जब नया नया कोई आता है तो मन ही मन मुस्काता है
कंपनी ये बड़ी भारी है लोग कहते है सरकारी है
ऐश यहाँ पर खुल्ली है, काम बहुत मामूली है
पर जब सच से टकराता है, सर उसका चकराता है
जनता यहाँ निराली है सारे रंगों वाली है
बारह बजे कुछ आते है कुछ ६ बजे ही जाते है
कुछ की लाइफ ऑफिस मे ही कटने वाली है
क्यूंकि न घर है न घर वाली है
यहाँ पांच पॉइंट पर रेटिंग है
कुछ असली है कुछ सेटिंग है
शो-ऑफ़ का यहां पर बहुत बड़ा है खेल
थोड़ा सा काम करो और सबको भेजो मेल
प्रोजेक्ट से रोजी रोटी है पर गगरी थोडी छोटी है
प्रोजेक्ट लेने जाते है कुछ मिलते है कुछ रह जाते है
केवल क्लाइंट है जो हमको नचाता है,
उसको खुश करने मे अपने बाप का क्या जाता है.
क्यूंकि केवल क्लाइंट है जो हमारी रोज़ी रोटी चलाता है
पैसा तो मोह माया है, कंही धूप कंही छाया है
काम मी मर्जी दिल की है, तनखा तो चूहे के बिल सी है
कुछ मृग मरीचिका मे फँस जाते हैं, कुछ निकल मोक्ष को पाते हैं
अपने पे आंखे मूँद के दूसरे की गलती देख,
दूसरे की भैस पे जोर से लाठी टेक
दूसरे की गलतियाँ बॉस को बता,
शाबासी के साथ मे इनाम भी शायद पा
कैसे भी उल्लू सीधा कर वीसा लेकर भाग
कब तक सोया रहेगा अब तू मूर्ख जाग
लगा हुआ है यह संपर्को का जाला
सफल वही है जिसने कोई लिंक निकाला
काम का नाटक कर मचा नही कुछ शोर,
तेरे अंधियारे गाव में कभी तो होगी भोर।
माला ये पुरी हुई मनका एक सौ आठ,
मोक्ष को पाए वही नित्य करे जो पाठ।
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-पंकज राजपूत
(सुमित के ब्लाग से साभार)











