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दुख-दर्द

”मना करने के बावजूद पहाड़ी पर चढ़े बाबा”

दैनिक हिंदुस्तान, वाराणसी के प्रमुख संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार सुशील त्रिपाठी जिस पत्रकारीय मिशन पर बनारस के चकिया-नौगढ़ इलाके गए थे, उसी मिशन पर उनके साथ-साथ थे उनके शिष्य और दैनिक हिंदुस्तान, वाराणसी के रिपोर्टर संदीप त्रिपाठी। संदीप ने अपने ब्लाग जिय रजा बनारस पर एक पोस्ट डाली हुई है। ये पोस्ट उन क्षणों में लिखी गई जब सुशील जी जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे। संदीप ने इस पोस्ट में सुशील जी को एक जगह बाबा कहकर संबोधित किया है। उन्हें पूर्वांचल के सैकड़ों पत्रकारों का गुरु बताया है। इससे जाहिर होता है कि सुशील जी भेड़चाल वाली पत्रकारिता और पत्रकारों के हिस्से नहीं थी। वे वाकई बाबा थे। संदीप ने ब्लाग पर  जो कुछ लिखा है उससे कई नई जानकारियां पता चलती हैं। सुशील के ब्लाग से साभार वो पोस्ट यहां प्रकाशित की जा रही है-

दैनिक हिंदुस्तान, वाराणसी के प्रमुख संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार सुशील त्रिपाठी जिस पत्रकारीय मिशन पर बनारस के चकिया-नौगढ़ इलाके गए थे, उसी मिशन पर उनके साथ-साथ थे उनके शिष्य और दैनिक हिंदुस्तान, वाराणसी के रिपोर्टर संदीप त्रिपाठी। संदीप ने अपने ब्लाग जिय रजा बनारस पर एक पोस्ट डाली हुई है। ये पोस्ट उन क्षणों में लिखी गई जब सुशील जी जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे। संदीप ने इस पोस्ट में सुशील जी को एक जगह बाबा कहकर संबोधित किया है। उन्हें पूर्वांचल के सैकड़ों पत्रकारों का गुरु बताया है। इससे जाहिर होता है कि सुशील जी भेड़चाल वाली पत्रकारिता और पत्रकारों के हिस्से नहीं थी। वे वाकई बाबा थे। संदीप ने ब्लाग पर  जो कुछ लिखा है उससे कई नई जानकारियां पता चलती हैं। सुशील के ब्लाग से साभार वो पोस्ट यहां प्रकाशित की जा रही है-

हिन्दुस्तान, वाराणसी के प्रमुख संवाददाता और पूर्वांचल के या पूर्वांचल से बाहर गये अधिकांश पत्रकारों के गुरु सुशील त्रिपाठी जी 30 सितंबर को चंदौली जिले में दुर्घटनाग्रस्त हो गये. वे दुर्घटना के बाद से लगातार बीएचयू के आईसीयू में वेन्टीलेटर पर हैं. डाक्टर उनकी हालत 3 अक्टूबर रात तक स्थिर बता रहे थे. दुर्घटना के वक्त मैं उनसे करीब एक किमी दूर दूसरी पहाड़ी पर था. उनके साथ मौजूद लोगों ने दुर्घटना के बारे में बताया कि वे अपना काम खत्म करके नीचे उतर रहे थे. कुछ दूर उतरने के बाद उन्होंने एक चट्टान पर पहला पैर रखा और दूसरा पैर रखते वक्त पहला पैर फिसल गया. उस वक्त उनके साथ 10 से 15 स्थानीय लोग थे. वे सुशील जी का हाथ थामते, इससे पहले ही वे लुढकते हुए नीचे खाई में जा गिरे.

sushil tripathiस्थानीय लड़के नीचे दौड़े, तब तक सुशील जी बेहोश हो चुके थे. उनके ललाट से खून बह रहा था. लोगों ने उन्हें उठा कर नीचे लाना चाहा लेकिन यह सम्भव नहीं हुआ. तब पास के गांव से चारपाई मंगाई गयी. उस पर उन्हें लिटा कर नीचे लाया गया. हमें सूचना हुई. मेरे साथ भी 10 स्थानीय लोग थे. हम लोग पहाड़ी से उतरकर नीचे आये. उन्हें कार में लादा गया और चकिया स्वास्थ्य केंद्र ले आये. उनकी नब्ज बहुत धीमी चल रही थी. सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी. वहां डाक्टरों ने उनका प्राथमिक उपचार किया. इस बीच उनके जानने वालों को खबर हो चुकी थी, लगातार सभी के फोन आ रहे थे. फिर अम्बुलेन्स की व्यवस्था कर उन्हें बीएचयू लाया गया.

फिलहाल डाक्टर लगे हुए हैं. 72 घंटे बीत चुके हैं. नब्ज आज शाम थोड़ी ठीक होने की सूचना है. चूंकि डाक्टर होठ सिले हुए हैं, इसलिये किसी सूचना को पुष्ट नहीं कहा जा सकता. फिलहाल लोग दुआएं करते हुए उनके ठीक होने का इन्तजार कर रहे हैं.

दुर्घटना के बाद सुशील जी को उस स्थिति में देखना बहुत ही कठिन था, वह भी उस स्थिति में उन्हें लेकर चकिया से वाराणसी तक का सफर कैसे गुजरा, यह याद भी करना बहुत ही पीड़ादायक है. दो दिन तक तो वही चेहरा दिल-दिमाग पर छा कर पतझड की दोपहरिया जैसा आभाष देता रहा.

मैं थोडा स्वस्थ हुआ तो यही ख्याल आया कि सबसे पहले वह रिपोर्ट लिखनी चाहिए जिसके लिए बाबा मना करने के बावजूद पहाड़ी पर चढे. ये रिपोर्ट घुरहूपुर की पहाडियों पर महात्मा बुद्ध के पदचिन्ह होने से संबंधित रिपोर्ट है. यह सुशील त्रिपाठी जी की ड्रीम रिपोर्ट है. इस सिलसिले मे पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट जल्द ही ब्लाग पर दी जायेगी. 


वरिष्ठ पत्रकार सुशील त्रिपाठी से जुड़ा कोई संस्मरण या तस्वीर अगर आपके पास हो तो आप भड़ास4मीडिया पर प्रकाशन के लिए [email protected] पर भेज सकते हैं।

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