनस्थों में मीन-मेख निकालते रहते हैं तक कर्मचारी ज्यादा इनक्रीमेंट के लिए मुंह न खोल सके. एक्स्ट्रा डिमांड न करे, इसलिए काम में कमी निकालने की पुरानी परंपरा है. इन मार्च-अप्रैल महीनों में मैनेजमेंट साइड के लोगों का पारा गरम रहता है. उनकी जेब थोड़ी ढीली होने वाली होती है कर्मचारियों की सेलरी वृद्धि के कारण. सो, उनकी कर्मचारियों से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं. बढ़ी हुई अपेक्षा पूरी न होने पर वे बात-बात पर चिढ़ने व बरसने लगते हैं. कई बासेज ने अपने करीबियों के कान में पहले ही फूंक दिया है- चिंता न कर, अच्छी रिपोर्ट भेज दी है, बढ़िया पार्टी दे देना. कान में यह मंत्र पड़ते ही करीबी का शरीर उत्तेजना व सनसनी से भरपूर होकर बास का साथ जनम-जनम तक निभाने का वादा करने लगता है. जो किसी दल, गुट या खेमे में नहीं हैं, उन्हें थोड़ी मुश्किल होती है. बहुत कम ऐसे बास होते हैं जो काम, प्रतिभा व संभावना के आधार पर सही-सही रिपोर्ट भेजते हैं. कौन अपना आदमी है, कौन पराया आदमी है, कौन बात मानता है, कौन ज्यादा बहस करता है, कौन किसका जासूस है, कौन मेरा जासूस है, कौन सेवा टहल अच्छा कर लेता है, कौन डांट खाने के बाद भी जी सर जी सर कर लेता है, कौन आंख तरेरता है, कौन भाव नहीं देता है…. ये वो तमाम पैरामीटर्स हैं, जिसके आधार पर बास लोग अप्रेजल व इनक्रीमेंट से संबंधित अपनी फाइलों को दाएं-बाएं सरकाते हैं.

आपके संस्थान में अप्रेजल व इनक्रीमेंट की क्या दशा-दिशा है?

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0 Comments

  1. alok vashneya

    March 6, 2010 at 7:38 am

    sorry mr. pankaj,
    i am not agree with u. it seems that you are not from hindi media and getting a very fatty pay package. i am working in the largest growing hindi daily of India and here chamcha’s (who drink daily with boss and accept his all words without any hesitation) get all the cream and we are surviving on buttermilk.

  2. smriti goyal

    March 6, 2010 at 7:42 am

    Though I would like to believe every word you said pankaj ji but the truth is that in the last three years, i have seen that in my very office, the people who write and edit more number of news and make more pages are the ones who are paid the least. while those who don’t know how to write news well, always look for designers to help them out and make more noise, are the ones who get out-of-turn increments. don’t we find it difficult to explain?

  3. RAJEEV MISHRA

    March 6, 2010 at 12:25 am

    hamare organisation mein to appraisal koi maine nahi rakhta. bas jiske saath jo marji hoti hai kar liya jata hai.

    organisation no.1 hai to hamare bihari bhaiyon ka haath baki sab ram bharose

  4. pankaj Sharma

    March 5, 2010 at 10:48 pm

    Dear Mr. Alok,
    I have not given any UPDESH , you seems to be more experienced person then me. You have seen one side of the COIN , try to see other side , you will find the way. My Best Wishes to you.

    Warm regards,
    Pankaj Sharma

  5. alok varshneya

    March 5, 2010 at 9:20 am

    end of the result doesnt matters, chamchagiri matters. we had seen a lot of qualified and labourious journalists, but they get peanuts only. all the cream goes to chamcha’s. there is a short cut mr. perfect, dont give us UPDESH. (the dose of honest ethics)

  6. pankaj Sharma

    March 5, 2010 at 5:21 am

    Best of luck to all employees for their appraisas.
    End of the day result matters and salary will be increase on the basis of EFFORTS and RESULTS. There is no SHORT CUT.

  7. suresh rana

    March 5, 2010 at 4:59 am

    baat to theek hai…..sampadkon kee chamchi ke bina bhala baria apraisal kaise milegee!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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