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पत्रकारिता की काली कोठरी से (5)

Alok Nandanभाग (1),  (2), (3)(4) से आगे…. 

पत्रकारिता के दुर्ग दिल्ली में प्रवेश

दुनिया का प्रत्येक महानगर अपने तरीके से सांस लेता है। महानगर की अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही वहां रहने वाले लोगों को भी सांसें लेनी पड़ती है। दिल्ली के प्लेटफॉर्म से बाहर निकलते ही महानगर की फिजा में फैली काली हवाओं ने मेरे फेफड़े को जकड़ लिया। सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां धुएं के रूप में जहर उगल रही थीं। इन गाड़ियों की रफ्तार, चौड़ी व चिकनी सड़कों को देख मैं रोमांचित था।

Alok Nandanभाग (1),  (2), (3)(4) से आगे…. 

पत्रकारिता के दुर्ग दिल्ली में प्रवेश

दुनिया का प्रत्येक महानगर अपने तरीके से सांस लेता है। महानगर की अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही वहां रहने वाले लोगों को भी सांसें लेनी पड़ती है। दिल्ली के प्लेटफॉर्म से बाहर निकलते ही महानगर की फिजा में फैली काली हवाओं ने मेरे फेफड़े को जकड़ लिया। सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां धुएं के रूप में जहर उगल रही थीं। इन गाड़ियों की रफ्तार, चौड़ी व चिकनी सड़कों को देख मैं रोमांचित था।

बड़े-बड़े होर्डिंग महानगर के चमक-दमक को बता रहे थे। जामिया मिलिया इस्लामिया  के पास स्थित मनूराम का एक टूटा-फूटा कमरा मेरा इंतजार कर रहा था। दिल्ली के लिए रवाना होते वक्त थैले में मैंने मनपसंद किताबों को समेट लिया था। मेरा कमरा तीसरे मंजिल पर था। मेरे कमरे में न तो सूरज की रोशनी आती थी, न ही हवा। सभी कमरों का यही हाल था। एक रात जोरदार बारिश हुई। मैं छत से टपकते हुए पानी से किताबों को बचाने में पूरी रात लगा रहा। देश की राजधानी में मेरे लिए जिंदगी आसान न थी। लेकिन मैंने पत्रकारिता के इस दुर्ग में प्रवेश करने की ठान ली थी।  

मैं एक माह तक दिल्ली में पैदल भटकता रहा। किसी भी नगर को समझने के लिए यह जरूरी है कि आप जूते ज्यादा से ज्यादा घिसें। दिन भर भटकने के बाद शाम को मंडी हाउस पहुंचता। शाम के वक्त कलाकारों का झुंड लगा रहता था। कटिंग चाय के साथ वे तमाम की तरह की बातें करते थे, लेकिन उनकी बातों में कहीं वह उंचाई नहीं दिखती थी जिसकी उम्मीद मुझे दिल्ली से थी।

मनुराम के मकान से मैं जल्द से जल्द मुक्ति पाना चाहता था क्योंकि वहां सुबह-सुबह की टॉयलेट के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता था। मंडी हाउस में लगातार घुमकड़ी करने के दौरान मुझे पता चला कि एनएसडी के छात्रों के लिए हॉस्टल की अच्छी व्यवस्था है। मेरे दिमाग में आया कि क्यों न एनएसडी में एडमिशन ले लिया जाए। कम से कम रहने-खाने की समस्या से मुक्ति मिलेगी।

उस वक्त एनएसडी अपने नए सत्र की तैयारी में था। एनएसडी जाकर पूछताछ की तो पता चला कि नामांकन के लिए कई शर्तें हैं। एक शर्त यह भी कि दस नाटकों में काम करने का अनुभव होना चाहिए। अन्य सभी क्राइटेरिया पर मैं फिट था, पर एक भी नाटक में काम करने का अनुभव नहीं था। रामगोपाल बजाज एनएसडी के निदेशक थे। मैंने उनसे मिलने की कोशिश की, लेकिन एक कर्मचारी ने मुझे रोक दिया। मैंने उससे कहा कि नामांकन के लिए दस नाटकों में काम करने का लफड़ा ठीक नहीं। क्या कालीदास ने दस नाटकों में काम करने के बाद महान नाटकों की रचना की थी? वह मेरी एक नहीं सुना।

उसी वक्त रामगोपाल बजाज दिख गये। जब मैं उनसे जिरह करने लगा तो, वह बिदक गये। वहां पर खड़े उस कर्मचारी ने कहा कि आप यहां की नीतियों के खिलाफ है तो बाहर जाकर प्रदर्शन कीजिये, यहां बवाल करने से कोई फायदा नहीं होने वाला है। मैंने कहा, ‘मैं गांधी जी नहीं हूं, जो धरना और प्रदर्शन किया करते थे। यह मेरा नहीं एनएसडी का दुर्भाग्य है कि उसने नामांकन के लिए बे-सिर-पैर के नियम बना रखे हैं।’

दस नाटकों के लफड़े के कारण एनएसडी में घुसने का मेरा मार्ग बंद हो गया था। वैसे भी दिल्ली मैं नाटक करने नहीं आया था। अपना लक्ष्य था पत्रकारिता के मार्ग पर आगे बढ़ना। एनएसडी से निकलने के बाद मेरी मुलाकात सतीश जी से हुई। उस वक्त वह श्रीराम सेंटर के निदेशक थे। उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा। जानना चाहा कि मैं यहां करने क्या आया हूं। मैंने बताया कि मैं सिर्फ पत्रकारिता करने आया हूं। उन्होंने किसी अखबार को ज्वाइन करने की सलाह दी। उनकी बात मेरे भेजे में घुसी। अगले दिन से मैं किसी अखबार में घुसने की रणनीति बनाने लगा।

इसी दौरान पटना में मेरे साथ पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाला मनीष सिन्हा मुझसे मिलने आया। उस वक्त वह कई अखबारों के लिए एक फ्रीलांसर के तौर पर काम कर रहा था, दिल्ली में पत्रकारिता की कलाबाजियों से कुछ-कुछ परिचित हो चुका था। जब मैंने उसे बताया कि मैं कोई अखबार ज्वाइन करना चाहता हूं तो वह मेरी मदद करने के लिए सहर्ष तैयार हो गया। पार्ट टाइम पत्रकार के रूप में वह वीर अर्जुन को भी अपनी सेवा दे रहा था। उसने मेरी मुलाकात वीर अर्जुन का कार्यभार देख रहे सदानंद पांडे से करा दी।

सदानंद पांडे ने मुझे खेल पर छपी एक अंग्रेजी पत्रिका का कतरन दिया और उसका अनुवाद करने को कहा। मैंने धड़ा-धड़ अनुवाद कर दिये और उन्होंने मुझे अपने यहां रख लिया। मुझे रिपोर्टिंग पर लगाया गया। प्रत्येक दिन एक खबर देनी होती थी। मैं सुबह घर से निकलता और दिनभर दिल्ली की सड़कों को छानते हुये शाम को वीर अर्जुन के ऑफिस में बैठकर एक खबर लिखता और चलता बनता। मैं खबर अक्सर सड़कों से उठाता था, जिसके कारण दिल्ली के आमलोगों के बीच मेरी पैठ तेजी से बनती जा रही थी। ऑटोवाले मुझे रोक-रोकर खबरें देते थे, और मेरी पूरी कोशिश होती थी कि उन खबरों को मैं कवर करूं। 

करीब ढेड़ महीने तक लगातार खबरे लिखने के बाद मेरा पब्लिक नेटवर्क मजबूत हो गया था। रिपोर्टिंग में पूरा कॉन्फिडेंस आने के बाद डेस्क पर भी काम करने की इच्छा होने लगी थी। पत्रकारिता के इस फ्रंट पर भी मैं अपने आप को मजबूत कर लेना चाहता था। मैंने अपनी बात सदानंद पांडे को बताई। उन्होंने मुझे यह कहते हुए कि लोग फील्ड में काम करने को उतावला रहते हैं, तुम ऑफिस में बैठकर काम करना चाहते हो, डेस्क पर लगा दिया।  

वीर अर्जुन की कार्यप्रणाली बहुत ही पारंपरिक थी। घर्र-घर्र की आवाज के साथ एजेंसी का प्रिंटर चलता रहता। उससे खबरें लगातार निकलते रहती थीं। एक राउंड डेस्क के चारों ओर बैठे लोग बीड़ियां फूंकते, गुटका चबाते और चाय की चुस्कियां लेते खुर्राट मशीन से निकल रहे कागज को लगातार फाड़ते। उस पर कलम चलाते। मुझे अंग्रेजी अखबारों का कतरन दे दिया जाता था। इन्हें देखने के बाद मैं उन्हें अपने तरीके से लिख मारता। उन लोगों के बीच आपसी बातचीत की भाषा काफी जीवंत होती थी। वीर अर्जुन के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में इन लोगों ने मुझे स्वीकार लिया था। अखबार की ओर से कोई पहचान पत्र नहीं मिला था। यह पूरी तरह से कच्ची नौकरी थी। मैं इससे खुश था। हर वक्त मुझे स्वतंत्र होने का अहसाह होता।  

अखबार के सभी लोग सदानंद पांडे से बुरी तरह से डरते थे। पीठ पीछे उनके विषय में उल्टा-सीधा कहने से भी नहीं चूकते। वहां काम करने के दौरान पता चला कि मेरे यहां आने से पहले लोगों ने प्रबंधन के खिलाफ हड़ताल किया था। अखबार तालाबंदी के कगार पर पहुंच गया था। सदानंद पांडे ने बड़ी मजबूती से अखबार को संभाला था। इससे अखबार के संपादक और मालिक अनिल नरेंद्र का भरोसा उन्होंने जीत लिया था। अखबार के संपादकीय विभाग पर सदानंद पांडे की जोरदार पकड़ थी। वहां काम करने वाले लोगों को अपने तरीके से हांकते हुये अखबार को संभालने में लगे थे। उनके अंदर काम करने की अदभुत क्षमता थी। घंटों बिना थके काम करते रहते। सभी लोगों पर पैनी नजर भी रखते। वह लोगों पर काबू पाने की कला जानते थे।  

उस अखबार में लिखने की मुझे पूरी स्वतंत्रता मिली हुई थी। संपादकीय पेज पर भी मैं धावा मार चुका था। हिटलर से संबंधित एक आलेख को पढ़ने के बाद संपादक अनिल नरेंद्र भी मेरी लेखनी को पसंद करने लगे थे। वह अक्सर अपने चैंबर में मुझे बुलाते थे और हिलटर से संबंधित सामग्री नेट से निकाल कर मुझे देते हुये कहते, ‘इन्हें भी पढ़ो’। अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में मेरी रूचि को देखते हुए सदानंद पांडे मुझसे अंतरराष्ट्रीय खबरें ही बनवाते। ओसामा बिन लादेन अमेरिका के कई ठिकानों पर हमला कर कुख्यात हो चुका था। लादेन से संबंधित प्रत्येक स्टोरी में मैं खास रुचि लेता। सदानंद पांडे इस बात को ताड़ गए। मुझे अक्सर लादेन कह कर बुलाते थे।

अनिल नरेंद्र भी मेरे साथ अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर चर्चा करते थे। उनके पास दुनियाभर से बहुत सारे पैकेट आते। वे सभी पैकेट पांडे जी को देते या फिर मुझे। मैं उन्हें घर लाकर पढ़ता। ईरान और पाकिस्तान के पैकेटों में भरपूर मैटर होता। इंग्लैंड और अमेरिका के पैकेटों में रुटीन की बातें होतीं। रोचक कंटेट के कारण ईरान वाले पैकेट मुझे आकर्षित करते। उनमें ईरान के इस्लामिक शासन के खिलाफ बहुत कुछ होता। मेरे आक्रामक तेवर और स्वतंत्र प्रवृत्ति के कारण अनिल नरेंद्र मुझे पसंद करते थे। किसी भी विषय पर खुले तौर पर अपनी बात रखने के लिए मैं भी उन्हें चाहने लगा था।

एक दिन काम समाप्त करके जब निकलने लगा तो सदानंद पांडे ने मुझे रोक लिया। उन्होंने मुझसे कहा कि अनिल नरेंद्र ने अमेरिकी राजदूत का इंटरव्यू किया है। पूरा इंटरव्यू एक टेप में है। इसे हिंदी में लिखना है। अंग्रेजी में किये पूरे इंटरव्यू को टेप से सुनकर हिंदी में लाना चुनौती भरा काम था। कम से कम मेरे लिए तो था ही। मैंने यह काम  पहले कभी नहीं किया था।

मैंने पांडे जी को कहा कि जब तक मैं टेप को नहीं सुनता, तब तक कुछ नहीं कह सकता। पहली बार टेप को सुनने के दौरान कुछ पल्ले नहीं पड़ा। अमेरिकी टोन वाली अंग्रेजी थी। लगातार दो तीन बार उसे सुना तो लगा कि मैं यह काम कर लूंगा। मेरा कॉन्फिडेंस देख पांडे जी ने इंटरव्यू को हिंदी में तब्दील करने की इजाजत दे दी। चार घंटे के अथक मेहनत के बाद पूरे इंटरव्यू को हिंदी में समेटने में सफल हुआ। वह इंटरव्यू वीर अर्जुन में दो भागों में छपा। अनिल नरेंद्र ने मेरे काम को खूब पसंद किया। बहुत जल्द इसका पुरस्कार उन्होंने मुझे अपने तरीके से दिया।   

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी किसी जमाने में वीर अर्जुन में उप-संपादक के तौर पर काम कर चुके थे। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकारी गलियारों में वीर अर्जुन की धमक बढ़ना स्वाभाविक था। अटल बिहारी वाजपेयी के हर विदेशी कार्यक्रम में वीर अर्जुन का प्रतिनिधि शामिल होता रहता था। अटल बिहारी के मलेशिया दौरे में अनिल नरेंद्र उनके साथ थे। वहां से लौटने के बाद उन्होंने मुझे अपने चैम्बर में बुलाया और चमड़े का एक खूबसूरत पर्स देते हुये कहा, ‘मलेशिया दौरे के दौरान यह पर्स अटल बिहारी वाजपेयी ने मुझे दिया था। मैं तुम्हे दे रहा हूं।’ अनिल नरेंद्र के हाथ से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का पर्स लेते हुये मुझे अच्छा लगा था। 

अनिल नरेंद्र आधुनिक स्टाईल वाले व्यक्ति थे। यह उनके रहन-सहन और बाडी लैंग्वेज से झलकता था। सड़क पर गाड़ी चलाते हुये जब भी उनकी नजर मुझ पर पड़ती तो एक खास अंदाज में मेरे सलाम का जवाब सैल्यूट से देते थे। उनके इस अंदाज पर मैं भी मुस्कराये बिना नहीं रह पाता। वो मुझे लेकर फिक्रमंद भी रहते थे। वीर अर्जुन में आंखों को चेक करने के लिए एक कैंप लगा था। जब मैंने अपनी आंखे चेक कराई तो डॉक्टर ने तत्काल चश्मा लगाने की सलाह दे दी। चश्मा खरीदने के लिए उस वक्त मेरे पास पैसे नहीं थे। जब इस बात जानकारी अनिल नरेंद्र को हुई तो उन्होंने मुझे बुलाकर अपनी मन पसंद फ्रेम खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे दिये। कुछ दिन बाद जब मैं उनका पैसा लौटाने गया तो उन्होंने हंसते हुये मुझे झिड़की दी।  

सदानंद पांडे का रवैया भी मेरे प्रति काफी सहयोगात्मक था, हालांकि वह कभी-कभी बुरी तरह से झुंझला जाते थे। पता नहीं चलता था कि वे किस बात पर झुंझला रहे हैं। प्रशासनिक हलकों में उनकी बहुत ही अच्छी पकड़ थी। खबरों के माध्यम से प्रशासनिक अधिकारियों को नियंत्रित करने की कला वह खूब जानते थे। किसी बात पर अटल बिहारी वाजपेयी के खासमखास ब्रजेश मिश्रा और अनिल नरेंद्र के बीच मनमुटाव हो गया था।

ब्रजेश मिश्रा को सबक सिखाने की जिम्मेदारी सदानंद पांडे को सौंपी गई। सदानंद ने मुझे बुलाकर कहा कि ब्रजेश मिश्रा के खिलाफ जो कुछ भी लिख सकते हो, लिखो। हालांकि उस वक्त मुझे इस मनमुटाव के विषय में जानकारी नहीं थी। मैं ब्रजेश मिश्रा की हर गतिविधि पर पैनी नजर रखता। उनके हर काम को आलोचनात्मक नजरिये से देखता और लिखता। यह सिलसिला लगातार तीन दिन तक चलता रहा। चौथे दिन सदानंद पांडे ने मुझे बुलाया और कहा कि अब बस करो, मिश्रा जी लाइन पर आ गये हैं।

सदानंद पांडे अब मुझे प्रशासनिक हलकों में भी धकेलने लगे थे। वह महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारियों के पास मुझे सीधे भेजने लगे थे। उन पर खबरें लिखने को कहते। उन दिनों मैं लंबी-लंबी दाढ़ी और बाल रखा करता था। एक बार शाम को सात बजे उन्होंने मुझे कहा कि तिहाड़ चले जाओ, जेल के अंदर कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहा है। उसे कवर करो। मैं तिहाड़ पहुंचा और जेल नंबर चार के अंदर दाखिला हुआ। पहुंचने में कुछ देरी हो गई थी, कार्यक्रम जारी था।

स्टेज के बगल में लगे एक खाली कुर्सी पर जाकर मैं बैठ गया। कार्यक्रम चलता रहा और मेरे बगल में बैठा एक व्यक्ति मुझे घूर-घूर कर देखता रहा। जेल के बहुत सारे कैदी मंच के सामने बैठकर सोनल मान सिंह के नृत्य का आनंद उठा रहे थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद जेल के एक अधिकारी ने मेरा परिचय अपने बगल में बैठे व्यक्ति से कराया। वह तिहाड़ जेल के मुख्य जेलर थे। उन्होंने हंसते हुये कहा, ‘इतनी देर से मैं यही समझ रहा था कि मेरे बगल में कोई कैदी बैठा हुआ है।’ बाद में खाने के दौरान इस बात की चर्चा उन्होंने सोनल मान सिंह से भी। सोनल मान सिंह ने कहा, ‘इसके दाढ़ी और बाल भले ही बढ़े हुये हैं लेकिन चेहरा सॉफ्ट है।’

इस तरह पांडे जी के कारण प्रशासनिक हल्कों में मेरी मजबूत उपस्थिति दर्ज होते जा रही थी।  केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में भी मेरा आना-जाना शुरू हो गया था।


पत्रकार आलोक नंदन मीडिया को टाटा बाय बाय बोल चुके हैं। वे इन दिनों मुंबई में फिल्म उद्योग से जुड़े हैं। अपने पत्रकारीय अनुभवों का साझा भड़ास4मीडिया के पाठकों से कर रहे हैं। छठें पार्ट के लिए अगले रविवार तक इंतजार करें। आप आलोक से [email protected] के जरिए संपर्क कर सकते हैं।

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