मेरठ में एक इंस्टीट्यूट संचालक और छुटभैय्ये पत्रकारों के बीच कथित ‘महान संघर्ष’ की घटना पर मेरठ की पत्रकारिता दो-फाड़ की स्थिति में है. संपादकों ने नकली नारेबाजी वाली फर्जी आंदोलनकारी पत्रकारिता का रास्ता नहीं अपनाया तो उन्हें गालियां पड़ रही हैं. इन संपादकों ने ब्लैकमेलर पत्रकारों की हां में हां न मिलाकर बौद्धिक व रीयलिस्टिक एप्रोच अपनाते हुए मामले का सम्मानजनक अंत करा दिया तो ब्लैकमेलर पत्रकार इन्हीं संपादकों को गालियां देने लगे हैं. इन संपादकों ने अड्डेबाज स्थानीय पत्रकारों और अड्डेबाज स्थानीय पत्रकार नेताओं की राजनीति नहीं चलने दी.
इस पूरे विवाद-झगड़े-मामले का सम्मानजनक हल निकाल दिया. इससे कई ‘स्थानीय सरगनाओं’ को घबराहट हो गई कि उनकी ब्लैकमेलिंग की दुकान का क्या होगा!! पर इसी शहर में भ्रष्ट डाक्टरों, भ्रष्ट अधिकारियों, बिल्डरों, नेताओं से गाहे-बगाहे रुपये ऐंठने वाले, उनके लिए मीडिया मैनेज करने वाले ढेर सारे स्वनामधन्य पत्रकार हैं जो आजकल पत्रकारिता की गरिमा पर भाषण देते इधर-उधर फिर रहे हैं. ये ब्लैकमेलिया पत्रकार आजकल मेरठ के संपादकों को कठघरे में खड़ा करने के लिए जितना भी उल-जुलूल आरोप हवा में उछाल सकते हैं, उछालने में जुटे हैं. भड़ास4मीडिया भी इन्हीं ब्लैकमेलर पत्रकारों की नारेबाजी को मंच प्रदान कर रहा है जिससे ईमानदार पत्रकार खुद को असहज महसूस कर रहे हैं.
ब्लैकमेलिया पत्रकारों के उपद्रव पर कोहराम मचाने वाले तथाकथित पत्रकार नेताओं और कुछ छुटभैय्ये संपादकों के आगे यह सवाल भी खड़ा है कि जब शहर के एक अड्डेबाज चिकित्सक डा. सुनील गुप्ता के हाथों एक मरीज की जान जाने पर उनकी प्रैक्टिस पर मेडिकल काउंसिल के ऐतराज के बाद प्रदेश सरकार ने रोक लगाई थी तो वो प्रयोगधर्मी संपादक उस खबर को क्यों पी गए?? क्यों दूसरे अखबारों में खबर न जाए, इसके लिए जोड़तोड़ और मैनेज करते रहे??
सूप बोले तो बोले, चलनी क्या बोले जिसमें बहत्तर छेद. संपादकों के सम्मान पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरहबान में झांकें. रही बात पत्रकारों के सम्मान से समझौते की तो उस इंस्टीट्यूट में हंगामा करने वाले पत्रकारों के सम्मान की असलियत कोई भी मेरठ आकर जान सकता है. उनके उपद्रव और हाईवे जाम कर जनता को घंटों घेरे रखने की करतूत की खबर छापने पर खुद संपादकों को ही शर्म आ रही थी. सूरज पर थूकेंगे तो खुद पर ही गिरेगा.
मेरठ के एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा भेजे गए ई-मेल पर आधारित. उन्होंने अपना नाम गुप्त रखने का अनुरोध किया है ताकि वे बिना वजह ‘ब्लैकमेलर पत्रकारों’ और उनके ‘सरगनाओं’ के निशाने पर न आ जाएं.












indian democracy
April 14, 2010 at 6:33 am
आदरनीय यशवंत जी सदर प्रणाम बीते कुछ दिनों से आप को भी संपादको जैसे शौक हो गए है. अब तो कमेन्ट पर भी आप की केंची चलने लगी है. लगता है. भड़ास को आम पत्रकारों का दर्द लिखने की ज़रूरत अब महसूस नही होती. हो सके तो नीचे लिखी बाते इन महोदय को जस की तस पंहुचा दीजियेगा. हम आपके आभारी होंगे. धन्यवाद
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अपना नाम तो हम भी नही लिखने वाले. आखिर इतने क्रन्तिकारी विचार लिखने वाले आदरनीय वरिष्ठ रिपोर्टर साहब की हिम्मत नही है. हम तो साहब गरीब पत्रकार हैं. लेकिन लिखे बिना बाज़ भी नही आ सकते. संपादक प्रेम साहब का ज्यादा ही जाग गया है. इसलिए हर रिपोर्टर बईमान नज़र आने लगा है. यह जो भी आदरनीय वरिष्ठ साहब है इतना जान ले तो काफी है की इस घटना का विरोध मेरठ का हर वो रिपोर्टर कर रहा है. जिसने दलाली खाने की जगह स्वाभिमान को तवज्जो दी. यह सच है की कुछ दलालों ने भी इस मामले मैं सुधीर गिरी से समझोते का विरोध करना सुरु कर दिया है. लकिन यह लोग कल लोकतंत्र का समर्थन करने लगे तो क्या आप तालिबान के समर्थन में उतर आयेंगे. आप कितने ईमानदार हैं यह तो आपके विचार पढ़ कर पता चल गया. उस समझोते में शामिल लोग कितने ईमानदार है इसे भी सारी मीडिया जानती है. आप अपना नाम बता देते तो शायद आपके कुछ कारनामे भी यसवंत जी को भेजे जा सकते. समझोता कैसे हुआ तमाम शहर को मालूम है. और एक बात और बता देना चाहूँगा यह समझोता संपादको के बूते की बात नही थी इलेक्ट्रोनिक मीडिया के कुछ सुरमा पत्रकारों की भूमिका से इनकार नही किया जा सकता. कितना विज्ञपन तय हुआ और कितना अलग से किसी भी आखबार का मार्केटिंग कर्मचारी बता देगा. शर्म आनी चाहिए आप जैसे लोगो को जो सिर्फ चापलूसी के बिना कुछ नही कर सकते.