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सम्मान

अंबिकानंद सहाय को लाइफटाइम एचीवमेंट एवार्ड

वरिष्ठ पत्रकार और आजाद न्यूज के न्यूज डायरेक्टर अंबिकानंद सहाय को राजधानी दिल्ली में मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित फोर्थ इंडिया एक्सिलेंस अवार्ड 2010 के समारोह में लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया. उन्हें यह सम्मान केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी ने प्रदान किया.

वरिष्ठ पत्रकार और आजाद न्यूज के न्यूज डायरेक्टर अंबिकानंद सहाय को राजधानी दिल्ली में मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित फोर्थ इंडिया एक्सिलेंस अवार्ड 2010 के समारोह में लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया. उन्हें यह सम्मान केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी ने प्रदान किया.

इस अवसर पर श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री हरीश रावत भी मौजूद थे. आज़ाद न्यूज़ के चेयरमैन एमएस वालिया सहित मीडिया के कई गणमान्य व्यक्ति इस पल के गवाह बने. अंबिकानंद सहाय ने पत्रकारिता की जिंदगी का सफर साल 1972 में स्टेट्समैन में बतौर स्टाफ करेस्पांडेंट शुरू किया. दो सालों में ही अपनी लेखनी की वजह से उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली. जेपी मूवमेंट के दौरान उनकी पहचान और निखरी. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 1974 से 1985 तक बिहार के स्टेट्समैन के ही ब्यूरो चीफ बने रहने के बाद सहाय को पदोन्नति के जरिए उत्तर प्रदेश का ब्यूरो चीफ बना दिया गया. तब तक उनका नाम एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर भी अपना मुकाम तय कर चुका था.

1989 में यूपी प्रेस क्लब ने उन्हें बेस्ट पालिटिकल करेस्पांडेंट अवार्ड से नवाजा. बाद में 1991 में उन्हें बेनेट कोलमैन एंड कंपनी ने टाइम्स ऑफ इंडिया, लखनऊ का रेजिडेंट एडीटर का पद ऑफर किया. वे टीओआई, लखनऊ के साथ साल 1997 तक बने रहे. इस दौरान टाइम्स ग्रुप ने सफलता के ढेरों झंडे गाड़े. बाद में उन्हें टाइम्स इंडिया न्यूज सर्विस का को-एडीटर पद दिया गया और टाइम्स ग्रुप का पॉलिटिकल एनालिस्ट बनाकर दिल्ली बुला लिया गया. यहां रहते हुए उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के सभी एडीशन की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभाई. फिर 2003 में उन्होंने सहारा न्यूज़ ज्वाइन किया और सहारा ग्रुप के पांचों चैनलों के एडिटोरियल हेड रहे. साथ ही सहारा प्रिंट पब्लिकेशंस में बतौर सीनियर वाइस प्रेसिंडेंट भी उन्होंने कार्यभार संभाला. फिलहाल सहाय आज़ाद न्यूज़ में बतौर न्यूज़ डायरेक्टर आसीन हैं.

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0 Comments

  1. vineet kumar

    March 28, 2010 at 8:35 pm

    जितनी खुशी अंबिकानंद सहाय को पुरस्कार लेते हुए देखकर हो रही थी उससे कहीं ज्यादा अफसोस हो रहा था कि अंडू-झंडू लोग मंच पर टांय-टांय करके टाइम खोटा कर रहे थे और इनसे दो शब्द भी बोलने को नहीं कहा।..

  2. Tehseen Munawer

    March 29, 2010 at 11:23 am

    Mubarak ho Ambica Bhai-

  3. Tehseen Munawer

    March 29, 2010 at 11:24 am

    Mubarak ho aapko…..

  4. devendra rawat

    March 29, 2010 at 12:46 pm

    अंबिका नंद सहाय जैसी शख्सियत को जितने सम्मान और पुरुस्कार दिए जाएं कम ही हैं। युवा पत्रकारों को जैसा प्रोत्साहन अंबिका जी ने दिया है… उसकी दूसरी नज़ीर देखने को नहीं मिलती है। अंबिका जी और ऊंचे मुकाम छुएं हमारी दिली तम्मना है।

  5. ritu raj azad news

    March 29, 2010 at 1:07 pm

    सबसे पहले सहाय सर के बारे में लिखने से पहले में बहुत छोटा हुं ..लेकिन सर मिले लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड पर में सर को बहुत बहुत शुभकामनाएं ……इस अवार्ड के मिलने के बाद सर की सम्मान में एक औऱ पुरस्कार गया …

  6. संदीप सिंह

    March 29, 2010 at 3:00 pm

    अंबिका नंद सहाय जी को इस सम्मान और उपलव्धि के लिए बधाई हो। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में जितने कम समय में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली, ये उनकी लगनशीलता और कर्तव्यपरायणता का द्योतक है। ये आजाद न्यूज से जुड़े सभी लोगों का सौभाग्य है कि उन्हें सहाय जी के दिशा निर्देश में पत्रकारिता करने का अवसर मिल रहा है। 🙂

  7. chandan

    March 29, 2010 at 3:47 pm

    सहाय सर को पत्रकारिता के क्षेत्र में लाइफटाईम अवॉर्ड से नवाजे जाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। ऐसे व्यक्ति को इस सम्मान से नवाजा गया जो इसे पाने की कूबत रखते हैं। पत्रकारिता और चौथा स्तम्भ ऐसे ही चन्द गिने चुने लोगों से अपनी गरिमा को बनाए हुए है। अम्बिका नंद सहाय अपने आप में चलता फिरता पत्रकारिता संस्थान है.. जिनसे आने वाली भावी नस्लों को भी हमेशा कुछ न कुछ सीखने को ही मिलेगा। अम्बिका सर के विषय में जितना भी कहा जाय सूर्य को दीपक दिखाना ही कहा जाएगा।

  8. ब्रजेश

    March 29, 2010 at 3:54 pm

    अम्बिका सर इस सम्मान के लिए बधाई के पात्र हैं।पत्रकारिता में ऐसे चंद गिने चुने लोग ही बचे हैं जिनमें नैतिकता, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ अपने काम के प्रति लगनशीलता बरकरा है, उन चंद नामों में अम्बिका नंद सहाय भी एक हैं। ये किसी पुरस्कार के मोहताज नहीं। पत्रकारिता और अम्बिकानंद सहाय एक दूसरे के प्रयाय बन चुके हैं।इनकेव्यक्तित्व से आने वाली नस्लों को सीख लेनी चाहिए।

  9. साकेत

    March 29, 2010 at 4:00 pm

    पत्रकारिता में अम्बिका जी का लम्बा सफर रहा है और ,आगे और भी दूर जाना है उन्हें। लेकिन ऐसे गिने चुने चंद लोग हैं जिन्हों ने कभी भी अपने विचारों और उसूलों से समझौता नहीं किया। हमेशा पत्रकारिता के साथ न्याय किया। खबरों को हमेशा जीना ही सिखाया.. अम्बिका जी को यह सम्मान मिलने के बाद उनका कद और बढ गया है। जिस संस्थान में भी रहे बादशाह की तरह…. कभी भी विवाद उन तक फटक भी नहीं पाया…

  10. anupam

    March 29, 2010 at 5:00 pm

    ऊंचा मुकाम, ऊंचा ओहदा पाकर भी कुछ लोगों में शालीनता बनी रहती है। अंबिका जी के बारे में जितना जानता हूं। वो बहुत थोड़ा है मेरे लिए। आज भी उनमें शालीन विचार कायम हैं। दूसरों के लिए एक बड़ी सीख उनका खुद का व्यक्तित्व है। जिसे उन्होंने ताउम्र जिया है। सभी पत्रकार भाइयों एवं जनमानस से सरोकार रखने वाले लोगों के लिए ये एक बड़ी सीख है। उम्दा पहलुओं को पहचानें। और अपने आप को शालीन रखें। क्योंकि कामयाबी की राहें ऐसे ही आसान नहीं बन जातीं।

  11. Samir Kumar, Navabharat(M.P.)

    March 30, 2010 at 8:46 am

    अम्बिका नंद सहाय सर इस सम्मान के लिए बधाई के पात्र हैं। पत्रकारिता में कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ सहाय सर अपने काम के प्रति लगनशीलता है, सहाय सर उन चंद नामों में एक हैं जिनके व्यक्तित्व से आने वाली नस्लों को सीख लेनी चाहिए। ऊंचा मुकाम व ऊंचा ओहदा पाकर आज भी अंबिका सर में शालीन विचार कायम हैं।

  12. chandra kant thakur

    April 16, 2010 at 7:48 am

    sir badhai ho
    chandra kant thakur,kolkata

  13. vijaymohan singh

    May 31, 2010 at 1:00 pm

    चेला संस्कृति और सुविधावाद के प्रतिनिधि पत्रकार अंबिकानंद सहाय को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिए जाने ने इस पुरस्कार की गरिमा और उसके कद को कम किया है। खेद की बात है कि मीडिया फेडरेशन ऑफ इंडिया को इतने बड़े देश में इस पुरस्कार के लिए अंबिकानंद सहाय से बेहतर नाम नहीं मिल सका। सहाय जी की पीढ़ी के तमाम ऐसे नाम हैं, जो इस पुरस्कार के असली हकदार थे। फेडरेशन खुद उन नामों से वाकिफ होगा। खैर। सहाय जी व्यक्तिगत तौर पर थोडे विनम्र दिखते जरूर हैं। लेकिन इससे यह मान लेना गलत होगा कि वे इंसान भी अच्छे हैं। दरअसल, यह आचरण उनके नाटकीय व्यक्तित्व का हिस्सा भर है और अंदर से वे सामंती सोच के इंसान हैं। अच्छे और बुरे की पहचान व्यक्ति के पेशेगत कृत्यों से होनी चाहिए। इतने बड़े पद पर पहुंचने की शायद वे सोच भी नहीं सकते थे, अगर वे देश के दिग्गज पत्रकार सच्चिदानंद सहाय के भाई न होते। हां, सच्चिदानंद सहाय देश के गिने-चुने पत्रकारों में से थे। और किसी भी पुरस्कार से उन्हें माप पाना शायद संभव नहीं था। लेकिन, अंबिकानंद सहाय का पत्रकारिता में कोई सकारात्मक योगदान नहीं है। उन्होंने सिर्फ पत्रकारिता को बाजारू और सुविधावाद की पगडंडी बनाने में योगदान किया। पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है, समाज को बदलने की कोई रूपरेखा उनके मन में नहीं है।19 अक्टूबर 2009 को ‘भड़ास’ नामक मीडिया पोर्टल में ‘जब जिसकी सत्ता तब तिसके अखबार’ शीर्षक दयानंद पांडेय का लेख भी इस ओर इशारा करता है। उस लेख का यह अंश द्रष्टव्य है, “2 जून 1995 को लखनऊ में मुलायम सिंह ने सुबह-सुबह जिस तरह अपने गुंडों को मायावती पर हमले के लिए भेजा था, मुख्यमंत्री रहते हुए भी, वह तो अश्लील था ही, अपने पत्रकारों ने उससे भी ज़्यादा अश्लीलता बरती। पी.टी.आई ने इतनी बड़ी घटना को सिर्फ़ दो टेक में निपटा दिया तो टाइम्स आफ़ इंडिया ने शार्ट डी.सी. अंडरप्ले करके दिया। बाद में इसके कारणों की पड़ताल की तबके जनसत्ता के संवाददाता हेमंत शर्मा ने। तो पाया कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पी.टी.आई के व्यूरो चीफ़ खान और टाइम्स के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने मुलायम शासनकाल में विवेकाधीन कोष से लाखों रुपए खाए हुए थे। तमाम और पत्रकारों ने भी लाखों रुपए खाए थे। और वो जो कहते हैं कि राजा का बाजा बजा! तो भैय्या लोगों ने राजा का बाजा बजाया। आज भी बजा रहे हैं। खैर, हेमंत शर्मा ने जब खबर लिखी तो टाइम्स आफ़ इंडिया के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने हेमंत को नौकरी ले लेने की धमकी दी ”।

    अब बताइए, ऐसे अंबिकानंद सहाय जी को ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और पत्रकारिता का चलता-फिरता संस्थान बताना कहां तक उचित है। एसवन चैनल से अलग होने के बाद करीब डेढ़ साल तक बेरोजगार रहने वाले सहाय जी आजाद न्यूज जैसे चैनल में बैठकर सिर्फ पेंशन उठा रहे हैं। तमाम वक्त खाली बैठे रहने के बावजूद वे लिखने-पढ़ने से कोसों दूर हैं। जीवन भर अंग्रेजी की पत्रकारिता करते रहने के बाद भी उनका कोई आलेख कभी किसी अखबार-पत्रिका में नहीं दिखता। और हां, अंग्रेजी की पत्रकारिता कर लेने का मतलब ब्रह्मज्ञान मिल जाना नहीं मान लेना चाहिए। अंग्रेजी महज एक भाषा है हिन्दी की तरह। अंग्रेजी या हिन्दी जानते हुए भी विचार के स्तर पर कोई आदमी बिल्कुल निरीह हो सकता है, जैसा कि अधिक मामलों में हो रहा है। इसलिए मैकाले के इन मानस पुत्रों से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है। खैर। मुलायम सिंह से जुगाड़ के आधार पर ही वे सहारा के हेड बनाए गए थे। लेकिन, उनकी बेमतलब की राजशाही फिजूलखर्चियों ने सहारा को गर्त में धकेल दिया और अंततः उन्हें भी चैनल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
    सहाय जी सरोकार की कीमत पर नेताओं से मधुर संबंध बनाने के लिए जाने जाते हैं। माना जाता है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपने करीबी सुबोधकांत सहाय के जरिए उन्होंने इस पुरस्कार को पाने के लिए लॉबिंग की। यह पूछा जाना चाहिए कि इतने लंबे पत्रकारीय जीवन में उन्होंने ऐसा क्या किया जिससे किसी पीड़ित को लाभ मिला हो या फिर किसी मंत्री-अफसर की कारगुजारी सामने आई हो। लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया में रहते हुए इन्होंने अपने पद का जमकर दुरुपयोग किया। और निजी हित के लिए संपादक संस्था को नेताओं के नाम गिरवी कर दिया। एन. डी. तिवारी के मुख्यमंत्री रहते इन्होंने जरूरत से ज्यादा और कौ़ड़ी के दाम पर सरकारी जमीन अपने नाम करा ली थी। इस घटना का विरोध लखनऊ के तमाम श्रमजीवी पत्रकारों ने किया था, लेकिन सत्ता और एक सत्ताजीवी पत्रकार का विरोध करने वाले इन पत्रकारों को निराश ही होना पड़ा था। ये चंद उदाहरण भर हैं। ऐसे पत्रकारों ने अपने लाइफ टाइम तक और पत्रकारिता को उसके लाइफ टाइम तक के लिए नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। शब्दों की सीमा सब कुछ कहने की इजाजत नहीं देती। बस इशारा भर किया गया है। बहरहाल, ऐसी घटनाएं क्या साबित करती हैं ? अंबिकानंद सहाय एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार का नाम है? या फिर अंबिकानंद सहाय उस पत्रकार वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो निजी लाभ के लिए सत्ता को सीढ़ी बनाने का काम करते हैं और पत्रकारीय गरिमा को धूल-धसरित होते देख विचलित तक नहीं होते। फैसला आप कीजिए।

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