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प्रायोजित रिपोर्टिंग करने-कराने वाले ये पत्रकार

अवसरवादी लोग फायदे का कोई काम हाथ से छूटने नहीं देते। इसके लिए उन्हें पद-प्रतिष्ठा ही क्यों न दांव पर लगानी पड़े। अंबिकापुर के पत्रकारों की मौकापरस्ती का जो नमूना देखने को मिलता है वह छत्तीसगढ़ में शायद ही कहीं देखने को मिले। 13 फरवरी तो अंबिकापुर के आकाशवाणी चौक में सड़क की बदहाली व अधूरे कार्य से छात्र की ट्रक के नीचे कुचलकर मौत हो गई।

अवसरवादी लोग फायदे का कोई काम हाथ से छूटने नहीं देते। इसके लिए उन्हें पद-प्रतिष्ठा ही क्यों न दांव पर लगानी पड़े। अंबिकापुर के पत्रकारों की मौकापरस्ती का जो नमूना देखने को मिलता है वह छत्तीसगढ़ में शायद ही कहीं देखने को मिले। 13 फरवरी तो अंबिकापुर के आकाशवाणी चौक में सड़क की बदहाली व अधूरे कार्य से छात्र की ट्रक के नीचे कुचलकर मौत हो गई।

हादसे का कारण सड़क की बदहाली और अधकचरा निर्माण स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा था, जिसके लिए सीधे तौर पर ठेकेदार व प्रशासन जिम्मेदार है। लेकिन पत्रकारों ने अवसरवादिता का यह मौका नहीं छोड़ा और ठेकेदार के पक्ष में खड़े हो गए क्योंकि होली, दिवाली और अन्य मौकों पर मिठाई के डिब्बे पहुंचाने के साथ-साथ घर में भोग विलासिता का सामान पहुंचाने वाला कोई न कोई तो चाहिए ही। अब चूंकि हादसे का ठीकरा किसी न किसी के सिर पर फोडऩा ही था इसलिए यहां लंबे समय से बाजार लगा रहे सब्जी विक्रेताओं को लक्ष्य बनाया गया। एक चालू टाइप के पत्रकार ने बात उछाल दी कि हादसा सब्जी विक्रेताओं के कारण हुआ है, सो सभी हां में हां मिलाते हुए शोर मचाने लगे। यह बात चल पड़ी और मुद्दा भटक गया। अब लोगों का आक्रोश ठेकेदार व निरंकुश प्रशासन से हटकर, कमजोर और बेबस सब्जी विक्रेताओं पर फूट पड़ा।

कुछ माह पूर्व इन्हीं दलाल पत्रकारों ने महापौर की दलाली करते हुए तत्कालीन एसडीएम के खिलाफ अभियान छेड़ा था। एससडीएम द्वारा शहर में सुगम यातायात व्यवस्था के नाम पर सड़क किनारे से ठेले खोमचे व सब्जी वालों को व्यवस्थित किया जा रहा था लेकिन तब इन्हीं पत्रकारों ने इसे गरीबों की रोजी-रोटी पर प्रशासन का लात बताते हुए इसका विरोध किया। अंतत: एसडीएम दक्षिण बस्तर स्थानांतरित कर दिए गए। अब यही सब्जी ठेले वाले उन्हें हादसे का कारण नजर आ रहे हैं।

दरअसल यहां सड़क निर्माण का ठेका सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के एक प्रभावशाली नेता व ठेकेदार को मिला है, जो शासन-प्रशासन को विश्वास में लेकर मनमर्जी कर रहा है। 80 फीट की चौड़ाई पर बनने वाले इस रोड में ठेकेदार का जब मन हुआ और जैसा मन हुए कार्य कर छोड़ दिया जाता है। अभी पिछले ही दिनों एक साइड का निर्माण कर काम छोड़ दिया गया है, जिसके कारण सड़क असमतल व खतरनाक है। सड़क पर ही गिट्टी बिखरी पड़ी है। इसे साफ कराने या हटाने में रुचि न तो ठेकेदार की है और न ही निगम प्रशासन की। दूसरी ओर जिस चौराहे पर हादसा हुआ वहां मात्र एक ओर रोड पिछले दिनों बनाया गया है जबकि दूसरी ओर तीन परतों का असमतल सड़क और गड्ढ़े है। सड़क में जहां तहां बिजली के खंभे लगा दिए गए है। इससे लोगों को समझ ही नहीं आता कि लोग किस ओर से गुजरें। हादसे के प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि चौराहे पर सही दिशा नहीं चुन पाने के कारण ही छात्र ट्रक की चपेट में आया, ट्रक चालक अपनी निर्धारित दिशा में सामान्य गति से ही आ रहा था।

हादसे की यह आशंका पहले से ही बनी हुई थी लेकिन न तो इस ओर पत्रकारों ने ध्यान दिया और न प्रशासन ने। इसी चौक के पास ही बड़े अखबारों के दफ्तर है। यहां से शहर के शीर्ष पत्रकार गुजरते हैं। लेकिन इन पत्रकारों ने कभी इस समस्या पर लिखने की जहमत नहीं उठाई। अंबिकापुर सरगुजा में दलाली पत्रकारिता की यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले दिनों कृषि भूमि पर निर्माणाधीन राईस मिल के आहाता निर्माण के दौरान छ: महिला मजदूरों की मौत हुई लेकिन दलाल पत्रकारों ने यहां भी दिशाहिन व प्रायोजित रिपोर्टिंग कर मुद्दे को भटका दिया और आज तक आरोपियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई नहीं हुई। दरअसल यहां के सीनियर पत्रकारों द्वारा जूनियरों को बहला फुसला कर दिशाहीन कर दिया गया है। प्रभावी पद पर बैठे ऐसे पत्रकार रिपोर्टरों को यह समझने ही नहीं देना चाहते हैं कि खबर कैसे और क्यों लिखा जाना चाहिए। परिणामस्वरूप दिशाहीन रिपोर्टर अधकचरी खबरें बनाकर टेबल पर छोड़ देते हैं।

योगेश्वर शर्मा

[email protected]

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0 Comments

  1. prakash

    March 20, 2010 at 1:24 pm

    der hi sahi haqiqat samne to aayee.

  2. chandan

    March 20, 2010 at 3:48 pm

    इस खबर के मामले में लेखक महोदय पहले जानकारी दुरूस्त कर लेते तो शायद अच्छा होता। यहां जिम्मेदार माने जाने वाले अखबारों ने इसे कहीं भी सब्जी व्यापारियों के कारण दुर्घटना नहीं बताया,बल्कि भारी वाहनों की बेलगाम रफ्तार को कारण बताया है। अर्ध निर्मित रिंग रोड में पूर्व में भी घटनाएं हुई हैं एवं उक्त घटना के दो दिन बाद शाम को एक अन्य व्यक्ति की जान गई। सब्जी बाजारको लेकर पूर्व में छपी खबरों के बाद इसे आकाशवाणी मार्ग के बगल में स्थानांतरित किया गया था। लेखक निष्पक्ष रहें,एवं निष्पक्ष रहने वालों पर लांछन न लगाएं। अभी जवाबदेह पत्रकारों की संख्या कम हुई है,समाप्त नहीं हुई।

  3. vimlesh

    March 21, 2010 at 8:30 am

    उक्त लेख के तथ्यों में सच्चाई कम आैर गलत तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। जहां तक घटना के कारण एवं एसडीएम के विवाद का मामला है,दोनों अलग_अलग घटनाक्रम हैं। एसडीएम द्वारा गांधी चौक के पास व्यकितगत स्वार्थवश अपने निवास का आहाता बनाने के लिए खोमचे वाले,सब्जी विक्रेता,ठेले वालों को हटाने की कार्रवाई की जा रही थी। इसके विरोध में महापौर ने मोर्चा खोला था,पत्रकारों ने नहीं। दूसरी घटना आकाशवाणी चौक की है जो अलग घटनाक्रम है। यहां रिंगरोड में सब्जी दुकान के कारण अव्यवस्था को खबर में शामिल किया गया था। संभवत: लेखक महोदय को यहां के परिस्थितियों की पूर्ण जानकारी नहीं है। खबरें प्रायोजित हो सकती हैं लेकिन किसी मासूम के कफन पर खबर का प्रायोजन कोई निकृष्ठ पत्रकार ही कर सकता है। संभवत: यह लेखक महोदय जानते हों?

  4. vimlesh

    March 21, 2010 at 8:33 am

    एक अन्य जानकारी भी लेख में एक सिरे से गलत है। उक्त घटना 13 फरवरी नहीं 13 मार्च दिन शनिवार दोपहर 12.40 बजे की है।

  5. rajesh sing

    March 22, 2010 at 9:49 am

    भड़ास डाट काम के प्रबंधन से अनुरोध है कि पागल किस्म के लेखकों का लेख न छापें, इस लेख के लेखक उनके संस्थान द्वारा इसी पागलपन के कारण बतौर सजा बिलासपुर से हटाकर अंबिकापुर भेजे गए हैं। इस लेख के अधिकांश तथ्य गलत हैं। एसडीएम के जिस मामले का जिक्र किया गया है, उस समय उक्त लेखक यहां बतौर सजा नहीं भेजे गए थे। यदि पत्रकारों के निष्पक्ष रहने का सवाल है तो अंबिकापुर के सभी अखबारों की कटिंग मंगाकर देखें।

  6. daulat singh chauhan

    March 24, 2010 at 7:46 am

    लेकिन लेखक को पागल तक कह कर भड़ास निकालने वाले पत्रकार साथियों को भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि हमारे अधिकांश साथी जाने अनजाने सत्ता और पैसे वालों के हाथों में खेल जाते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे भी होते हैं जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनके हाथों से पाप करवा दिया गया है, जबकि कई ऐसे होते हैं जो जानतेबूझते अपने तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने के लिए अपनी कलम और अपना ईमान बेच देते हैं। फिर भी लाख बुराईयों के बावजूद आज भी पत्रकारिता ही ऐसा पेशा है, जिसके माध्यम से अगर कोई चाहे तो उन लोगों का भला कर सकता है जिनकी कोई आवाज नहीं है।

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