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ज्यादातर पत्रकार आज भी ईमानदार हैं

पत्रकार एक दूसरे को गरियाना बंद कर आत्‍मनिरीक्षण करें : भोपाल में पेड पत्रकार वार्ता और पत्रकारों की लडाई के पीछे पत्रकारों को एक दूसरे को दुरदुराने की प्रवृत्ति से अधिक कुछ भी नजर नहीं आता है। ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान, दिग्विजय सिंह और सुरेश पचौरी या राष्‍ट्रीय तथा प्रदेश की राजनीति में सक्रिय किसी भी दमदार नेता को पेड पत्रकार वार्ता या पेड पत्रकारों की शरण लेने की आवश्‍यकता नहीं है यह बात सभी समझते हैं।

पत्रकार एक दूसरे को गरियाना बंद कर आत्‍मनिरीक्षण करें : भोपाल में पेड पत्रकार वार्ता और पत्रकारों की लडाई के पीछे पत्रकारों को एक दूसरे को दुरदुराने की प्रवृत्ति से अधिक कुछ भी नजर नहीं आता है। ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान, दिग्विजय सिंह और सुरेश पचौरी या राष्‍ट्रीय तथा प्रदेश की राजनीति में सक्रिय किसी भी दमदार नेता को पेड पत्रकार वार्ता या पेड पत्रकारों की शरण लेने की आवश्‍यकता नहीं है यह बात सभी समझते हैं।

समाज में आई घोर नैतिक गिरावट से पत्रकारिता जगत भी अछूता नहीं है लेकिन आज भी पत्रकारों का एक बडा हुजूम पूरी ईमानदारी से अपने दायित्‍वों का निर्वाह कर रहा है अन्‍यथा इस देश के अखबार और टीवी चैनल सुनने और देखने लायक नहीं रह जाते। पत्रकारों के लिए जब पत्रकार ही असम्‍माजनक भाषा का प्रयोग करते हुए टीका टिप्‍पणी करते हैं तो बेहद दुख होता है। भारत में शायद यही एक ऐसा व्‍यवसाय है जहां हमपेशा लोग एक दूसरे के प्रति इतनी कटुता और घृणा का भाव रखते हैं। ऐसा क्‍यों है इस बात की जड तक पहुंचना चाहिए और इस प्रवृत्ति को हतोत्‍साहित किया जाना चाहिए।

पत्रकार का आपसी संघर्ष हमेशा सत्‍ता प्रतिष्‍ठान और समाज के उस तबके को लाभ पहुंचाता है जो अपने निहित स्‍वार्थों के लिए प्रेस का इस्‍तेमाल करना चाहते हैं। निश्चित रूप से पत्रकारिता एक ऐसा असंगठित क्षेत्र है जहां बडे से बडे पत्रकार की नौकरी कुछ अपवादों और संस्‍थानों को छोड कर प्रबंधन के साथ उसके समीकरणों पर निर्भर करती है। पत्रकारों के शोषण की सबसे बडी वजह भी यही है। राजधानी भोपाल एक ऐसी जगह है जहां आज तक पत्रकारों का अपना कोई प्रेस क्‍लब नहीं है। इसकी बडी वजह यही है कि पत्रकारों के समूह और संगठन आपस में टकराते रहे और सत्‍ता प्रतिष्‍ठान उस टकराहट को प्रोत्‍साहित करते रहे हैं।

मुझे यह देख कर बेहद दुख होता है कि आपकी वेबसाइट पर अधिकांश खबरें पत्रकारों के कथित काले कारनामों को समर्पित रहती हैं। यशवंत जी आप ही बताइए की पत्रकारों के एक चुनिंदा समूह को छोड कर (जो स्‍वतंत्र पत्रकार, रिपोर्टर या वरिष्‍ठ पद पर आसीन व्‍यक्ति है) उन पत्रकारों के पास काले कारनामों के लिए भी कहां समय है जो किसी मिल मजदूर की तरह सुबह 11 बजे दफ्तर में प्रवेश करते हैं तो फिर रात दो बजे ही वहां से निकलते हैं।

मैं इस बात से भी बेहद आहत होता हूं कि इस वेबसाइट पर अपवादस्‍वरूप ही हिंदी पत्रकारों की एकजुटता से जुडी खबरें नजर आती हैं। एक सामान्‍य पत्रकार जब डेटलाइन के दानव से जूझते जूझते गंभीर बीमारियों की चपेट में आता है तो न तो राजनेता उसकी मदद के लिए आगे आते हैं और न ही हमारे कथित स्‍वनामधन्‍य पत्रकार संगठन। चाहे तो प्रयोग करके देख लीजिए। उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश या बिहार के किसी पत्रकार की बीमारी से जुडा कोई समाचार यहां प्रकाशित करते हुए आप इन तीनों राज्‍यों के पत्रकारों से मुक्‍त हस्‍त से सहायता उपलब्‍ध कराने की अपील करिए और देखिए कितने पत्रकार सहायता के लिए आगे आते हैं। अगर इन तीनों राज्‍यों के एक हजार हिंदी भाषी पत्रकार सौ सौ रूपए भी मुहैया कराते हैं तो एक सम्‍मानित राशि एकत्र हो सकती है। लेकिन क्‍या ऐसी स्थितियां हैं?

मेरा आपसे निवेदन है कि पत्रकारों के ही जरिए पत्रकारों को कोसने और गाली देने की प्रवृत्ति को बढावा मत दीजिए इससे किसी का भला नहीं होने वाला है। इतिहास से बढा तटस्‍थ मूल्‍यांकनकर्ता कोई नहीं है और उसका कूडेदान भी बहुत बडा है। इसी मध्‍यप्रदेश ने स्‍व राजेंद्र माथुर प्रभाष जोशी और कई अन्‍य दिग्‍गज पत्रकार दिए हैं। कोई कितना भी पैसा बना ले या स्‍वयं को प्रतिभाशाली माने और स्‍वयं भू संगठनों से इसकी घोषणा भी करवा ले लेकिन स्‍व माथुर और जोशी जैसा बनने के लिए उनके रास्‍ते पर चलना ही होगा इसके अलावा दूसरा कोई विकल्‍प नहीं है।

आपके इस लोकप्रिय मंच के माध्‍यम से मैं अपने सभी पत्रकार मित्रों से अपील करता हूं कि समाज की गंदगी और खामियों को उजागर करना हमारा काम है लेकिन अगर हम एक दूसरे पर ही कीचड उछालने में जुट जाएंगे तो इस पेशे की गरिमा और सम्‍मान का रसातल में जाना तय है। प्रकृति की अपनी एक न्‍याय व्‍यवस्‍था है। गलत करने वाला हमेशा खुद गलती के बोध और गिल्‍टी से भरा रहता है। शेक्‍सपीयर का सारा साहित्‍य ही इसी पर केंद्रित है। स्‍व हबीब तनवीर एक नाटक “ देख रहे हैं नैन ”

भी इसी सत्‍य को उजागर करता है। सत्‍य के साथ रहते हुए प्रकृति और समाज की दंड देने की व्‍यवस्‍था पर विश्‍वास करना ही उचित है। अगर हम ही खुद ही न्‍यायाधीश और अभियोजन पक्ष के वकील बन कर एक दूसरे को कटघरे में खडा करते रहेंगे तो हालात क्‍या होंगे इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

एक पत्रकार

भोपाल

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0 Comments

  1. vineet kumar gkp (09936809770)

    April 21, 2010 at 7:57 am

    aaj ke samy main.Patrkar imandar ho hi nain sakat.;) koiya ki senior Patrkar usea imandar rahayina hi nahi danga

  2. aashish

    April 21, 2010 at 6:37 am

    aapki baat 100% saty hai….gambhirta se is hetu kary kiya jaye to imandar / karmath patrkaro ka bhala ho sakta hai…..yasvant ji aa apne blog mai….clobe member ke jariye…..sadysta prarambh kar sakte hai….ek acche amt. collect ho sakta hai…jo zarurat mand patrkar sathiyo ke liye kkam aayega….acche kam ki suruaat mai kathinaayi to aayegi par pahal to honi cahiye.

  3. tarun

    April 21, 2010 at 7:06 am

    NAHI SAHEB,
    AAJ KE DAUR ME YE BAAT HAJAM NAHI HUE KE PTRKAR JAYADATAR IMANDAR HAIN SORRY.

  4. ashutosh bajpai

    April 21, 2010 at 7:48 am

    aap ki bat sahi hai magar aatmchintan jaroori hai
    ashutosh bajpai[url][/url]

  5. pradeept mishra

    April 21, 2010 at 9:34 am

    aapki baat galat hai !kyuki mai janta hu ki patrkaar imandar hote hai bas aapki najriya galat hai dekheto 100me 92 hote hai par 8% to imandar hote hai nahi to aap sarve kara le …………………..par aap sarve kyu karayege aap ki to niyat me hi aishe sawal aate hai ki ……………………..ram bhajo ram

  6. Rakesh bhartiya

    April 21, 2010 at 12:00 pm

    bilkul satey hai bhai immandar patrlkarno ki kami aaj bhi nahi hai lakin unki immandari per bhi bhiman sabsey jyada ungli uttatey hai
    RAKESH BHARTIYA AUSTRAILA

  7. rajiv

    April 21, 2010 at 2:09 pm

    Glass adha bhara hai mera bhai.

  8. Govind Badone Biaora M.P. Navabharat

    April 21, 2010 at 6:47 pm

    patrakarita Ko wo Log badnam Kar rahe He Jo kalam Ka Upyog Samaj Ke Liye Nahi blackmeling Ke Liye IsMe aye He. Write Of Information Ka Drupyog Yahi Log Kar Rahe He. Aase Patrakaro Ko Benakab Kar Imandar Patrakaoro Ko Man Samman Milna Chahye..

  9. ajay sharma

    April 22, 2010 at 6:45 am

    ये तो वोही बात हुई मीठा-मीठा, गप-गप और कडवा-कडवा,थू और हां “ज्यादातर पत्रकार आज भी ईमानदार हे” का क्या मतलब हे क्या पत्रकार का ईमानदार होना कोई अनोखी बात हो गई हे और भेड़ की खाल ओड़ कर जो भेड़िये इस पवित्र पेशे को दलाली में बदल रहे हे, यदि कोई उनकी खाल खीच रहा हे तो श्रीमान ईमानदार आप क्यों इतना परेशान हे की अपने ईमानदार साथियों के समर्थन में भासन लिख रहे हे वो भी अपना नाम छुपा कर क्या बात हे.

  10. mayank

    April 23, 2010 at 2:51 pm

    sahi kaha aaj bi repoter imandar ha lekin channel ko ye pasand ni hota na hi paper ko

  11. ruby

    April 28, 2010 at 9:15 am

    patrkarita aur imandari aaj ye ajib sa talmel lagta hai.abb to log patrakarita karte hi paise kamane ke liye hai.kyuki is ane vali paudh ne imandar patrkar dekhe hi kaha hai.jisne dekha vo imandar hai kyuki jisne shuru se shahad kahai ho use chini ka swad rass nai ata.par ye baat hai ki beimaan hona sab ke bus ki baat nai hai.kyu ki imandar ko pralobhn apni tauheen lagti hai

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