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भावुक मन की त्रासदी और अखबारी पन्नों में छिपी मीडियाकर्मियों के शोषण की कहानी

दोनों के अंदर पत्रकारिता के लिए दीवानगी थी. दोनों ही भारत में हिन्दी पत्रकारिता के सर्वोच्च हिन्दी संस्थान आईआईएमसी पहुंचे. साल भर के बाद दोनों की नौकरी एक बिजनेस पेपर में लगी जो उसी साल लॉन्च हुआ था. दोनों ही निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से थे इसलिए कम उम्र में नौकरी पाकर खुश थे. पहले ने रिपोर्टिंग ली और उसे एक सीनियर रिपोर्टर के अंडर में काम पर लगा दिया गया. सीनियर रिपोर्टर ने उसको काम सिखाने के बजाय उसके करियर के साथ मजाक करना शुरू कर दिया. पत्रकारिता जगत में कुंठित लोगों की भरमार है. जोड़-तोड़, तिकड़म, जुगाड़ और भाई भतीजावाद की अमरबेल का सहारा पाकर आये कम प्रतिभाशाली लोग अपने से ज्यादा प्रतिभावान को देखते ही उसे खत्म करने की योजना बनाने लगते हैं. यही हुआ उस बंदे के साथ. सीनियर रिपोर्टर उसे कीचड़ में डूबे दिल्ली के आजादपुर मंडी में आलू, बैंगन और सोयाबीन का हाल पता करने के लिए भेज देता. फिर भी उसने ये सोचकर काम जारी रखा कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा. एक दिन उसने अपने सीनियर को एक स्टोरी आईडिया दिया तो सीनियर ने उसका मजाक उड़ाया. दूसरे दिन पता चला उसी आइडिया की खबर सीनियर रिपोर्टर के नाम से छपी थी. यह सब झेलकर भी उसने काम जारी रखा. वह बहुत मेहनत करता. एक दिन में चार-चार स्टोरी लाने लगा. उसको बाइलाइन मिल रहे थे. उसकी खबर उसी अखबार के अंगरेजी संस्करण में अनूदित होकर छपने लगी. अंगरेजी वालों को अपने अस्तित्व पर ख़तरा दिखा और उसकी ख़बरें उसमें लगनी बंद हो गयी.

दोनों के अंदर पत्रकारिता के लिए दीवानगी थी. दोनों ही भारत में हिन्दी पत्रकारिता के सर्वोच्च हिन्दी संस्थान आईआईएमसी पहुंचे. साल भर के बाद दोनों की नौकरी एक बिजनेस पेपर में लगी जो उसी साल लॉन्च हुआ था. दोनों ही निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से थे इसलिए कम उम्र में नौकरी पाकर खुश थे. पहले ने रिपोर्टिंग ली और उसे एक सीनियर रिपोर्टर के अंडर में काम पर लगा दिया गया. सीनियर रिपोर्टर ने उसको काम सिखाने के बजाय उसके करियर के साथ मजाक करना शुरू कर दिया. पत्रकारिता जगत में कुंठित लोगों की भरमार है. जोड़-तोड़, तिकड़म, जुगाड़ और भाई भतीजावाद की अमरबेल का सहारा पाकर आये कम प्रतिभाशाली लोग अपने से ज्यादा प्रतिभावान को देखते ही उसे खत्म करने की योजना बनाने लगते हैं. यही हुआ उस बंदे के साथ. सीनियर रिपोर्टर उसे कीचड़ में डूबे दिल्ली के आजादपुर मंडी में आलू, बैंगन और सोयाबीन का हाल पता करने के लिए भेज देता. फिर भी उसने ये सोचकर काम जारी रखा कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा. एक दिन उसने अपने सीनियर को एक स्टोरी आईडिया दिया तो सीनियर ने उसका मजाक उड़ाया. दूसरे दिन पता चला उसी आइडिया की खबर सीनियर रिपोर्टर के नाम से छपी थी. यह सब झेलकर भी उसने काम जारी रखा. वह बहुत मेहनत करता. एक दिन में चार-चार स्टोरी लाने लगा. उसको बाइलाइन मिल रहे थे. उसकी खबर उसी अखबार के अंगरेजी संस्करण में अनूदित होकर छपने लगी. अंगरेजी वालों को अपने अस्तित्व पर ख़तरा दिखा और उसकी ख़बरें उसमें लगनी बंद हो गयी.

एक दिन अखबार के दफ्तर में हंसी मजाक में उसने अपने लड़की सहकर्मी को कोई हल्की फुल्की सी बात कह दी. लड़की को यह बात बुरी लगी और उसने पेज इंचार्ज यानी ऑफिस के बॉस को नमक मिर्च लगाकर शिकायत कर दी. वह लड़की अपने बॉस की करीबी थी. यहाँ यह बताते चलें कि मीडिया में ही नहीं, हर जगह आजकल कई लडकियां अपने बॉस से करीबी रिश्ता बनाती है ताकि प्रोमोशन पाने से लेकर अन्य परिस्थितियों में अपना उल्लू सीधा करने के लिए उसे इस्तेमाल किया जा सके. बॉस ने उसको बुलाया और लड़की से माफी मांगने को कहा. उसने माफी नहीं मांगी तो बॉस ने कहा कि अगली बार ऐसी गलती हुयी तो इस्तीफा लेकर आना. इतना सुनना था कि पत्रकारिता के उस दीवाने का मोहभंग हुआ और उसने सच में पत्रकारिता से इस्तीफा दे दिया. आजकल वह दिल्ली में रह के सिविल सेवा की तैयारी कर रहा है.

पत्रकारिता के दूसरे दीवाने का हश्र उससे भी बुरा हुआ. उसने डेस्क संभाली और मेहनत से काम करना शुरू किया. उसकी प्रतिभा से उसका बॉस जलने लगा. बात बात में छोटी से छोटी गलती पर उसे डांटने लगा. वह अपने बॉस से लड़ जाता था. यह लड़ाई बढ़ती ही गयी. उसने अपने मित्र का भी हाल देख ही लिया था. उसके बाद जो लड़कियां काम करने आयी थी उसका वेतन उससे ज्यादा हो गया लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. रोज रोज की लड़ाई से तंग आकर उसने भी इस्तीफा दे दिया. वह भी सिविल सेवा की तैयारी में लगा हुआ है.

जाते जाते एक और छोटा सा किस्सा सुनाता चलूँ. राजस्थान के एक प्रतिष्ठित अखबार के रीजनल ऑफिस में एक सीधा सादा और मेहनती बन्दा काम करता था. उसके बॉस ने उसे पिता की तरह प्यार देना शुरू किया और उससे चौदह पन्द्रह घंटे का काम लेने लगा. उसी ऑफिस में सिटी पेज इंचार्ज एक महिला थी जिसका बॉस से नजदीकी रिश्ता था. वह भी उस बंदे के सीधेपन का फायदा उठाती थी और उससे अपने पेज के लिए काम करवाती थी. अपने शोषण से तंग आकर एक दिन उस बंदे ने उस महिला का कोई काम करने से इनकार किया. बात बॉस तक पहुँची. बॉस ने उस बंदे को बुलाया और बंदे के द्वारा लिखे गए एक रिपोर्ट के एक गलत शब्द को आधार बनाकर बोला- तुम अपना हिसाब कर लो, तुम्हारी भाषा खराब है.

जी, आप सब सुबह सुबह जिस अखबार में समाज और इंसान को सुधारने की ढेर सारी बाते पढते हैं, उस अखबार के पन्नों में कितने लोगों के शोषण की कहानियाँ रोज कैद होती हैं, ये आप नहीं जानते. जिनके ऊपर ये अत्याचार होता है, वे भी कुछ नहीं बोलते क्योंकि घर में बीबी, बच्चे हैं. नौकरी छूट जायेगी तो उनको कहाँ से खिलाएंगे.

राजीव सिंह

[email protected]

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0 Comments

  1. अमित गर्ग. जयपुर. राजस्थान

    October 20, 2010 at 3:49 am

    किसी चीज की शिद्दत से प्यार करना और उससे दूर होने पर दिल का टूटना, यह सब आपके इस पत्र में शुमार है. लेकिन इस बात को वे तथाकथित पत्रकार क्या समझेंगे, जिन्हें अपने तथाकथित माई-बापों (बोसों) के तलवे सहलाने से ही फुर्सत नहीं है. यह भी सच है कि जितने लोग आज की नयी पीढ़ी को पत्रकारिता सिखा रहे हैं उनमे से अधिकतर पत्रकारिता के ककहरे से भी कोसों दूर हैं. दुनिया को आइना दिखाने वाले पत्रकारों की खुद की हालत अधिक नासाज है. धन्य है हमारा मीडिया जगत और इसके कलमवीर.

  2. Sushil Gangwar

    October 20, 2010 at 3:49 am

    Aaakhir kyo dab kar rah jati hai patrakaro ki khud ki kahaniya ? Dusro ki khabar likhne vala – chhapne vala wala patrakar aaj enta bebas lachaar ho gaya hai . Yawant Singh ko kown nahi janta hai . magar unke parivar ke sath jo huaa , usne patrakarita jagat ko hila kar rakh diya hai . Hum patrkaaro ko mil – jul kar rahna chahiye . hum log ek dusre se dur -dur kyo rahte hai .yah swaal aksar mere dimag me chalta rahta hai . Hum kyo nahi police ke khilaph morcha khol dete hai . Agar kal kisi patrakaar ke sath yah ghatna dohraee jaati hai to kya hoga ? Kya har patrakaar apne parivaar ko ensaaf dila payega ? Jara sochne ki baat hai .

    Sushil Gangwar
    http://www.sakshatkar.com
    http://www.stv.com.co.in

  3. manoj

    October 20, 2010 at 5:11 am

    @ amit ji aapki baat ekdam sahi hai lekin un chatukaron ko kya maalum jo har samay boss ki dum chatte rahte hain.

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