: कई पत्रकारों को पता नहीं, उन्हें इनाम क्यों मिला : हरियाणा सरकार ने पत्रकारों को पुरस्कृत करने की जो योजना शुरू की है, प्रबुद्ध लोगों के बीच उस पर चर्चा जोरों पर है। सवाल यह उठने लगा है कि आखिर किस योग्यता को आधार मानकर सरकार ने पत्रकारों के लिए खजाने का मुंह खोला है। एक बड़े मीडिया हाउस ने अपने पत्रकारों को पुरस्कार राशि लौटाने का फरमान सुनाया।
बाद में उस मीडिया हाउस ने अपने निर्णय को वापस भी ले लिया। सीएम के हाथों इनाम पाने वाले कई पत्रकार ऐसे भी हैं, जिन्हें इनाम की राशि पाने के बाद से अच्छी तरह नींद तक नहीं आ रही है। शायद वे दिन-रात इसी बात का मनन करने में लगे हैं कि ‘चाटुकारिता’ के अलावा आखिर उन्होंने ऐसा किया ही क्या है, जिसके बदले सरकार ने उन्हें इतना बड़ा सम्मान दे दिया है। रोहतक से दीपक खोखर जी ने सरकारी इनाम को लेकर जो कुछ लिखा है, उसे पढक़र आज मेरा भी दिल कर गया कि मैं भड़ास4मीडिया के पाठकों व पत्रकार साथियों के साथ अपने वे अनुभव शरीक करूं, जो मैंने कई ‘वरिष्ठ कम भ्रष्ट’ पत्रकार साथियों से अनुभव किए हैं। हरियाणा के पूर्व सीएम चौ. औमप्रकाश चौटाला का बतौर सीएम एक बार जब रेवाड़ी आगमन हुआ, तो शहर के दो वरिष्ठ पत्रकारों ने भरी सभा के बीच उनके पैर छूकर आशीर्वाद मांग लिया। बतौर बुजुर्ग आशीर्वाद मांगना बुरी बात नहीं है, लेकिन बतौर सीएम दो वरिष्ठ पत्रकार, जिनमें एक की उम्र शायद चौटाला की उम्र से ज्यादा है, का नतमस्तक होना उसी समय पत्रकारों व आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया (इन दोनों को हाल ही में हरियाणा सरकार से इनाम मिला है)।
दोनों में से एक ने चलते समय कार में चौ. ओमप्रकाश चौटाला से मंत्रणा की और एक कागजों से भरा लिफाफा उनके हाथ में थमा दिया। सीएम की कृपा जल्द ही हुई। एक के बेटे को सीएम के आदेश पर अच्छी नौकरी मिल गई। इस बात को रेवाड़ी के सभी पत्रकार अच्छी तरह जानते हैं। समय गुजरता गया और प्रदेश में विधानसभा चुनाव आ गए। इन दोनों ही ‘वरिष्ठ’ पत्रकारों ने चुनावों के दौरान ‘इनेलो के वर्कर’ की तरह काम किया और जगह-जगह इनेलो की जीत के जमकर दावे किए। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई। दोनों ने तुरंत पाला बदला और स्थानीय विधायक कप्तान अजय सिंह यादव के दरबार में हाजिरी लगाना शुरू कर दिया।
शुरुआत में कप्तान ने दोनों को ज्यादा भाव नहीं दिया, लेकिन ये दोनों ही ‘वरिष्ठ पत्रकार’ पीछे नहीं हटे। राजनैतिक और आर्थिक लाभ लेने के लिए दोनों ने मंत्री महोदय के ‘तलवे’ चाटने का काम शुरू कर दिया। अब जबकि इन दोनों को प्रदेश सरकार की ओर से इनाम मिल ही चुका है, सरकार को इनके अतीत में झांककर कम से कम यह तो पता जरूर करना चाहिए कि इन दोनों का पत्रकारिता या समाज निर्माण की दिशा में क्या प्रयास रहा है?
अब मैं बात करता हूं करीब दो वर्ष पहले की। मैंने एक समाचार पत्र के माध्यम से डंके की चोट पर रेवाड़ी की पत्रकारिता में फैले भ्रष्टाचार को जमकर उजागर किया था। इन दोनों के साथ-साथ उन करीब आधा दर्जन पत्रकारों के काले कारनामों को उनके नाम के साथ उजागर किया था, जो पत्रकारिता की आड़ में लोगों को ब्लैकमेल करने में जुटे हुए थे और आज भी जुटे हुए हैं। इमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों का बड़ा ग्रुप मेरे साथ था। भ्रष्ट पत्रकारों की शह पर ऐसे धंधे करने वाले भी कई पत्रकार अपने धंधों को छोडक़र हमारे साथ जुड़ गए थे।
इसके बाद करीब करीब आधा दर्जन पत्रकारों की ‘भ्रष्ट जुंडली’ एकजुट हो गई। उनके लिए राष्ट्रीय समाचार पत्रों की आड़ वरदान साबित हुई। हालांकि पूरा प्रशासन और सत्तासीन नेता इन पत्रकारों की हकीकत से रूबरू हो चुके थे, लेकिन राष्ट्रीय समाचार पत्रों में खबरें छपवाने की मजबूरी के कारण इस ‘भ्रष्ट जुंडली’ को न तो नेता और न ही प्रशासन नजरअंदाज कर पाया। दिलचस्प बात यह है कि रेवाड़ी में जिन पत्रकारों को सरकारी इनाम मिला है, उनके से अधिकांश वे ही हैं, जिनके काले कारनामों को मैंने सबूतों के साथ उजागर किया था। अगर दूसरे तरीके से देखा जाए, तो मेरा इस ‘भ्रष्ट जुंडली’ को बेनकाब करना इनके लिए फायदे का सौदा साबित हो गया।
जानकारों के अनुसार भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे लोगों को सरकारी इनाम दिलाने में लोक संपर्क विभाग के कुछ अधिकारियों व नेताओं का योगदान रहा है। साथ ही वे पत्रकार मुंह ताकते रह गए, जो इमानदारी से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं। चूंकि यह मामला रेवाड़ी जिले का है, इसलिए समझा जा सकता है कि प्रदेश के अन्य जिलों में पत्रकारों को दिए गए इनाम की पात्रता क्या रखी गई होगी। जिन पत्रकारों को इनाम मिला है, उनमें से कई तो ऐसे हैं, जिन्होंने लंबे समय से हाथ में कलम ही नहीं छापी है।
प्रदेश स्तर का इनाम पाने वाले एक ‘वरिष्ठ’ पत्रकार को खुद यह नहीं पता कि आखिर उसका समाचार पत्र कितने सप्ताह बाद सिंगल कॉलम में उसे स्थान देता है। इस मामले को लेकर प्रदेश सरकार की भी जमकर किरकरी हुई है। सरकार के नीति निर्धारकों ने सरकारी खबरों की भूख के चलते इस योजना को अमलीजाम तो पहना दिया, लेकिन उनका यह दांव अब उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। इनाम देना बुरी बात नहीं है, लेकिन इनाम पाने वाले को कम से कम इस बात का पता तो होना चाहिए कि आखिर जो इनाम उसे मिला है, उसके लिए उसने किया ही क्या है?
नरेंद्र वत्स की रिपोर्ट.












deepak khokhar, rohtak, 9991680040
October 1, 2010 at 2:50 am
narender bhai this is unfortunate that most of the journalist in haryana wants any prize from govt., if they are not capable. whose govt is in haryana, they wants to be near & dear of him.
mahandra singh rathore
October 1, 2010 at 6:10 am
written by ankur singh
shri narinder vatas ji ne rewari ke patrkaron ke bere mai jo kuch likha hai woh khunnas kam sacchai jayda ho sakti hai. bhai vatas RTI se puri jankari le jeya to pata chal jeyega. aapne babaki se likha hai aapko badhai ho. state or district level per prize ke leye 2008 mai farm aur paper mai chappi cutting mangi gai thi. jin logo ne farm nahi bhere wo prize ke patra kesse ho gye? jinko sammanit kiya gya hai unki kya uplabdhi rahi hai RTI se jankari leker pata kiya ja sakta hai. prize vitran per haryana sarkar ko sharam aani chahye. shame shame shame
somveer sharma
October 3, 2010 at 4:26 pm
wah acha likha hai