: पुलिस की आधी अधूरी जानकारी से नाराज हैं : दिल्ली पुलिस आपके लिए आपके साथ का नारा देने वाली दिल्ली पुलिस को शायद इसका मतलब शायद पता नही है।तभी तो आए दिन दिल्ली पुलिस की कारस्तानी अखबारों में छपती रहती है। दिल्ली पुलिस आम जनता की मदद तो दूर समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को भी अपने सामने कुछ नही समझती है।
ऐसे ही एक घटना के तहत एक पत्रकार ने दिल्ली पुलिस की वास्तविकता देखी। तात्कालिक हिन्दी पत्रिका भारतीय पक्ष के पत्रकार राजीव कुमार पिछले कई साल से उत्तम नगर के संपत्ति संख्या ए-20 सुभाष पार्क में किराये पर अपने परिवार के साथ रह रहे थे। 22/10/2009 को राजीव के मकान मालिक सुरेश ने राजीव से जानबूझकर नशे में धुत्त होकर फसाद किया व उन्हें घर से निकालकर उनकी पत्नी शिल्पी और एक साल के पुत्र आकाश को बंधक बना लिया। राजीव ने अंत में 100 नंबर पर फोन किया।
पीसीआर की गाड़ी आई, राजीव की मदद करने को कौन कहे उल्टे उन्हें डांटने-फटकारने लगी। राजीव ने मिन्नतें की कि मेरे बच्चे व पत्नी की जान खतरे में है। इस पर भी पुलिस वालों का दिल नही पसीजा। वे पुलिसिया रौब दिखाना शुरू कर दिया। इन दोनों में प्रधान सिपाही सिब्बल चन्द्र जिसका बेल्ट नंबर 134 पी.सी.आर. है ने डांटते-फटकारते हुए कहा कि हम क्या करें तुम्हारे पत्नी और बच्चे की जान खतरे में है अगर यह मकान मालिक हमारा सर फोड़ दे तो तब क्या होगा और जो दूसरा प्रधान सिपाही भगवान सिंह जिसका बेल्ट नंबर 6309 पी.सी.आर. है वो घटना स्थल पर आया ही नही वह वहीं तिराहे पर वैन लगाकर वहां की रौनक देखने में व्यस्त था. अंत में ये दोनों पुलिसिया रौब झाड़ते हुए चले गये. सनद रहे कि इन दोनों पुलिसवालों का नाम और बेल्ट नंबर आर.टी.आई. के तहत पता चला है. बाद में थाना बिन्दापुर से एएसआई राजेन्द्र सिंह आया। वह पत्रकार राजीव कुमार को न्याय दिलाने के बजाय उन्हीं पर भड़क उठा।
राजीव ने खुद को पत्रकार बताते हुए, एएसआई को सारा मामला समझाते हुए उससे अनुरोध किया कि वह उनकी पत्नी व पुत्र को मकान मालिक सुरेश के बंधक से छुड़ाए। राजेन्द्र सिंह ने पत्रकार राजीव कुमार से काफी बत्तमीजी से उसका परिचय पत्र मांगा। राजीव कुमार द्वारा परिचयपत्र देने के बाद भी राजेन्द्र सिंह ने उससे काफी अभद्रता से बात की और परिचयपत्र को अपने जेब में रख लिया। राजीव ने कई बार परिचयपत्र वापस मांगने के बाद एएसआई ने राजीव को फर्जी पत्रकार के जुर्म में जेल में बंद करने की धमकी देते हुए परिचयपत्र वापस कर दिया। बिन्दापुर थाने का यह बद्जुबान एएसआई लगातार मकान मालिक सुरेश का पक्ष लिये जा रहा था, आखिरकार आस-पास के लोगों ने जब एएसआई पर दबाव बनाया तब जाकर कहीं उसने कुछ मजबूरन करीब 12 घंटे के बाद राजीव की पत्नी और उनके बच्चे को सुरेश के चंगुल से मुक्त कराया। राजीव ने इस पूरे घटना की एफआईआर दर्ज करवानी चाही लेकिन राजेन्द्र सिंह ने कोई भी शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया।
फसाद करने वाले मकान मालिक सुरेश कोई काम-काज नहीं करता है। उसका बस एक मात्र काम शराब, गांजा पीकर अश्लील हरकत करना, गंदी-गंदी गालियां देना है। झगड़े के समय भी सुरेश के पास गांजे की पुड़िया थी लेकिन एएसआई राजेन्द्र सिंह ने राजीव के कहने पर भी उस ओर कोई ध्यान नही दिया। इसके अलावा मकान मालिक सुरेश अपनी भाभी को जलाकर मारने के आरोप में हरियाणा की जेल में सजा भी काट चुका है। आखिरकार राजीव को उनकी पत्नी और बच्चा सकुशल मिल गया लेकिन घर के कुछ अन्य सामान आज तक नही मिल पाये। सामानों में टीवी, सीलिंग फैन, ट्यूबलाइट व अन्य जरूरी दस्तावेज घर में ही रह गया।
राजीव कुमार ने मकान तो बदल लिया किन्तु उनका सामान वापस नही मिला राजीव कुमार ने जब सुरेश से अपना सामान मांगा तो उसने राजीव को धमकी दिया कि यदि उसने अपना सामान वापस मांगा तो वो उसे और उसके परिवार को जान से मरवा देगा। अगर धमकी की शिकायत पुलिस से की तो उसके उपर पचास हजार की चोरी का झूठा आरोप लगवाकर जेल भिजवा देगा। सुरेश की ज्यादती और दिल्ली पुलिस की नाइंसाफी से तंग आकर आखिरकार राजीव ने जनसूचनाधिकार अधिनियम 2005 का उपयोग करते हुए दिल्ली पुलिस से घटना की विस्त्रृत जानकारी मांगी, साथ ही अपनी शिकायत कमिश्नर से कर पुलिस द्वारा उठाए गए कदमों का भी विवरण आरटीआई के तहत मांगा था।
इसके उत्तर में दिल्ली पुलिस कोई सटीक जवाब देने के बजाय गोलमटोल जवाब देकर राजीव को गुमराह करने की पूरी कोशिश की। दिल्ली पुलिस ने सूचना अधिकार के मूल नियमों को ठेंगा दिखाते हुए अधूरा जवाब भेज दिया कि राजीव का कोई भी सामान मकान मालिक के पास नहीं है, उस दिन मकान मालिक से कोई भी झगड़ा नही हुआ था। और मजबूर होकर राजीव ने मामले को केन्द्रीय सूचना आयोग के संज्ञान में लाने हेतु केन्द्रीय सूचना आयुक्त को पत्र भेजा है। उन्हें उम्मीद है कि सूचना आयोग के माध्यम से उन्हें सही जानकारी के साथ न्याय भी मिल सकेगा।












brij sharma
August 30, 2010 at 1:34 pm
पुलिस का यह रवय्या अत्यंत गैरकानूनी और पक्षपात पूर्ण है .वैसे ही दिली की पुलिस अपने निकम्मेपन और भ्रष्ट आचरण के लिए बदनाम है ,
हमारी मांग है की दोषी मालिक से पत्रकार राजीव का सामन फ़ौरन दिलावायाजाये .और सम्बंधित टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की जाए.तथा माकन मालिक के खिलाफ मामला दर्ज किया जाये
Dr. Vishnu Rajgadia
August 30, 2010 at 5:12 pm
I would like to suggest that if you are not satisfied with the information provided by the police, you shall file a First Appeal to the First Appellate Authority. You can move to the CIC after waiting for one month of First Appeal. If you are not going through the process, the CIC may not take up your case
sher singh
August 31, 2010 at 5:55 am
आप केसै पत्रकार हैं? पत्रकार का हथियार उसके पास मौजूद ठोस जानकारियां होती हैं। जिसे वो सबके सामने पेश करके अपराधी को नंगा करता है। आप अपने साथ हूई ज्यादती के दौरान बार-बार पुलिसवालों से मिले ।उन्होंने बार-बार आपको बेईज्जत किया। इस दौरान आप उनकी करतूतों को रिकॉर्ड कर सकते थे। ठोस सबूत पेश करने पर उंच अधिकारी कार्रवाई पर मजबूर होते। याद रखिए मीडिया हर रोज पुलिसवालों की करतूतों की पोल खोलती है ,इसलिए पुलिस मौका मिलने पर किसी भी पत्रकार की ऐसी-तैसी करने में कसर नहीं छोडती।
Rajeev Kr.
August 31, 2010 at 7:57 am
भाई शेर सिंह जी सॉरी मेरे पास रिकॉर्डर नही था और सिर्फ घटनावाले दिन ही पुलिस से मिला था उस समय मेरे दिल में था कि मै किसी प्रकार से अपने पत्नी और बच्चे की जान बचाउं.
Rajeev Kr.
August 31, 2010 at 8:13 am
डा. विष्णु जी सुझाव के लिए धन्यवाद. हम सारे जनसूचनाधिकार के नियमों के तहत ही आगे बढ़े हैं.
vikram srivastava
August 31, 2010 at 3:00 pm
police to thali ki bagen hai . paterkar ke khilaff to wo mamala dudhte hi rahti hai . app samaye ka intgar karo police piaso ke mamale me kachi hoti hai ur muka mile to chodna bhi mat .
Manoj Burnwal
September 1, 2010 at 8:14 am
Rajeev ji,
Aap ne police ka asli roop dikhane ka kaam kar rahe hain. jab police wale ek patrakar ke saath aisa kar sakte hain to aam aadmi ki aukat hi kya hogi. aap apni ladai adhuri mat rakhiyega. hum sab aap ke saath hain. police walon ko sabak sikha kar hi dam ligiyega.
पवन कुमार अरविंद
September 2, 2010 at 6:36 am
इन पुलिसवालों को सबक सिखाना जरूरी हो गया है।
ये जनता के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार करते है।
और नहीं तो केंद्र सरकार पुलिसवालों के लिए ज्यादा अधिकारों की हिमायत कर रही है।
पत्रकार, नई दिल्ली