बचपन में पत्रकार बने, जवानी में फौजी हुए, लौटे तो टीओआई में सेक्युरिटी आफिसर बने, वहां से नभाटा में ट्रांसफर हुआ, फिर स्पोर्ट्स हेड बने, अब संपादक हो गए हैं सुंदर चंद्र ठाकुर : नवभारत टाइम्स, मुंबई के रेजीडेंट एडिटर शचींद्र त्रिपाठी बीते साल दिसंबर महीने में रिटायर हो गए लेकिन प्रबंधन ने उन्हें एक साल का एक्सटेंशन देकर रख लिया.
कुछ हफ्ते पहले नवभारत टाइम्स, दिल्ली के स्पोर्ट्स हेड सुंदर चंद्र ठाकुर को एडिटर डिजीगनेट पद देकर नभाटा, मुंबई भेजा गया. माना जा रहा है कि इस साल दिसंबर में नभाटा, मुंबई से कार्यमुक्त होने वाले शचींद्र त्रिपाठी के बाद फुलफ्लेज्ड एडिटर के रूप में सुंदर चंद्र ठाकुर काम संभाल लेंगे. सूत्रों के मुताबिक उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से कम उम्र में ही पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले सुंदर चंद्र बाद में फौज में भर्ती हो गए. सोमालिया में शांति सेना के हिस्से रहे.
कई वर्षों तक फौज में रहने के बाद सुंदर चंद्र जब वापस लौटे तो पहला प्यार पत्रकारिता को भूल न सके थे. वे टाइम्स आफ इंडिया के सेक्युरिटी आफिसर बनकर नौकरी करने लगे. साथ ही हिंदुस्तान, नभाटा, सहारा समेत कई अखबारों में फ्रीलांस पत्रकार के बतौर लेख वगैरह भी लिखने लगे. पंकज बिष्ट की ‘समयांतर’ मैग्जीन समेत कई साहित्यिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होने लगे. सुंदर चंद्र की लिखने-पढ़ने की प्रतिभा को देखकर मधुसूदन आनंद ने उनका इंटर डिपार्टमेंट ट्रांसफर कराकर संपादकीय में ले आए. मौका मिलने के बाद सुंदर चंद्र अपनी प्रतिभा व मेहनत के बल पर तरक्की पाते रहे और स्पोर्ट्स हेड बना दिए गए. अब उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देकर मुंबई भेज दिया गया है.
बताया जा रहा है कि मुंबई पहुंचने के बाद सुंदर चंद्र ठाकुर ने कई नए प्रयोग शुरू किए हैं. इनमें एक प्रयोग उत्तराखंड, बिहार-यूपी, राजस्थान आदि से मुंबई आकर बस गए लोगों को उनकी बोली में उनकी माटी की संवेदना को पहुंचाने का है. कुमाऊंनी में अशोक पांडेय का लिखा स्तंभ छपा तो भोजपुरी में लिखा अनिल यादव का कालम छपा. आने वाले दिनों में राजस्थानी में संजय व्यास का कालम नभाटा, मुंबई में छपेगा. कोशिश यह है कि अपने प्रदेशों से उखड़कर मुंबई बसे लोगों को अपनी मिट्टी व भाषा की असली खुशबू नभाटा के जरिए मिल सके.












shailesh
March 28, 2010 at 7:14 pm
sunder chand thakur ji ko bahut bahut badhaiyan…
shailesh
March 28, 2010 at 7:17 pm
kya khoobsoorta proyaog hai sunder chand thakur ka…
Haresh Kumar
March 30, 2010 at 6:45 am
अगर दिल में लगन हो और आप मेहनत कर सकते हों , तो रास्ता मिलते देर नहीं लगती। संदर चंद्र के जज्बे को शत् शत् नमन।
pankaj dubey
November 20, 2010 at 4:44 pm
sir aap ke bare me pad kr yeh malum pad gya ki ek patrkar ko kabhi niras nhi hona chiye bas use apne vichar aur lekhni ko talvar ki trh hamesa chok karte rahna chahiye ..yeh sir mai es liye kh rha hoo ki mai ek patrakar hoo ek mahanubhav ka interview karne gya to vo mahnubhav mujhe bole ki patrakar ko pilao jo man me aaye vo likhao mujhe bada bura laga mai ne turant unhe javab diya manyver yeh patrakar pilane va likhane vala nhi hai galt baat ka muh todne vala hai aur mai aapka interview nhhi karunga aap ko jo khana hai complen ker digiyega ….bas sir aap ke bare me pad ker mujhe badi takt mili hai ……..