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बदतमीज बॉस बचा, रिपोर्टर पर गिरी गाज

: अमर उजाला, जम्मू से दो गए : पत्रिका, बेंगलुरु के बदतमीज बास के खिलाफ आवाज उठाने वाली रिपोर्टर शुभम शरण पर ही पत्रिका प्रबंधन ने गाज गिरा दी है. शुभम से इस्तीफा देने को कहा गया है. पिछले दिनों भड़ास4मीडिया पर शुभम शरण द्वारा अपने ग्रुप एडिटर भुवनेश जैन को लिखित पत्र को ”मैं अपने बॉस से परेशान-दुखी हूं, मदद करें” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था.

: अमर उजाला, जम्मू से दो गए : पत्रिका, बेंगलुरु के बदतमीज बास के खिलाफ आवाज उठाने वाली रिपोर्टर शुभम शरण पर ही पत्रिका प्रबंधन ने गाज गिरा दी है. शुभम से इस्तीफा देने को कहा गया है. पिछले दिनों भड़ास4मीडिया पर शुभम शरण द्वारा अपने ग्रुप एडिटर भुवनेश जैन को लिखित पत्र को ”मैं अपने बॉस से परेशान-दुखी हूं, मदद करें” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था.

पत्र प्रकाशित होने के बाद पत्रिका में खलबली मच गई. यह पता किया जाने लगा कि आखिर किस शख्स ने भड़ास4मीडिया के पास पत्र को भेजा. बेंगलुरु में बैठे पत्रिका के मैनेजर एमके तिवारी ने शुभम से पूछा कि क्या उन्होंने भड़ास4मीडिया के पास पत्र भेजा है, तो शुभम ने इनकार किया. एमके तिवारी ने भड़ास4मीडिया को फोन कर पत्र भेजने वाले शख्स के बारे में जानना चाहा पर भड़ास4मीडिया की तरफ से उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई. अंततः गाज शुभम पर गिरा दी गई. उन्हें इस्तीफा देने के लिए कह दिया गया है. शुभम फिलहाल अवकाश पर चल रही हैं. पत्रिका के बेंगलुरु संस्करण के मुखिया तथा स्थानीय संपादकजी के वरदहस्त प्राप्त अमित श्रीवास्तव अब भी संस्थान का हिस्सा बना हुआ है. पत्रिका, बेंगलुरु में काम कर चुके कुछ पत्रकारों ने इस प्रकरण के बारे में भड़ास4मीडिया के पास अपनी टिप्पणियां भेजीं, जो इस प्रकार हैं-

atul chaturvedi : यशवंत जी, जैसा कि आप जानते हैं कि मैं भी राजस्थान पत्रिका का हिस्सा रहा हूं। लेकिन जो अंधेर वहां देखी है, शायद दूसरे संस्थानों में हो। मिस्टर अमित श्रीवास्तव शुरु से ही विवादों में रहे हैं, कई शिकायतें प्रबंधन के पास आज भी हैं। इनमें कुरान पर थूकने का मामला तो आलाकमान तक गया लेकिन लीपापोती कर दी गई। पत्रिका के बंगलौर आफिस में अमित के कई और भी मामले हैं, इनमें इनके दो बाप होने का भी मामला है जबकि तीसरे गॉडफादर श्री नन्दकिशोर तिवाड़ी जी हैं जो शुरु से ही अमित का पक्ष लेते आ रहे हैं। अगर इसको धृतराष्ट की संग्या दी जाए तो अतिश्योक्ति ही होगी। बहरहाल यहां तो ऐसे ही चलेगा जब तक कि प्रबंधन ध्यान नहीं देता।

अमित गर्ग : हमसे ज्यादा इस शख्स से परेशान शायद ही कोई और साथी रहे होंगे। ये बात हमारे साथ वहां कार्यरत साथी भी भली-भांति जानते हैं। हमने संस्थानिक स्तर पर अपनी पीड़ा से अवगत भी कराया था लेकिन चहेता होना ही बचाव के लिए ढाल का काम करता है। वैसे इस शख्स की पूर्व में भी कई बार शिकायतें हो चुकी हैं, जिन पर कोई कार्रवाई नहीं होने से इनके हौंसले बुलंद हैं। परिणामस्वरूप अब तो ये भी मानते हैं कि इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऐसे ही पत्र के जरिए हम भी अपने साथियों से नौकरी छोड़ते वक्त जो तकलीफ हमारे दिल को हुई उसे बांट लेते तो शायद आज जो दिल का बोझ है वह बहुत हल्का होता। पत्रिका, बेंगलूरु में डेढ़ वर्ष काम करने के दौरान हम भी इस प्रकार की स्थिति से दो-चार हुए। इसका समय पर प्रतिकार करते तो जितना समय तनाव में घुट-घुटकर बिताया उतना ना बिताया होता। शायद जितने समय तनाव में नौकरी की उसमें कमी आ जाती। इसमें कोई शक नहीं है कि वहां कुछ साथी बेहद प्रतिभाशाली हैं लेकिन दूसरों के प्रति रखी जाने वाली कुंठित सोच और उनके प्रति किया जाने वाला अमानवीय व्यवहार उनकी प्रतिभा पर हावी है। लोग भूल जाते हैं कि किसी कर्मचारी की नौकरी से उसके तथा उसके परिवारवालों का भरण-पोषण होता है। ऐसे में किसी के साथ अन्याय होना अथवा करना उसके परिवार के साथ भी अन्याय करना है। लोगों को किसी को परेशान करने अथवा उसकी नौकरी को कठिन बनाने में क्या मजा आता है, ये वे हीं जानें। लेकिन सच्चाई यह है कि भगवान श्रीकृष्ण ने जिसका जितना दाना-पानी जहां लिखा है उसे कोई नहीं छीन सकता। खैर, जिसके साथ अन्याय होता है उसका दर्द तो वो ही समझ सकता है। यूं तो सभी की कश्ती एक ना एक दिन किनारे से लग ही जानी है। लेकिन बेमन से नौकरी छोडऩा बहुत तकलीफदेय होता है। बेंगलूरु में हमारे पूर्व तथा वर्तमान साथियों की तरह हमारा भी जमकर अपमान हुआ लेकिन, हमें लगता है कि शायद हमारी किस्मत में यही लिखा था। अन्याय सहना तथा हर बार व्यवस्था से समझौता करना हमारे वश में नहीं था, सो नौकरी छोड़ दी। कहीं ना कहीं अन्याय करने वाले लोगों को बढ़ावा अन्याय सहने वाले लोग ही दे रहे हैं। लेकिन, अब लगता है कि मोह-बंधन से मुक्त होकर प्रतिकार करना बहुत जरूरी है। संकुचित व्यवस्था तथा दोषी लोगों के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है नहीं तो ढर्रे में बदलाव नहीं लाया जा सकेगा। मेरी मां हमेशा कहती हैं कि किसी का दिल मत दुखाओ और ना ही कभी अपने जीवन के संघर्ष के शुरुआती दिनों को भूलो। अगर तुमने किसी के साथ बुरा नहीं किया है तो तुम्हारा भी बुरा नहीं होगा। ये जरूर है कि खुदा कुछ समय तुम्हारा और तुम्हारी अच्छाई का इम्तिहान ले और तुम्हें कुछ समय अत्यंत तकलीफों का सामना करना पड़े।

 


 

उधर, अमर उजाला, जम्मू से सूचना है कि भावेश चंद्र और राजीव रावत ने इस्तीफा दे दिया है. भावेश ने दैनिक भास्कर, जालंधर ज्वाइन किया है जबकि राजीव दैनिक जागरण, जालंधर के हिस्से हुए हैं. भावेश अमर उजाला में सिटी डेस्क देख रहे थे और यही काम वे भास्कर में भी करेंगे.

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0 Comments

  1. Benam

    September 21, 2010 at 9:37 am

    Darasal yahi hona tha. Karne wale ne uchit hi kiya aur wahi kiya jo kisi dharohar k khilaf aawaz uthane wale k saath karna chahiye ….. Kher Bhuvnesh ji k rahte yah ummid nahi thi… In dharoharo par kab tak aashirt rahega patrika mgmt dekhna yahi hai. Jis bade swapn ko le kar chala hai patrika mgmt. uski 100% safalta k liye kam se kam usko yah vikriti(Dhaoharism) se nijat pana hoga… Manzil abhi door hai … Agar kuch aur Shubham inhi dharoharo ki harkat ka shikar hui / Ya koi anya kisi doosare sansthan se aaya staff shikar hua to patrika phir Rajasthan k bahar Quality staff nahi juta payega…..

  2. Yogendra Gupta

    September 21, 2010 at 3:07 pm

    Always remember ” Hathi ke daat khane ke kuchh aur – Dikhane ke kuchh aur” before joining of Patrika this is friendly advise for everbody to please contact some senior ex management person to take the descion. Inside story and facts are not comfortable for a person who have self respect. If u r a buttring person with expertise in facology and no option other than Patrika than plz. must be join Patrika.

  3. Benaam

    September 22, 2010 at 8:29 am

    यशवंतजी हम काफी दिनों से आपके पोर्टल के बारे में सुन रहे थे लेकिन आपकी भड़ास मीडिया विजिट करने का मौका नहीं मिला या यों कहें कि जरुरत ही महसूस नहीं हुई। लेकिन अब जबकि पत्रिका के सम्पादकीय सहयोगी ने उसके कथित बॉस के विरोध में आवाज उठाई तो हमको काफी लोगों ने फोन करके बताया कि एक बार भड़ास तो देखो। हम भड़ास पर गए और वो पत्र भी देखा और लोगों की टिप्पणियां व आपकी नई ताजा बदतमीज बॉस वाला नया पोस्ट भी। सर जी हमारा पत्रिका एडिटोरियल से ज्यादा पाला तो नहीं पड़ा लेकिन फिर भी कभी कभार खबरें लगाने के चक्कर में हम वहां के लोगों से अनुरोध कर लिया करते थे। अमित श्रीवास्तव और उनसे पहले आए उनके बॉस े पत्रिका बेंगलूरु में के बाद पत्रिका को मानो ग्रहण सा लग गया। उनके आने के बाद जो कुछ हुआ उसकी थोड़ी बहुत जानकारी तो शायद आपको भी मेल के जरिए मिलती रहती होगी। बताते हैं कि अमित श्रीवास्तव ने जब पत्रिका ज्वाइन किया तो चार-पांच दिन तक उसने कुछ भी काम नहीं किया और यह भी तय नहीं हो पाया कि वो क्या करेगा। उन्होंने एक दिन रिपोर्टर द्वारा तैयार तात्कालीन राज्यपाल टी.एन.चतुर्वेदी,जो आजकल शायद मध्यप्रदेश के राज्यपाल हैं, की खबर एडिट की थी जिसमें उन्होंने इतना कबाड़ा किया कि वो दूसरे दिन छपने के बाद सबको पता चला। वो उनकी पहली एडिटेड खबर थी। हम लोगों को वैसे तो ज्यादा पता नहीं लेकिन कभी कभार एडिटोरियल वाले जो चर्चा करते वो बातें हमारे कानों तक पहुंच जाती। आपको पूर्व में भी कुछ लोागों ने जो टिप्पणियां की गई है वो १०० प्रतिशत सच है। अमित श्रीवास्तव का जो नेचर है वो तो किसी अपराधी को ही हो सकता है। उनके बारे में एक नए सिरे से जानकारी किए जाने की जरुरत है कि आखिर वो शख्स कौन हैं,कहां से आया,पहले कहां काम करता था,वहां से निकाला गया या फिर छोड़ दिया,बेंगलूरु लाने में किसका हाथ रहा,पारिवारिक रिश्तों में कड़वाहट व उसका रवैया कहता है कि दाल में कुछ काला जरुर है। बेंगलूरु से जयपुर मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को कहा जाता है कि वो धुरंधर,प्रतिभावान रिपोर्टर है,जबकि ऐसा कुछ नहीं है। उसने एक महिला रिपोर्टर को तो वहां के वरिष्ठ सम्पादकीय सहयोगी से भी ज्यादा प्रतिभावान बताया था लेकिन जब उस महिला ने पत्रिका से जाने का मन बनाया,शायद उसकी शादी होने वाली थी,तो उसने यह कहकर उसको प्रताडि़त करना शुरू कर दिया कि इसको तो हिन्दी ही नहीं आती। अब सवाल यह है कि जो शख्स उसी रिपोर्टर को बड़ा रिपोर्टर बताता था अचानक उसकी ट्यून बदल कैसे गई। कमोबेश यही स्थिति शुभम शरण के साथ हुई। उसका हिन्दी ज्ञान कमजोर है,इसको वह खुद स्वीकार कर चुकी है। इसलिए उसकी खबरें अमित खुद बनाया करता था और उसे बाई लाइन दी जाती थी वो भी तब,जब वो सारी खबरें दूसरे अंग्रेजी दैनिक में छप चुकी होती थी। बताया जाता है कि बेंंगलूरू में कार्यरत एक रिपोर्टर का तबादला शुभम को मोहरा बनाकर किया गया। कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि पत्रिका में ऐसे लोग जब तक रहेंगे पत्रिका की छवि पर बुरा असर पड़ेगा।

  4. jai

    September 22, 2010 at 9:04 am

    sabhi sansthano me yahi hota hai bhai. junior vahi success karata hai jiske sir par kishi senior ka hath ho. ptrakar ko aab kam karana hi nahi setting karana bhi aana chahiye.

  5. Benaam

    September 23, 2010 at 7:37 am

    shayad is chitti me kisi ne ek baat par gaour nai ki hai.ye chitti ek insan ke baare me bhale hi ho par sanathan k liye shkayat ki gai hai. is ladkine amit srivastav ke bare me jarur kaha hai par mujhe lagata hai ki kahi na kahi sansthan k khilaf isne aawaj uthaai hai.aur sansthan ke khilaaf aawaj uthaane k liye isne amit kaa sahara liya jo kahi na kahi sahi hai. jaha tak mai shubham ko janta hu wo abhi nadan hai..actually umar se bhi kam hai..usse abhi ache bhale kaa fark nai pata. kafe jalti dusro ki baat me aati hai.kabhi amit ki baat sunti hai to kabhi dusre ki..usse apne dil ki sunni chaiye. 2usri baat ye banti hai ki iski agar itni achi hindi hoti to aaj ye hamgama uske sar nai mandara raha hota..kabhi to usne sikhna shuru kiyaa tha par kuch logo ko ye achcha nai laga aur usse BHADKA ke barbadi ke raste laa khada kiya. dkeho shubham mai itna jarur kahana chahunga ki amit srivastave jaise logo ki jarurat bangalore sanskaran me hai kyuki yaaha baithe log kanaada paper ka translation to karte hi hai par agar unhe kaabu me nai rakha gaya to pata nai aur yaha kya kya karenge. abhi tumhari umar kam hai duro ki baat me mat aao.

  6. kisi ka nai

    September 23, 2010 at 7:50 am

    aaj media keval naam ki rah gai hai yaha rozana aise chotemote mamale aate hi rahte hai. par ashchary to tab hota hai jab log in baato me itni dilchasbi dikhate hai..aaj isne kisi k khilaf aavaaz uthaai hai par jab ye pareshani me thi to koi aage kyu nai aaya. dusero pe ungali utaana aasaan hota hai. aaj is portal me log apna bhadas nikalne chale aate hai aur kuch logo ne to itna comment kiya hai ki WO KHUD KUCH BOLNE LAAYAK NAI HAI. kuch log to yaha aise hai ki ladkio ko raat bhar idhar udhar ke mesg kar pareshan kiyaa karte hai. jiske khlaaf aawaz bhi is ladki ne hi utaai thi… shayad aaplog jante nai par yaha camment box me kuch aise log hai jinhone ladkio ko pareshan karne kaa bedaa apne sar le liyaa tha.is ladki ne khud us insaan k khilaaf uske boss ko jaankaaree de thi (uswaqt wo kisi dusre company me kaam karnaa shuru kar diyaa tha) par aaj wo khud iski madad k liyee aaya hai to dekh kar bada aajeeb lag raha hai.kharir logo ki fidrat hi kuch aisi hai jo kabhi nai sudhregi..

  7. Rinku

    September 24, 2010 at 8:17 am

    ये तो वही हुआ सो चूहे मार बिल्ली हज को चली। जब सारे पैंतरे फैल हो गए तो आरोपी खुद ही अपनी वकालात करने लगे हैं। उसके खुद के चाल-चरित्र का ठिकाना नहीं और वो चला है दूसरों को नसीहत देने की वो ऐसा करते हैं,वैसा करते हैं। बड़े शर्म की बात है कि पत्रिका जैसे संस्थान में इतना कुछ होने के बावजूद ऐसे ओछी मानसिकता वाले लोग बैठे हैं। यहां एक सज्जन ने कॉमेन्ट किया है कि लोग दूसरों की मदद के लिए आगे आए हैं। तो उनकी जानकारी के लिए बता दें कि हमारा इस संस्थान से सीधा सम्पर्क नहीं है लेकिन वहां बैठे लगभग हर सख्स,ओछी मानसिकता वाले एक दो घटिया लोगों को छोड़कर,से जुड़ाव है। अगर उसकी हिन्दी अब खराब हो गई है तो फिर पहले उसका पक्ष क्योंं लेता था अमित। पूरा पत्रिका बेंगलौर जानता है कि वो एक महिला साथी सहित कुछ अन्य रिपोर्टरों को लिए अपने घर के आगे रोड पर बैठा रहता था और घंटों बतियाया करता था। इतना ही नहीं हद तो तब हो गई जब यह शख्स उस समय पानी की तरह पैसे बहाया करता था,क्यों? अब ऐसा क्या हो गया कि उसकी ऑफिस में उपस्थिति उसे नागवार गुजरती है। उसे बोलने का होश नहीं,खाने-पीने तक का पता नहीं और यहां तक कि उसे यह भी कार्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को बताना पड़ा कि देखो जिस कप में आप चाय पीते हैं उस कप में पान या जर्दे की पीक नहीं थूका करते। शायद उसको यह भी नहीं पता कि कार्यालय में घोड़े बेचकर सोना मना है लेकिन यह शख्स घोड़े बेचकर सो भी सकता है लेकिन शिकायत होने के बावजूद इसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। क्योंकि सबको पता है सबको खबर है कि इन पर किसका हाथ है। यशवंत जी काफी दिनों से ये मामला चल रहा है आप कम से कम ये टिप्पणी करने वाले शख्स के मेल आई पर इतना जरुर पूछिएगा कि क्या वो खुले में ये सब बाते बोलने के लिए तैयार है जो उसने यहां लिखी है।……एक तो चोरी और उपर से सीना जोरी………वाह क्या बात है…..माना कि अभी तुम्हारे सितारे बुलंदी है पर आखिर कब तक बकरे की अम्मा खैर मनाएगी……………एक दिन तो ऐसा आएगा जब तुम्हें भी हलाल होना ही पड़ेगा…………..

    यहां एक व्यक्ति ने दो स्थानों पर अलग-अलग टिप्पणी की है,टिप्पणी करने वाला आदमी एक ही है लेकिन वो यह दुनिया की नजरों में दिखाना चाहता है कि नहीं मैं सही हूं इसलिए लोग उसका पक्ष ले रहे हैं। अगर सचमुच ऐसा है तो वो यहां अपना असली मेल आई डी और फोन नम्बर दे ताकि पता चले कि उसे पत्रिका के बारे में और उसके कर्मचारियों के बारे में किता मालुम हैं। उसने लिख है कि बेंंगलौर में कन्नड़ से अनुवाद किया जा रहा है उन पर लगाम लगानी जरुरी है,इसलिए अमित श्रीवास्तव जैसे लोगों की जरुरत है। तो यह बात समझ में नहीं आती कि अमित श्रीवास्तव कौनसा विलायत से अंग्रेजी पढकर आया है या फिर ये अंग्रेजी परिवार से हैं। फर्क इतना है कि उसको अंग्रेजी मानसिकता वाले अंग्रेजीदा लोगों की शह मिली हुई है,भले ही वे खुद हिन्दी के क्षेत्र में टायं-टायं फिस्स क्यों ना हो। उसको ठीक से हिन्दी का ज्ञान तो है नहीं और वो पन्द्रह साल से काम कर रहे लोगों को काबू में करने की बात करता है। शर्म की बात है। कन्नड़ अनुवाद वाली बात तो पत्रिका के जयपुर मुख्यालय वालों को भी पता है। लेकिन वे भी इस बात को जानते हैं कि वहां कि परिस्थितियां कुछ और है। अमित दूसरे अंग्रेजी अखबारों में छपी खबरों को चुराकर अनुवाद करने के लिए देकर उसमें बाई लाइन देता था। अगर उसमें इतना दम है तो फिर उसे एक दो महीना बेंगलौर में रिर्पोटिंग करनी चाहिए। उसे आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाएगा।

  8. BENAM

    September 24, 2010 at 11:07 am

    ARE JI YE TO WAHI BAT HUI KI JISKI LATHI USKI BAHAIS…ARE WAH WAH ;;;;ARE UNCHI POST PANE KA MATLAB YE NAHI KI JO JI AYE WO KARO…

  9. atul

    September 26, 2010 at 10:45 am

    श्रीयुत यशवंत जी,

    अमित श्रीवास्तव मामले में एक और जानकारी मेरे पास है। प्रबंधन की ओर से सभी कमॆचारियों को साप्ताहिक अवकाश देने की बात कही गई है और सभी अवकाश ले भी रहे हैं। यहां तक कि नन्दकिशोर तिवारी साब भी रविवार को अवकाश में रहते हैं लेकिन अमित कभी भी अवकाश नहीं लेते। इससे एक बात तो साफ है कि अमित को अभी तक तिवारी जी ही बचाते आ रहे हैं जो भविष्य में दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है। आखिर वो कौन सी बात है जो अमित को वीकली आफ नहीं दिया जाता है। हो सकता है ऊपर यह संदेश दिया गया हो कि उसके बगैर संस्करण नहीं निकल सकता। लेकिन जब दो लम्बी छु्ट्टी पर जाता है तो एडिशन तो निकलता ही है। बहरहाल कुछ ना कुछ तो गुरु – शिष्य के बीच है ही।

  10. syed athar

    September 26, 2010 at 1:47 pm

    jo kuchh chal raha hai theek nahi hai

  11. shubham

    September 27, 2010 at 10:43 am

    Patrika Me jo jyada chamchgiri karta hai vo hi rah sakta hai.Imandar mehnati ki yaha koi nahi sunta. mene bhi yaha per 14 yaers service ki lekin ant main yaha ki rajniti main muchhe nokri chhodni padi.

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