नई दुनिया, उज्जैन के ब्यूरो में पिछले काफी समय से तनातनी का माहौल है. ब्यूरोचीफ के रवैये से स्टाफ परेशान बताए जा रहे हैं. ब्यूरो में लंबे समय से रिपोर्टरों की जरूरत है, लेकिन ब्यूरोचीफ कम स्टाफ से ही व्यवस्था को घसीट रहे हैं. अधिक काम और तनाव के चलते ब्यूरोचीफ और स्टाफ के बीच अक्सर बहसबाजी होती रहती है. ब्यूरोचीफ चपरासी तक से उलझ जाते हैं.
संपादक ने अगर किसी को सलेक्ट करके भेजा तो उसे भी ब्यूरोचीफ बहाना बनाकर टाल देते हैं. इस मामले में वे संपादक पर ही भारी पड़ते दिख रहे हैं. खबर है कि रिपोर्टर का पद खाली होने के चलते एक सीनियर पत्रकार समेत कई लोगों ने इंदौर में संपादक के पास आवेदन किया था. संपादक ने इंटरव्यू लेने के बाद वहां से सीनियर पत्रकार समेत तीन लोगों को उज्जैन ब्यूरो कार्यालय के लिए फाइनल कर दिया. जब ये तीनों उज्जैन पहुंचे तो ब्यूरोचीफ ने काम लेने से मना कर दिया.
उन्होंने ऊपर बात करके स्थानीय लोगों के बजाय इंदौर से ही रिपोर्टर भेजने की बात की. कई दिन तक ऐसा चलता रहा. जब अंत में इंदौर से कोई उज्जैन आने को तैयार नहीं हुआ तब लगभग दो माह बाद ब्यूरोचीफ ने सीनियर पत्रकार को इंटरव्यू के लिए बुलाया. इंटरव्यू की प्रक्रिया खतम करने के बाद ब्यूरोचीफ ने उनसे कहा कि खबर और स्टोरी घर से लिखकर कार्यालय भेजिए. अगर आपकी स्टोरी छपी तो प्रति स्टोरी पचास रुपये दिये जायेंगे. जब उन्होंने कहा कि जब संपादक महोदय ने मेरा इंटरव्यू लिया था तब तो उन्होंने अच्छी सेलरी देने की बात की थी. इस पर उन्होंने कहा तब आप जाकर अब संपादक से ही मिल लीजिए.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित. उन्होंने नाम ना छापने का अनुरोध किया है.












Ronit Sharma
October 10, 2010 at 10:13 pm
उज्जैन ब्यूरो चीफ का यह रवैया किसी भी तरह से संस्थान के हित में नहीं है। यह असल में उज्जैन के ब्यूरो चीफ की कुंठा है जो इंदौर के संपादक द्वारा तय व्यक्ति को वे अपने साथ रखना नहीं चाहते। उज्जैन के ब्यूरो चीफ असल में अपनी प्रतिभा को लेकर आत्ममुग्ध हैं। सूत्र बताते हैं कि उनके इसी रवैये के चलते प्रबंधन ने इंदौर कार्यालय का माहौल व्यवस्थित बनाए रखने के लिए उज्जैन भेज दिया था।
xyz
October 10, 2010 at 11:21 pm
ha ha ha ha ha ha
kamlesh
October 11, 2010 at 2:45 am
;D;D;D;D
kumari.swati828
October 11, 2010 at 4:40 am
sabhi akhbaar ke dafttoron main aisa hota hai. sampadak ji don’t mine it .
joseph
October 12, 2010 at 6:49 am
क्या बकवास खबर छपते हो यशवंतजी ..किसी पत्रकार के मेल पर आधारित कचरा पहले पुष्टि कर छान तो लिया होता..और फिर खबरों का कायदा है कि दोनों पक्षों से वर्शन लेकर ही छपी जाए..आप खंडन तो छाप देते हो या यूं कहें कि दूसरे पक्ष की बात बाद में छापते हो लेकिन यदि एक ही खबर में दोनों पक्षों की बात हो तो यह तटस्थ नजरिया होगा..अभी तो ऐसा लग रहा है कि ये आपका आकलन है
अमित गर्ग. जयपुर. राजस्थान
October 12, 2010 at 5:50 pm
अरे साहब आप तो ब्यूरो चीफ के संपादक पर भारी पडऩे की बात कर रहे हैं। हमने और हमारे साथियों ने तो डेस्क के अदने से एक कॉपी इंचार्ज को पूरे संस्करण पर भारी पड़ते हुए देखा है।
Siddharth Sharma
October 22, 2010 at 4:01 pm
yeh to sahi nahi kiya
raj
October 23, 2010 at 10:38 pm
kaka kam ka na kaj ka, vanaspati visheshgya khabr dene vale patrakaro ko kya samjhe, use to jhad ki fool pattiya, keede makode aur sahkarita ke alava kuchh sujhta hi nahee.